मेढ़क-मेढ़की(लघुकथा)
......प्रदीप कुमार गौतम
जून का माह, भीषण गर्मी से लोग बेहाल, पसीने से लथपथ, अंगौछे से बार-बार मुँह पोछते लोगों के चेहरे इन्हौरियों से लाल हो गए थे, मंत्री महोदया ने भीषण गर्मी से निजात दिलाने हेतु और वर्षा ऋतु को बुलाने हेतु मेढ़क-मेढ़की की शादी का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें 101 ब्राह्मणों को ब्रह्मभोज के साथ सभी को एक-एक जोड़ी कपड़े की भी व्यवस्था की गई थी, चारो ओर बड़ी-बड़ी झालरें लटक रही थी ऐसी भव्यता मानो किसी राजे-राजवाड़े की शादी हो रही हो, जिसे आसपास के गरीब-मजदूर टकटकी लगाकर देख रहे थे और मन-में अपनी बेटियों की ऐसी शादी न कर पाने पर माथा-पीट रहे थे ।
मंत्री महोदया का काफ़िला आता है, जिसमें कई गार्डों के साथ वे उतरती है और शादी समारोह में पहुंचते ही ब्राह्मण मन्त्र पढ़ना शुरू कर देते है एक आदमी अपने हाथों में मेढकों के जोड़े को पकड़े हुए है मंत्री महोदया हल्दी के टीके के साथ सभी ब्राह्मणों को वस्त्र और धन दान करती है यह सब उनके साथ बैठा हुआ आठ वर्षीय बेटा यश देख रहा था ।उससे रहा नही गया
माता जी ! यह आप क्या कर रही हो ? (यश ने सवाल किया)
देख नही रहे हो बेटा मेढ़क-मेढ़की की शादी करवा रही हूँ ।
आधुनिक युग मे आप इसे मानती हो
यह परंपराएं है, निभानी पड़ती है बेटा
माता जी यह परम्पराएं नही अंधविश्वास और पाखंड है, जिसे आप तोड़ने की जगह बढ़ा रही हो ।
बेटा पुरखे करते आये हैं तो हमे भी करना पड़ता है
तब तो मम्मी हमारे पुरखे गोबर उठाने, कंडे पाथने और दूध दोहने का काम करते रहे हैं तो आप ने यह सब छोड़कर मंत्री क्यों बनी हुई हो ?
यश के प्रश्न के साथ चारो ओर सन्नाटा छा जाता है, जैसे किसी ने बड़ा-सा पत्थर उठाकर सिर में दे मारा हो ।
......प्रदीप कुमार गौतम
जून का माह, भीषण गर्मी से लोग बेहाल, पसीने से लथपथ, अंगौछे से बार-बार मुँह पोछते लोगों के चेहरे इन्हौरियों से लाल हो गए थे, मंत्री महोदया ने भीषण गर्मी से निजात दिलाने हेतु और वर्षा ऋतु को बुलाने हेतु मेढ़क-मेढ़की की शादी का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें 101 ब्राह्मणों को ब्रह्मभोज के साथ सभी को एक-एक जोड़ी कपड़े की भी व्यवस्था की गई थी, चारो ओर बड़ी-बड़ी झालरें लटक रही थी ऐसी भव्यता मानो किसी राजे-राजवाड़े की शादी हो रही हो, जिसे आसपास के गरीब-मजदूर टकटकी लगाकर देख रहे थे और मन-में अपनी बेटियों की ऐसी शादी न कर पाने पर माथा-पीट रहे थे ।
मंत्री महोदया का काफ़िला आता है, जिसमें कई गार्डों के साथ वे उतरती है और शादी समारोह में पहुंचते ही ब्राह्मण मन्त्र पढ़ना शुरू कर देते है एक आदमी अपने हाथों में मेढकों के जोड़े को पकड़े हुए है मंत्री महोदया हल्दी के टीके के साथ सभी ब्राह्मणों को वस्त्र और धन दान करती है यह सब उनके साथ बैठा हुआ आठ वर्षीय बेटा यश देख रहा था ।उससे रहा नही गया
माता जी ! यह आप क्या कर रही हो ? (यश ने सवाल किया)
देख नही रहे हो बेटा मेढ़क-मेढ़की की शादी करवा रही हूँ ।
आधुनिक युग मे आप इसे मानती हो
यह परंपराएं है, निभानी पड़ती है बेटा
माता जी यह परम्पराएं नही अंधविश्वास और पाखंड है, जिसे आप तोड़ने की जगह बढ़ा रही हो ।
बेटा पुरखे करते आये हैं तो हमे भी करना पड़ता है
तब तो मम्मी हमारे पुरखे गोबर उठाने, कंडे पाथने और दूध दोहने का काम करते रहे हैं तो आप ने यह सब छोड़कर मंत्री क्यों बनी हुई हो ?
यश के प्रश्न के साथ चारो ओर सन्नाटा छा जाता है, जैसे किसी ने बड़ा-सा पत्थर उठाकर सिर में दे मारा हो ।