Archive

Tuesday, 10 October 2017

मजदूरी

मजदूरी(लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम

        चार दिनों से भगीरथ बहुत परेशान हो गया था ,  रोजी रोटी की जुगाड़ में दिन दिन भर राठ रोड में खड़ा रहता, लेकिन कोई औने पौने दाम में भी उसे मजदूरी नही देता था ।  वह थक हारकर घर पहुंचा उसकी हालत देखकर पत्नी समझ गई कि आज भी मजदूरी नही मिल पाई है । वह दिलासा देती फिर भी उससे रहा न जाता तो वह कहती ऐसे कब तक चलेगा तीन माह से रोहित की फीस जमा नही की है वह हरेक दिन विद्यालय न जाने की जिद करता है । कहता है मुझे रोज कक्षा से बाहर खड़ा कर दिया जाता है फिर फीस के लिए मैडम कहती है ।  वह सबकुछ सुनते हुए मौन धारण किए रहा, उसे  कोई उपाय नही सूझ रहा था ।
           भगीरथ दो साल पहले ही अपने गाँव कानाखेड़ा से उरई पूरे परिवार सहित आ गया था । वह अनपढ़ था लेकिन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से रात दिन पति पत्नी मिलकर मजदूरी करते थे । सुबह राठ रोड पर पहुंच जाते जहाँ से कोई न कोई उन्हें ईट काम मे 350 रुपये मजदूरी पर ले जाते थे । बच्चों की पढ़ाई के साथ परिवार का भरण पोषण अच्छे से हो रहा था किंतु अचानक हुई नोटबन्दी से लोगों ने काम करवाना बन्द करवा दिया कभी कोई साहूकार काम करवाने के लिए मजदूर लेने आता तो कई मजदूर उसके पीछे पड़ जाते, जिससे औने पौने रुपये देकर जी भर काम लिया जाता, लेकिन नोटबन्दी के साथ बालू बंदी ने ईट गारे वाले मजदूरों की कमर तोड़ दी थी, जिससे उनके बच्चों की शिक्षा दीक्षा तो दूर खाने के लाले पड़ गए थे, उसी समस्या में आज भगीरथ का पूरा परिवार अभाव में जीने को मजबूर था ।

सूखा

सूखा(लघुकथा)
.... प्रदीप कुमार गौतम
  
      इस वर्ष राजीव ने खेतों में ज्वार, एवं अलग-अलग दलहन की बुवाई कर दी थी, जानवरों के लिए अलग से हरियाली बो दी, जिससे गाय भैंसों को चारा मिलता रहे पूरे क्षेत्र की खेती बरसात के पानी पर टिकी थी । वर्षा समय पर हो जाती, तो खेत लहलहा जाते किसानों के चेहरे खिल उठते थे, लेकिन लगातार तीन वर्षों से खेती बाड़ी में कुछ खास पैदा नही हो पा रहा था । उल्टे प्रत्येक वर्ष पांच-दस हजार की उधारी बढ़ती जा रही थी । 
         बुवाई होने के पश्चात पूरे बुन्देलखण्ड में सूखा पड़ गया । जानवरों के साथ लोग भी परेशान हो गए गुजारा कैसे करें ? दूर-दूर तक कोई रास्ता नही सूझ रहा था,  उसने गाय एवं भैंस को बेचने का प्रण किया, लेकिन बाजार में उचित दाम प्राप्त नही हुए । अकाल की स्थिति में राजीव खुद के परिवार का भरण पोषण में करने में असमर्थ हो गया । जिससे वह पूरे परिवार के साथ शहर में रोजगार की तलाश हेतु चला गया  ।
      उसकी भैंस तो रिश्तेदारों ने ले ली किन्तु गाय को अन्ना छोड़ दिया । आजकल गाँव की सभी गायें खड़ी फसलों को खा रही थी । आखिर करते भी क्या ? क्योंकि पूरा का पूरा क्षेत्र सूखा से ग्रसित था ।

Monday, 9 October 2017

मान्यवर साहेब

मान्यवर कांशीराम साहेब को 13 सितम्बर 2003 को जब ब्रेन स्ट्रोक हुआ तो उन्हें बत्रा हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया और 2003 के बाद वे सक्रिय राजनीति में नही आ पाए तथा बत्रा हॉस्पिटल में ही 09 अक्टूबर 2006 को उन्होंने अंतिम सांस ली । इन स्थितियों को देखकर जहन में एक प्रश्न कौंधता है कि मान्यवर साहेब की तबियत इतनी अधिक अस्वस्थ होने पर जहाँ बहिन जी को खाँसी, बुखार, ज़ुखाम हो जाने पर भी उन्होंने विदेश में इलाज करवाया है छोटे से छोटा नेता अलग-अलग डॉ0 को दिखवाता है सही इलाज न होने पर विदेश भी जाता है ऐसी स्थिति में मान्यवर कांशीराम साहेब को ऐसी कौन -सी बीमारी थी जिसका इलाज ही नही हो सकता था या उनके लिए विदेश से डॉक्टरों की टीम नही बुलाई जा सकती है ।
   हो सकता है कुछ साथियों को मेरा प्रश्न यह वाज़िब न लगे लेकिन आज नही तो कल कोई न कोई शोध कर्ता यह प्रश्न उठाएगा क्योंकि जिस महापुरुष ने एक वैचारिक भूमि तैयार करके एक महल खड़ा किया देश-विदेश में बहुजन राजनीति की आवाज बुलंद हुई । डॉ आंबेडकर एक व्यक्ति विशेष  न रहकर एक विचार के रूप में परिवर्तित हो गए । जिन्होंने बाबा साहेब के संविधान कि मूलभावना लोक तंत्र की वकालत की । उनके जाने के पश्चात लोकतंत्र पार्टी के अंदर मज़ाक बनकर रह गया । जिस ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरोध में पूरा का पूरा कारवाँ चला था 2007 के सत्ता में आने के पश्चात उसी का वर्चस्व पार्टी के अंदर कायम हो गया । सिद्धांत केवल थोथी कल्पना मात्र रह गयी । जिस चमचा युग की मान्यवर कांशीराम साहेब ने आलोचना की, वही घोर चमचा युग यहाँ प्रारम्भ हो गया . कार्यकर्ता की जगह अनजान पैसे वाले चेहरों को तबज्जो दी जाने लगी । मिशनरी कार्यकर्ताओं की जगह गुलाम मानसिकता के भक्त तैयार किए जाने लगे । देखते ही देखते एक बड़ा महल झोपड़ी में तब्दील हो गया । बुध्द के तर्कों की बात करने वाले पार्टी के लोगों से तर्क न करने की नसीहत देने लगे । ऐसा भयावह मंजर जिसमें अपनो के द्वारा अपने ही पीसे जाने लगे । बहुजन नाम केवल नाम तक ही सीमित रह गया । यह केवल चमार और ब्राह्मण जाति की संकुचित पार्टी बनकर रह गयी फिर भी लोग रोकते रहे कुछ मत लिखना भाई लोग नाराज हो जाएंगे आखिर नग्न नाच तुम करते रहो हम धूर्त बनकर देखते रहे । ऐसा न होगा जिसे तर्क यदि विरोधी लगे तो विरोधी समझे किन्तु इस विषय पर अब और नही रुक सकते हैं ।

यात्रा वृतांत- मेरी लखनऊ यात्रा:- कुछ खट्टा कुछ मीठा

मेरी लखनऊ यात्रा :-कुछ खट्टा कुछ मीठा
लेखक- प्रदीप कुमार गौतम

कई दिनों से इंतजार कर रहा था कि 6वें दलित साहित्यकार सम्मेलन में शामिल होना है हृदय में एक अलग तरह का कौतूहल बना हुआ था कितने लोग होंगे जिन्हें मैं लगातार पढ़ता हूँ वे सभी साहित्यकार आएंगे यह सोचकर भी मेरा मन गदगद हुआ जा रहा था । दलित साहित्य परिषद के अध्यक्ष प्रो0 टी0 पी0 राही जी ने एक माह पहले से ही दलित साहित्यकार सम्मेलन की सूचना फेसबुक, वाट्सअप इत्यादि माध्यमों से फैला दी थी । ऐसा नही है कि इससे पूर्व मैं सेमिनारों में नही गया हूँ लेकिन इस कार्यक्रम में शामिल होने कि दिली इच्छा थी । इसलिए सुबह ही तैयार होकर लखनऊ के लिए इंटर सिटी ट्रेन से रवाना हो गया । मानवेन्द्र सिंह का कॉल आया- "हेलो, प्रदीप भाई ! कहाँ पहुँचे ?
बस ! कानपुर पहुँच गया हूँ । मैंने जवाब दिया
अच्छा ! लखनऊ आ जाओ तो बता देना
हाँ ! ठीक है भाई
ट्रेन कानपुर तक तो अच्छे से चली इसके पश्चात उसमें निरन्तर रुकावटे अधिक आ रही थी वैसे ही मानवेन्द्र के कॉल लगातार आते जा रहे थे
मानवेन्द्र मेरा मित्र था जो डॉ अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ इंडिया(DASFI)  के माध्यम से तीन साल पहले से जुड़ा था जो लिंग्विस्टिक विषय में लखनऊ विश्वविद्यालय से शोधार्थी था । शोधमित्र होने की वजह से उसकी मुझसे बहुत अच्छी पटती थी । लखनऊ या उरई में हम लोगों की अक्सर मुलाकात होती ही रहती थी ।
लखनऊ पहुंचने के पश्चात सीधे लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंचा जहाँ मानवेन्द्र सुबह से इंतजार कर रहा था । उसके साथियों के साथ मैंने ढाबे में चाय की चुस्कियाँ ली । इसके बाद मैंने डॉ संगीता रावत जी कॉल करके कार्यक्रम प्रारम्भ होने की सूचना ली और हम सभी प्रेस क्लब के लिए रवाना हो गए । जहाँ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था बुद्ध वंदना के अवसर पर ही कार्यक्रम में शामिल हो गए जहाँ कार्यक्रम की अध्यक्षता महामहिम डॉ माताप्रसाद जी (पूर्व राज्यपाल, आंध्रप्रदेश) कर रहे थे । संचालन प्रो0 टी0 पी0 राही के हाथों में था
मैं अपने आँखों की प्यास को बुझाने के किए नामचीन दलित साहित्यकारों को देखने का प्रयास कर रहा था लेकिन उनके चेहरे इस कार्यक्रम से ओझल दिख रहे थे । मेरे चेहरे का रंग उड़ता जा रहा था और धीरे धीरे फीका पड़ता जा रहा था प्रेस क्लब की जगह देखकर मन पहले ही खिन्न हो चुका था अब दलित साहित्यकारों के नाम पर लखनऊ के ही कुछ नाम थे जो बहुत अधिक चर्चित भी नही थे और न ही उनकी दलित सहित्यिकी में कोई स्थापना थी । मेरे हृदय का गुबार ठंडा हो चुका था पूरे कार्यक्रम में केवल सत्तर से अस्सी लोग नज़र आ थे थे जबकि प्रो0 टी0 पी0 राही जी स्वयं लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है तब ऐसी स्थिति में शायद सभी शोधार्थी भी आ गए होते तो भी शायद संख्या अधिक होती । मैं लगातार इसी उधेड़ बुन में लगा थी कि अचानक मेरी नजऱ शोधमित्र धर्मवीर यादव गगन पर पड़ी । मन चहक उठा, चेहरे खिल गया मेरी दृष्टि फिर एक शोधमित्र को और खोजने लगी क्योंकि गगन जी अकेले हो ही नही सकते है और अचानक उनकी पीठ में मेरी नजरें टिक गई आखिर मेरी नजरों के सामने आशीष कुमार दीपांकर भी आ गए थे । दोनों ही उम्दा क़िस्म के इंसान साहित्य में शोध के लिए शायद इनके इतनी यात्राएँ किसी और ने की हो लगातार झोला उठाकर किसी भी समय किसी भी शहर में मुठभेड़ हो सकती है और अचानक हुआ भी । इन दोनों ही साथियों से फेसबुक के माध्यम से मित्रता हुई थी और पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैम्पस में मुलाकात हुई थी । जहाँ पर सुनील कुमार यादव के छात्रसंघ उपाध्यक्ष की कैम्पेनिंग हेतु गए हुए थे । अगस्त के माह था आशीष जी पसीने पसीने हुए जा रहे थे धर्मवीर जी लगातार युवा साथियों को समझाने में लगे हुए थे । इसके पश्चात हम लोग दो घंटे तक साथ मे रहे जिसमें देश दुनिया की तमाम मुद्दों को लेकर चर्चा हुई थी हम तीनों में खास बात यह थी कि तीनों के ही शोध विषय दलित आत्मकथाओं पर ही थे । इसके बाद मित्रता गहराती गई और यह दूसरी मुलाकात थी लखनऊ के प्रेस क्लब में हो गई थी । दलित लेखकों से न मिल पाने का मलाल कब हवा हो गया मालूम ही नही पड़ा किन्तु प्रो0 कालीचरण स्नेही सर से मुलाकात करने की इच्छा अधूरी रह गयी थी ।
मानवेन्द्र जा चुका था उसके स्थान पर अब साहित्यिक मित्रों का साथ मिलना लाज़मी थी । तभी आशीष जी ने दिनेश कुमार जी मुलाकात करवाई जो वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से शोधार्थी थे ।  कार्यक्रम के समापन पर हम लोगों ने सभी के साथ फोटो क्लिक करवाई और बाहर बैठकर एक घंटे तक विविध मुद्दों पर गहन चर्चा की ।
   आज 07 अक्टूबर को मेरे जन्मदिन पर सुबह से ही कई कॉल आ चुके थे । जिससे बातचीत में व्यवधान आ रहा था इसलिए मोबाइल को साइलेंट कर दिया था ।चार अलग-अलग विश्वविद्यालयों से चार मित्र एक साथ हुए थे । हम लोगों के रात्रि विश्राम के स्थान अलग-अलग थे ऐसे में एक साथ समय बिताने की दिली इच्छा थी इसलिए ई-रिक्शा करके हम लोग एक  होटल में भोजन करने के लिए पहुँचे । होटल की दशा और मीनू में बहुत अंतर था शायद यह राजधानी होने का प्रभाव था मैं इसी उधेड़बुन में लगा था कि अपने जन्मदिन के बारे में साथियों को अवगत कराऊँ कि नही  बाद में मैंने बता ही दिया जिस पर धर्मवीर भाई ने अपनी ओर से पार्टी दी । भोजन के लिए ऑर्डर कर दिया गया सामाजिक सहभाव कैसे जाग्रत हो,  समानता को कैसे स्थापित किया जाए ? सभी के विचार जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए अंतरजातीय विवाह पर आकर टिक गई जब अंतरजातीय विवाह होंगे तो रक्त कि शुद्धता की पोंगापंथी ढह जाएगी ।
लोगों में आपसी भाईचारे का भाव जागृत होगा ईर्ष्या द्वेष से निजात मिलेगी और बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर जी के विचारों का मूल भारत का निर्माण होगा जहाँ जाति गत धर्मगत लिंगगत भेदभाव बन्द होकर सामाजिक समरसता के राष्ट्र का निर्माण होगा । वेटर थालियाँ तैयार करके ले आया था शाही पनीर, आलू पालक, दाल फ्राई के साथ रोटियाँ सामने थी भोजन को देखकर मुँह में पानी आ गया था एक ओर विमर्श पर चर्चा दूसरी ओर भोजन दोनों को एक साथ चलाने की रजामंदी हुई  । आशीष दीपांकर जी की इंगेजमेंट हो चुकी थी तब वे अंतरजातीय विवाह की दौड़ से बाहर हो चुके थे लेकिन हम तीन लोग अंतरजातीय विवाह करने का एक दूसरे को संकल्प दिला रहे थे जिसमें दिनेश कुमार जी कुछ शांत नजऱ आ रहे थे उन्हें भोजन के बाद अस्पताल निकलना था जहाँ उनका अपना कोई खास भर्ती था उसकी दावा का का टाइम हो चुका था इसलिए वो उलझन में थे सबसे कम रोटियाँ भी उन्होंने ही खाई थी ।

लेकिन मैं तो आज वैसे भी बर्थडे बॉय था तब

Sunday, 8 October 2017

सोच (लघुकथा)

सोच(लघुकथा)
......प्रदीप कुमार गौतम
       रवि के ऊधम से परेशान होकर मैंने आज मीरा मैडम से मिलने का निश्चय किया, मीरा जी रवि की माँ थी  । कई दिनों से उसके कृत्य से मुहल्ले वालों को  परेशान हो गए थे । घर में पहुंचा तो बड़े आदर भाव से उन्होंने बैठने को कहा मैं शांत होकर बैठ गया । किस बात कैसे से शुरू करूँ इसी उलझन में था यदि बेटे की तुरन्त बुराई करता हूँ, तो शायद इन्हें अच्छा न लगे इसलिए तारीफ करते हुए बात करने का निश्चय किया ।
'रवि तो बहुत अच्छा लड़का है, वह आधुनिकता से लबालब है' मैंने कहा
'हाँ भाई साहेब ! वह लगातार पढ़ता रहता है, उसका व्यवहार अच्छे -अच्छे लोगों से है और तो और उसकी दस गर्ल फ्रेंड्स है ।' उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया
मैं सोचने लगा कि क्या ये अपनी लड़की लिए भी इसी तरह से गर्व से बखान करेगी ?

Friday, 6 October 2017

जरनल डिब्बा (लघुकथा)

जरनल डिब्बा(लघुकथा)
.........प्रदीप कुमार गौतम
        एक माह से लगातार प्रयास के बाद रिजर्वेशन नही हो पाया था । दिवाली में पूरा परिवार एकत्रित हो रहा था तो मुझे भी घर पहुंचना था । साल में एकमात्र यही त्योहार था जिसमें सभी से मुलाकात हो जाती थी । सुबह तैयार होकर स्टेशन पहुँचकर रेलगाड़ी का इंतजार करने लगा ।  रेलगाड़ी के आने पर जब जनरल डिब्बे में जैसे ही कदम रखा उसके हालात देखकर कदम ठहर से गए । बाथरूम से लेकर बालकनी तक आदमी औरतें ऐसे ठुंसे हुए थे जैसे मुर्गों को हलाल करने से पहल गाड़ियों में ठूँस कर ले जाया जाता है । किसी तरह अंदर  पहुंचा तो सिर में पोटली में झूलता आदमी टकरा गया फर्स में लेटे आदमी के ऊपर पैर पड़ गया तो उसने उसनीदें में अजीब सी भद्दी गाली दी और फिर सो गया दुर्गंध ऐसी की एक क्षण भी राही न आये । लगातार बाथरूम में जाते लोग बिना मल साफ़ किए हुए हाथों से सभी के ऊपर रखते अपनी सीट तक पहुंचने के लिए आतुर  । चार-चार दिन का सफ़र केवल खड़े होकर करने वाले नींद में ऐसे ढेर कि कोई भी लात मारे उड़ककर एक ओर टिक जाते । रेलगाड़ी का जरनल डिब्बे में हताशा, निराशा, गरीबी दुनिया का बेवस भारत चल रहा था ।

Monday, 2 October 2017

गरबा (लघुकथा)

गरबा(कहानी)
.......प्रदीप कुमार गौतम
   आज चारो ओर हलचल मची हुई थी ,धीरे-धीरे लोग एकजुट होकर बड़ी माता मंदिर के पास पहुंच रहे थे, वहाँ पर  गरबा के खेल का आयोजन किया गया था ।
जयेश मां से बोला -' अम्मा मैं गरबा का खेल देखने जा रहा हूँ '
बेटा ! उहाँ पर मत जाओ उस मुहल्ला के छत्रिन में हमाई जाति के लिए घृणा भरी हुई है' । मां ने रोका
"ये सब पुरानी बातें है,आजकल कोई जाति नही मानता है, यह देश भारतीय संविधान से चलता है माँ" ऐसा कहते हुए वह बाहर निकल गया ।
गरबे के खेल की पूरी तैयारियां हो गई थी । नई नवेली दुल्हनें, बूढ़ी औरतें एवं नौयुवतियों ने रंग विरंगे कपड़ो को पहनकर आई थी एक से एक सुघर नौयुवतियां थी जिन्हें देखकर छत्रिन के लरका जोर-जोर से सीठी मार रहे थे चारो ओर मोहक दृश्य था ।
जयेश बड़ी माता के मंदिर की सीढ़ियों में जाकर बैठ गया ।
खेल शुरू हो चुका था, सभी लोग खेल का लुफ्त उठा रहे थे । तभी एक अधेड़  उम्र का आदमी हाथ मे लाठी लिए भीड़ को चीरता हुआ मंदिर के पास आ धमका और जोर से बोला -' मादर...... भोस... के मंदिर अपवित्तर कर दीनो'
जयेश कुछ समय के लिए सहम गया इसके बाद बोला - 'काहे चाचा मोय बैठन से अपवित्तर कैसे हुआ मंदिर का हम इंसान नही है का'
उसकी बातें सुनकर अधेड़ जलभुजं गया और गरजकर बोला- ज्यादा मुँह चलाया तो गां... में डंडा घुसेड़ दूँगा ।तुम भला इंसान खुद को कबसे मानने लगे ।'
जोर-जोर की चीखें सुनकर आसपास के सभी पटेल , क्षत्रिय एकजुट हो गए ।
जयेश को मंदिर में बैठा देखकर भीड़ भेड़िया बनती जा रही थी जो उस बालक को खाने की चेष्टा कर रही थी ।
लंबी चोटीधारी लंपट पंडित बोला ई ससुरा चमरा- चुहड़ौ को शर्म नही है जब देखो संविधान और अम्बेडकर को ही बखानते रहते हैं हम नही मानत उस चुहड़े के संविधान को और गरबा देखन को अधिकार का तुम्हाए बाप ने दे दौ का ।
रामधन ठाकुर जलीकटी गालियां देते हुए चला आ रहा था उसने आकर जयेश के सिर पर जोरदार लाठी से प्रहार लिया वह सीढ़ियों से नीचे गिर गया खून की धारा बह निकली ऐसे में ही लंपट पंडित बोला ई हरामखोर चूहड़ा आज बचकर न निकले सदियों के लिए दोबारा ई मुहल्ला में झाखन को प्रयास न करे
चारो ओर से लाठियों डंडो लातो से प्रहार होने लगे वह हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता रहा लेकिन भीड़ बिना कुछ सुने हमला करती रही
खून से मंदिर का आँगन रम गया
खून से लथपथ लाश पड़ी हुई है
उसकी माँ दहाड़े मारकर रो रही है
पिता पछाड़ खा खाकर गिर रहा है ।
मनु जोर जोर से अट्टहास कर रहा है ।
आज 21वीं सदी में भी  जयेश प्रत्येक दिन जातिवाद के दानव के भेंट चढ़ रहा है ।

Wednesday, 27 September 2017

बैंक का कर्ज (लघुकथा)

बैंक का कर्ज(लघुकथा)
.....प्रदीप कुमार गौतम
एक समय उसका पूरे क्षेत्र में नाम था बीस कोस तक आसपास के सभी गाँव वाले जानते थे ससम्मान बुलाते , पंचायत निपटवाते थे तब उसकी पचास बीघे खेती में दो-दो सौ मन अनाज होता था, तीन-तीन गोई से खेती होती थी । खेतो में दस-बीस मजदूर सदैव काम करते रहते थे, लेकिन दस साल से पूरा बुंदेलखंड सूखे की चपेट में था आखिर जालौन जिले की उत्तर दिशा में मुख्यालय से पचपन कि0 मी0 दूर विकास के नाम पर बिजली पानी की सुविधा से वंचित बेतवा नदी के मुहाने में बसा कानाखेड़ा गाँव जहाँ आज भी अख़बार नसीब नही होता है सूखे से बुरी तरह प्रभावित था जहाँ से अधिकतर लोग भरण-पोषण हेतु नगरों की ओर पलायन कर गए है । ऐसी स्थिति में सूखे ने राजेन्द्र को बुरी तरह हताहत कर दिया उसका राजसी ठाटबाट खत्म हो गया था । बैलों से खेती बंद होने के कारण बैल अदर गए । बछड़ो का नस्ल से मतलब बन्द करने की वजह से गाय पालना भी लोगों ने बन्द कर दिया । जब राजेन्द्र के खेतों में घर के बैलों से खेतों की बखराई होती तो आसपास के खेतों वाले लोग गोईं को निहारने के लिए एकजुट हो जाते थे , लेकिन सूखे पड़ने की वजह से बैंक के कर्ज में वह डूब गया था खेतों में सालभर खाने के लिए गेंहूँ नही हो पाता था । ट्रैक्टर की बखराई बुवाई में पूरी फसल चली जाती, जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी ढेला भर की बचत नही हो पाती थी, जिसकी वजह से बैंक का कर्ज बढ़ता जा रहा था , बैंक से लगातार नोटिस आते थे, लेकिन वह असहाय होकर एक कोने में गुमसुम- सा बैठ जाता , उसके शरीर में मांस की जगह हड्डियों का ढांचा बचा था । दो-तीन बार कर्ज की वजह से पुलिस बीच गाँव से उठा के गई जीवन भर की जमा पूंजी सम्मान भी जाता रहा । हमेशा हँसने वाला राजेन्द्र आज दुनियादारी मतलब खत्म करके एकांत रहने लगा था । एकाध बार मैंने उसका हालचाल जानने का प्रयास किया तो उसने गर्दन हिलाकर ही प्रतिक्रिया दे दी , आखिर बैंक के कर्ज ने उसके स्वाभिमान को धूमिल कर दिया था ।

Tuesday, 26 September 2017

नशाखोरी (लघुकथा)

नशाखोरी( लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम
मैं मित्र मनीष के साथ स्टेशन पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे तभी मेरी नजर पाँच छः किशोरों पर पड़ी मटमैले कपड़े, चिपके गाल सूखे होंठ ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके शरीर से खून का प्रत्येक कतरा निकाल लिया हो आपस में लड़ते झगड़ते मैं उनकी प्रत्येक हरकत पर नज़र रखे हुए थे उनमें से एक लड़के ने एक बोतल निकाली दूसरे ने टायर को चिपकाने वाला सॉल्यूशन निकाला जिसे बोतल में डालकर पानी के साथ मथने लगे इसके बाद सभी ने छोटे से मटमैले कपड़े को उस पानी को भिगोकर सभी नाक में लगा लगाकर सूंघने लगे धीरे-धीरे वे सभी मदहोश हो गए मदहोशी में ही बड़े बच्चे छोटों को छेड़ने लगे कामुकता को जाग्रत करने लगे वे लेटे-लेटे मां-बहिन की गाली बके जा रहे थे मैंने मनीष से पूछा यह क्या है उसने बताया कि यह सॉल्यूशन का नशा है जो सबसे अधिक गंदा एवं बालकों में विकृति उतपन्न करने वाला है नशे एवं कामुकता से भरे वे युवा बेहाल थे  अभाव से भरा बचपन व्यक्ति को अपराध की ओर अग्रसर कर देता है और यही स्थिति इन बच्चों की थी । थोड़ी देर बाद जैसे ही ट्रेन आई, वे सभी ट्रेनों के अलग-अलग डिब्बो में अपनी अपनी झाड़ू लेजाकर झाड़ू लगाने लगे एवं नशे की जुगाड़ हेतु हाथ फैलाने लगे ।

सुकून (लघुकथा)

एक माह से भागदौड़ की वजह से पुस्तकालय के दर्शन नही किए थे पढ़ने का अभ्यास खत्म-सा हो गया, घर में कभी पुस्तकों को उठाकर पढ़ने का प्रयास करता, तो दो-चार पन्ने पढ़ने के बाद उसे नींद आ जाती थी जिससे वह तनाव में रहने लगा क्योंकि एग्जाम जितने पास में आ रहे थे उतना उसका दिमाग उलझनों में फंसता जा रहा था आज वह कॉलेज पढ़ाकर सीधे लाइब्रेरी पहुंच गया और कोई रोचक उपन्यास की तलाश करने लगा जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रेम की अभिव्यंजना हो पुस्तक खोजते-खोजते उसकी निगाह नागफनी के  आत्मकथाकार रूपनारायण सोनकर के उपन्यास दंश में पड़ी उसे दंश की भूमिका मालूम नही थी, लेकिन नागफनी में दिए विद्रोह के स्वर उसे दीवाना बना गए थे उसकी निगाहों में नागफनी विशिष्ट आत्मकथा थी , जो दलित समाज को संघर्ष करने की प्रेरणा प्रदान करती है ईट का जवाब पत्थर से देने के लिए उत्प्रेरित करती है । रूपनारायण सोनकर की जैसी आत्मकथा है वैसा ही रोचक उनका उपन्यास है वह पढ़ने बैठ गया लेकिन नींद की वजह से वह बार-बार आँखों मे पानी का छीटा मरता जैसे जैसे उपन्यास को पढ़ता गया उसका ध्यान एकाग्रचित्त होता चला गया उसे मालूम भी नही पड़ा कि कब लाइब्रेरी का समय पूरा हो गया उपन्यास उसके एग्जाम में सहायक नही था लेकिन उसे आत्म संतुष्टि थी कि उसने कुछ पढ़ाई की । लाइब्रेरी में उसे जितना सुकून मिलता था अन्य कहीं पर नही वहाँ वह अनचाहे भी विभिन्न पेपरों के आर्टिकल पढ़ जाता था , विविध जानकारियों के साथ सतत अध्ययन का अभ्यास उसके हृदय को सुकून देता था उत्साह से उसमें चेतना का संचार होता था , आज उसे बहुत ही सुकून प्राप्त हुआ

Monday, 25 September 2017

विद्रोह (लघुकथा)

विद्रोह(लघुकथा)
.......प्रदीप कुमार गौतम
मास्साब की आदतों में कोई सुधार नही आ रहा था वो रोज झाड़ू हाथ मे पकड़वा कर स्कूल साफ करवाते थे भला उन्हें मना कौन करे जो भी मना कर देता उसे बेरहमी से पीटते थे । हरिदास सिंह की पोस्टिंग चतेला के पास अपने गांव कानाखेड़ा में ही हो गयी थी घर में राजसी ठाटबाट ऊपर से ठाकुरैसी गांव में दम से चलती थी  । सुबह स्कूल में राजेंद्र को झाड़ू लगाने का आदेश दिया लेकिन उसने मना कर दिया जिससे उसने पास बुलाकर पेट की खाल तानते हुए बोला अबे चमरे ! तुम लोग पढ़ाई करोगे तो हमारी गाय कौन चरायेगा बक्खर कौन हकेगा ? जैसे जैसे वह खाल तानता था राजेंद्र ऊपर की ओर खड़ा हो जाता था
वह मन ही मन आग बबूला हुआ जा रहा था उसकी हालत खराब हो गयी थी आठ साल का बालक तीस साल के द्रोणाचार्य की गिरफ्त में था वह विद्रोह की मुद्रा में उससे छूटना चाहे रहा था  जैसे ही मास्साब ने उसे छोड़ा  उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गयी उसने सोच लिया था या तो पढ़ाई छूटेगी या इस मास्साब का सिर फूटेगा । छूटते ही वह स्कूल से बाहर की दौड़ा उसे एक अधुवा गुम्बा मिल गया आव देखा न ताव राजेन्द्र ने मास्साब के सिर पर गुम्बा दे मारा ।

Friday, 22 September 2017

स्थाई जॉब (लघुकथा)

लघुकथा
स्थाई जॉब
(प्रदीप कुमार गौतम)
  नौकरी  की चाहे में वह सब कुछ भूल  सा गया था , रिश्तेदार, मित्र, घर के लोग टोकते अम्मा  पूछती कब तक हिल्ला हो जैहै लला, तुम्हाई नौकरी कब लगहै , बऊ कहती  अब तो हमाई अँखियाँ तरस गई नातिन बहू खों देखन के लाने कित्ते नौनी लड़कियन के रिश्ता आत तुम हो तो हाँ नही करत । वह चुपचाप सुनता रहता बिना जवाब दिए घर से बाहर निकल जाता ।  वह पाँच साल से नौकरी के लिए प्रयासरत था किन्तु उच्च शिक्षा में कभी कभार वैकेंसी निकलती थी विश्वविद्यालयों में तो कई जगह फॉर्म भरे थे लेकिन कहीं से साक्षात्कार के लिए ही नही बुलाया गया प्राइवेट महाविद्यालय में पढ़ाते हुए उसे आठ हजार रुपये मिलते वे सभी फॉर्म खर्चे पर ही खर्च हो जाते थे उसे कहीं ठौर नही दिख रहा था हर फॉर्म के साथ उम्मीद बांधता कि इसमें कोई स्थायी जॉब मिल जाएगी ।
अब तो उसके दोस्त भी उसे निठल्ला समझने लगे थे, उसने कितने संघर्ष से पीएचडी में एडमिशन पाया था कितने लोग नाराज थे उसके पीएचडी करने के फैसले थे सब कहते का करोगे पीएचडी करके जब नौकरी ही नही है उसके साथ के सभी लड़के प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल में जॉब पा लिए थे  लेकिन उसने उच्च शिक्षा में जाने का जो रास्ता चुन लिया था । इसीलिए उसके पिता भी अब रूठे से रहने लगे थे वह प्राइवेट जॉब भी करता किंतु स्थाई जॉब की तलाश में दर-दर भटकता था उसके जैसे पीएचडी धारी हजारो युवा पाँच-आठ हजार रुपये की नौकरी करने के लिए मजबूर थे ।

अन्ना प्रथा (लघुकथा)

लघुकथा
  अन्ना प्रथा
(प्रदीप कुमार गौतम)
इस साल गाड़ी मेहनत करके उसने  खेतों में रबी की फसल बो दी । वह प्रत्येक साल की तरह विचार करता फसल अच्छी होगी तो पिछले साल की उधारी पट जाएगी, बीज भात के लिए कुछ दाना पानी रख लिया जाएगा ,घर में बैठी सयानी बिटिया कि शादी कर दी जाएगी । खेतों में चना के बुटो में गुलाबी रंग के फूल ऐसे लहलहा रहे थे जैसे कोई नवयुवती खिलखिला के हँस रही हो । इस बार की खेती में फसल अपने यौवन को धारण किए किसानों के हृदय में आकांक्षाओं को बड़ा रही थी । जानवरों के अन्ना होने की वजह से वह हर दिन घने अंधेरे में खेत की रखवारी करता वहीं लेटता और चाँदनी रात के चाँद को देखकर ख्यालों में डूब जाता कि बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई, पत्नी की धोती खरीदने के अनचाहे ख्वाब दौड़ने लगते थे, उसने न कभी गर्मी देखी न सर्दी बस खेतों की रात-दिन रखवाली की । एक दिन उसे साहड़ू की बिटिया की शादी में खेतों को छोड़कर जाना पड़ा । खेत को खाली पाकर दो सौ गायों के झुंड ने खेत को रात भर में खलिहान बना दिया, जब वह सुबह शादी से लौटकर खेतों पर गया तो सिर पकड़कर बैठ गया उसकी उम्मीदे धरी की धरी रह गई वह सोचने लगा कि मैं किसके नाम पर FIR करूँ आखिर कौन इन अन्ना जानवरों के लिए दोषी है ?

कुंडली (लघुकथा)

लघुकथा
       कुंडली
(प्रदीप कुमार गौतम)
लम्बी चोटी, बड़ा टीका, हाथ में कलावा बांधकर अपनी जाति को छुपकर वह मैडम का खास बनने का प्रयास करता रहता था । कुछ दिनों बाद RDC की तिथि घोषित हो गयी जिसके लिए वह सभी मूल कागज लेकर मैडम के घर पहुँचा । उन्होंने उसे बड़े आदर से  सोफे पर बैठाया, चाय पिलाई तथा लड़की की कुंडली लेकर हरेन्द्र के सामने रख दी और बोली पंडित जी मेरी बिटिया की कुंडली देखकर बताओ इसका भविष्य कैसा होगा?  वह चकरा गया  मौन धारण करके मन में सोचने लगा ये मुझे ब्राह्मण समझ रही है । हलक से आवाज नही निकली गला रुंध गया । कुंडली सामने पड़ी थी मैडम जी बार-बार उसे देख रही थी । वह पसीना पसीना हुए जा रहा था वह पछता रहा था कि मैंने जाति क्यो छुपाई ।

वह शूद्र है (लघुकथा)

लघुकथा
      (प्रदीप कुमार गौतम)
              वह शूद्र है
सभी प्राध्यापकों का प्रिय होने की वजह से आज एम0 ए0 की मौखिकी में परीक्षा सहयोग हेतु उसे भी बुला लिया गया । परीक्षा सम्पन्न होने के बाद रामराज सर ने उससे बोला कि जाओ भोजन हेतु मिश्रा सर को भी बुला लो ।
उसने मिश्रा जी से कहा सर आपको रामराज सर भोजन के लिए बुला रहे है । वे अचानक उखड़ गए एवं चीखते हुए बोले रामराज शूद्र हैं और मैं शूद्रों के साथ भोजन नही करता ।  यह सुनकर वह आवाक रह गया वह सोचने लगा कि रामराज सर तो ओबीसी है फिर इनसे इतनी जब इनसे इतनी घृणा तो मैं तो sc चमार हूँ मुझसे कितनी घृणा होगी इन्हें यह सोचते हुए वह करुणा में डूब गया ।

Wednesday, 20 September 2017

बड़े बाबू(लघुकथा)

लघुकथा
बड़े बाबू
(प्रदीप कुमार गौतम)
वह सुबह से ही तैयार होकर प्रसन्नचित्त मन से झाँसी के निकला रवाना हुआ, क्योंकि उसकी फाइल में अब कोई कमी नही थी । इसलिए उसे आज काम पूरा होने की उम्मीद थी, एक माह की भागदौड़ से राहत मिलने वाली थी । वह सोच रहा था कि आज काम पूरा हो जाएगा, तो पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करके होने वाली परीक्षाओं को पास किया जाए । वह झगड़े के मूड से हटकर सामंजस्य की स्थिति में नजर आ रहा है उससे घुस माँगी गई थी किंतु उसने कमियों को पूरा किया घुस बिल्कुल नही दी । उसकी बस जैसे ही विश्वविद्यालय के सामने रुकी वह उतरकर तुरन्त यूजीसी सेल पहुंचा तथा अपनी फाइल के संबंधित कागज तुरन्त बाबू को सौंप दिए । बाबू ने काम को टालना चाहा तो वह उसी की चेम्बर में डट कर बैठ गया । बाबू भी संबंधित कागजों की ड्राफ्टिंग करने लगा, पूरी फाइल तैयार होते-होते चार बज गए । इसके पश्चात बड़े बाबू के चेम्बर में फाइल पहुँची, किंतु बड़े बाबू गायब मिले । विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों में उसे खोजा गया, किंतु वह कहीं दिखाई नही दिया, छोटा बाबू भी खोजने लगा, लेकिन उसके दूर-दूर तक कहीं दर्शन नही हुए । फाइल को ज़बरन बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित कुलसचिव के ऑफिस भिजवाया गया, किंतु उन्होंने भी बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित फाइल में अपने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया । एक माह से भटकने के बाद भी आज फिर से उसकी फाइल डंप हो गयी । वह सोचने लगा कि योगी द्वारा सुबह 10  बजे से शाम 05 बजे के कार्यालयी आदेश के लतीफे केवल कागजी ही है, क्योंकि आज बड़े बाबू के समय से एक घंटे पहले चले जाने की वजह से फाइल  फिर लटक गई  ।  उसका धैर्य बेकाबू होकर कि अंगारा बनता जा रहा था पता नही किस दिन विस्फ़ोट हो जाए ?

Tuesday, 1 August 2017

खामोश-सा बैठा हूँ

आपके साथ बिताया
हर वो पल याद आता रहेगा
आपका स्नेह, प्रेम
सबक जिंदगी के
सब कुछ तो
याद हैं
खुश तो नही हूँ
पर
दुःख भी प्रकट
नही कर सकता
बस खामोश-सा
रहने लगा हूँ
यह सोच कर
विभाग में आप
साथ नही होंगे
अनचाहे
आँसुओ की
धारा
फूट पड़ती है
गला रुंध जाता है
बस रोकता हूँ
किसी तरह
खुद को
आपकी सीख से
दृढ़ करता हूँ
लेकिन
अभी फिलहाल
खामोश-सा बैठा हूँ
--------------------
समर्पित सादर गुरुवर डॉ जयशंकर तिवारी सर को

Monday, 12 June 2017

खबरें

#खबरें

चेतना स्फूर्ति को भरकर
सुबह जब दस्तक देती है
आलस्य को त्यागकर तब
जागना होता है
मन शांत चित्त होकर
अपने आराध्य का आराधन करता है
किन्तु जब अखबारों में
यकायक नजर पड़ती है
वही नित्य की लूट खसोट
अपराधों लगा हो जमावड़ा जैसे
स्त्री का स्त्री के साथ दुर्व्यवहार
तो सवर्णों का दलितों पर
दलितों का प्रशासन पर
हिंदुओं का मुस्लिम पर
चारो ओर हाहाकार चीख पुकारों की खबरें
मन को गहरे झंझावातों में ले जाकर
हृदय में सुबह से ही उलझन पैदा कर देती है
आखिर कब मनुष्य मानवता को स्वीकार करेगा
कब मनुष्य से मानवता का व्यवहार करेगा ।

           प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

Saturday, 10 June 2017

अरविंद भारती के काव्य संग्रह 'युद्ध अभी जारी है' में संघर्षशील समाज की अभिव्यक्ति

प्रिय साहित्य मित्र अरविंद भारती जी द्वारा रचित "युद्ध अभी जारी है" नामक कविता संग्रह चार दिन पूर्व प्राप्त हुआ । यह 95 कविताओं का एक सशक्त काव्य संग्रह है । जिसमें दलित एवं स्त्री की पीड़ाओं को अभिव्यक्त किया गया है । भारती जी की पहली कविता 'कैद में हूँ' से  कविता संग्रह में व्याप्त सामग्री का मार्ग प्रशस्त करती है । भारतीय समाज में जातिगत व्यवस्था के कारण मनुष्य से मानव होने का अधिकार छीन लिया जाता है और जाति उसके पीछे दौड़ने लगती है । जहाँ व्यक्ति जाता है वहाँ जाति पहुँच जाती है । यदि कोई नवयुवक सूट बूट पहने हुए है, तो उससे उसकी जाति जानने के लिए नाम पूछा जाएगा , जब नाम से संतुष्ट नही हुए , तो पूरा नाम , गाँव का पता पूछा जाएगा और जैसे ही उसकी जाति की जानकारी हुई । वैसे ही दूषित मानसिकता के लोग उस नवयुवक से  इस तरीके  से व्यवहार करने लगते हैं, कि उसने कोई अपराध कर दिया हो । अरविंद भारती जी इस संदर्भ में अपनी कविता 'कैद में हूँ' में कहते हैं-
"और
जहाँ नही पहुँच पाती
वहाँ पूछते हैं नाम
पूरा नाम और पता
करते हैं एक्स-रे
कभी इस एंगिल से
कभी उस एंगिल से
जैसे मैं किसी और ग्रह का प्राणी हूँ
असल में जानना चाहते हैं जाति मेरी ।
इस तरह अरविंद भारती जी ने पूरे कविता संग्रह में जातीय पीड़ा से ग्रसित लोगों की समस्याओं को उजागर किया है ।
अभी मात्र साधारण चर्चा की गई है आगे बहुत जल्द भारती जी के कविता संग्रह की समीक्षा आप सभी की मध्य प्रस्तुत होगी ।
कविता संग्रह प्रेषित करने हेतु भारती जी का आभार

     प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी
मोबाइल-8115393117

Sunday, 26 March 2017

मैं नास्तिक क्यों हूँ -भगत सिंह

भगतसिंह 


भगतसिंह
मैं नास्तिक क्यों हूँ (अंग्रेज़ी: Why I am an Atheist) भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह द्वारा लिखा गया एक लेख है, जो उन्होंने लाहौर की केंद्रीय जेल में अपने बंदी जीवन के समय लिखा था। यह लेख 27 सितम्बर, सन 1931 को लाहौर के समाचार पत्र 'द पीपल' में प्रकाशित हुआ था। इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ-साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है। यह भगतसिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में से एक रहा है।

बाबा रणधीर सिंह और भगतसिंह का वार्तालाप
भगतसिंह स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह (1930-31) के बीच लाहौर की केंद्रीय जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे, जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगतसिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज़ होकर कहा- "प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो, जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है।" इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने निम्न लेख लिखा-

लेख

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त - शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ - मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?

मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ - यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनों ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...