Sunday, 28 December 2025

धम्म-पथ


बुद्ध ने कहा—
जीवन दुःख है,
पर यह अंतिम सत्य नहीं,
क्योंकि दुःख-निरोध भी है।
तृष्णा से बँधा मन
बार-बार जन्म लेता है,
और सम्यक दृष्टि
उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।
न हिंसा में धम्म है,
न लोभ में शांति,
करुणा और मैत्री
ही आर्य जीवन की पहचान हैं।
जो शील को आधार बनाए,
समाधि में मन को स्थिर करे,
और प्रज्ञा से सत्य देखे—
वही अष्टांगिक मार्ग का यात्री है।
बुद्ध ने ईश्वर नहीं दिया,
उन्होंने स्वावलंबन दिया,
कहा—
“अप्प दीपो भव”
अपने दीपक स्वयं बनो।
जब अविद्या क्षीण होती है,
और चेतना निर्मल होती है,
तब मन
निर्वाण की शीतल छाया में
विश्राम करता है।

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