Sunday, 29 May 2022

भइया अपने गाँव में (बुंदेली काव्य) का लोक सांस्कृतिक अवलोकन

भइया अपने गाँव में (बुंदेली काव्य) का लोक सांस्कृतिक अवलोकन
प्रदीप कुमार, शोधार्थी
हिंदी विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई, जालौन(उ0प्र0)
ईमेल-pradeepkumargautam72@gmail.com
मोबाइल- 8115393117, 7526050125

         'भइया अपने गाँव में' बुन्देली काव्य श्री बाबूलाल द्विवेदी जी द्वारा रचित मुक्तक रचनाओं का संकलन है जिसे उनके पुत्र डॉ राकेश नारायण द्विवेदी जी द्वारा संकलित किया गया है । इस बुन्देली काव्य में रचनाकार ने बुन्देली लोक में प्रचलित जनजीवन का प्रत्येक दृश्य उकेरा  है ।जिसमें लोक गीत, लोक साहित्य, लोक नृत्य, लोक भोजन, लोक उत्सव, लोक भजन इत्यादि का पर गहन दृष्टि डाली है लेखक मूलतः संस्कृत के प्रकांड विद्वान है लेकिन उनका जमीनी बोली बुन्देली का भी उतना ही गहन अध्ययन है । बुन्देली धरा के लोक में बहुत सी चीजें वाचिक परंपरा के रूप में प्रचलित है, जब हम उन्हें लिखित परम्परा में नही लेते है, तो वे चीजे कुछ समय पश्चात विलुप्त हो जाती है और लोक परम्पराओं के समापन से पीढ़ियों के इतिहास से हम वंचित हो जाते है इसीलिए इस काव्य ग्रंथ में रचनाकार ने बुन्देली साहित्य, शब्दों के साथ इतिहास को भी जिंदा रखने का काम किया है । 'भइया अपने गांव में' बुन्देली काव्य को पढ़ने के पश्चात बुंदेलखंड का लोक सामने दिखाई देने लगता है और यह विचार मन मे अनायास उत्पन्न होता है कि आज का युवा क्या इस लोक साहित्य से परिचित है या बीस साल पहले तक गाँव में प्राप्त होने वाली संस्कृति को वह जानता है ।  आज राष्ट्रीय भाषा भी आज अपनी राष्ट्रीयता से जूझ रही है, जिसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय बोलियों को तवज्जो न देना है । जबकि  किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय भाषा का विकास उसकी बोलियों की सम्पन्नता पर निहित रहता है । इस संदर्भ में 'भइया अपने गाँव में' की भूमिका में डॉ राकेश नारायण द्विवेदी लिखते है -" हिंदी के पाठकों एवं श्रोताओं के बीच अपनी बोलियों के शब्दों, उनके बदलते अर्थ, रस, गुण और उसके मूल आशय से संबंधित जितनी जानकारी बढ़ेगी, उतना ही वे जीवन और कला के रस को खीचेंगे । साथ ही हमारी राष्ट्रभाषाएँ सम्पन्नतर होती चलेंगी ।आज की अनर्गल, अटपटी हिंगलिश या किताबी हिंदी के व्यवहार से दैनंदिन कामकाज भले चल जाए, किंतु ज्ञान विज्ञान की भाषा बनने के लिए किसी भाषा को परिचित और विपुल शब्द भंडार जुटाना होगा ।"1
 
     लोक में अलग-अलग मौसम में तरह-तरह के पकवान बनाने का प्रचलन बहुत अधिक रहता है जिनका मौसम के हिसाब से स्वाद भी रसीला रहता है बरसात के मौसम में कहीं कहीं पर आज भी तिली की लडुवा बनते मिलते है तो  गर्मियों में सतुआ मिलता था जो मौसम के हिसाब से लोगों को स्वस्थ रखने कारगर साबित होते थे बुन्देली साहित्य में मौसम के अलग अलग दृश्यों में विविध व्यंजनों का सुरम्य चित्रण प्राप्त होता है इस संदर्भ में श्री बाबूलाल द्विवेदी जी  अपने एक मुक्तक में कहते है -
  "लपटा, लटा, गुलगुला, चीला, अदरैनूं बसकारै ।
तिलकूचा, रसखीर, इंदरसे, मुरका खा जड़कारै ।।
जेठमास में डुबरी, सतुवा, भूंजा मयरी खा रए ।
खुरमा, बतियाँ, पुवा, ठडुला, दुरलभ हो गए ।।
गलगल-पच्चे खूब उड़त ते रै गए बिसरे नांव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।"2
 
लोक में व्यंजन हमेशा देशी खाद्य पदार्थो से बनते थे और दावत का बहुत ही सुंदर स्वरूप विद्यमान था वर्तमान समय मे लोक व्यवहार में अमूल चूल परिवर्तन हो गया है अब दावत में शारीरिक दुर्बलताओं को उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को भोजन में ग्रहण करते है दारू का प्रचलन आज शिक्षित, अशिक्षित समाज मे जोर शोर से होता है जबकि पूर्व में मक्के के आटे का प्रयोग होता था तो कहीं पर गुजियां बनाने में गेहूँ के आटे का प्रयोग किया जाता था आज कोल्ड्रिंक में जहरीली पेप्सी, कोकाकोला का प्रयोग होता है पहले नीबू पानी के साथ पुदीना एवं चीनी का घोल लोगों के हृदय को तरोताजा कर देता था आज इसे साधारण परिवारों की पहचान तक सीमित कर दिया है । भोजन के बाद दूध का प्रयोग निश्चित रहता था लेकिन वर्तमान में दूध लोगों के पास चाय के लिए ही नसीब होता है । इसीलिए श्री बाबूलाल द्विवेदी जी को ग्रामीण अंचल में व्याप्त प्रत्येक संस्कृति की चिंता है जिसे वे चिन्हित करते हुए कहते हैं -
"मका जुनई के पुवा बनत ते और कनक की गुजियां ।
सरबत संगै तुरवा खा रए रोटी बरीं पपइयाँ ।।
दूद डरो घोटुवा खात जब फुर्र फुर्र फुर्रआवे
सामे बैठत ललचत ते वे मनई मन गुर्रावें ।।
मधुप महेरो गुड़ला गुड़का स्वाद हतो फ़ुर्राव में
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।" 3

भारतीय समाज के प्रत्येक लोक में अलग-अलग खेलों का प्रचार बहुत अधिक रहा है जिसमे स्वस्थ्य मनोरंजन के साथ बालकों के विकास का एक सरल माध्यम होता था जिससे शारीरिक रूप के साथ मनोवैज्ञानिक रूप से भी बहुत मजबूत हो जाते थे आज बच्चों के जन्म के साथ टी0वी0 , कम्प्यूटर गेम के ऐसे अभ्यस्त हो जाते है कि छोटी उम्र में ही बच्चों को चश्मा लग जाता है तथा छोटी उम्र में ही तनाव से ग्रसित रहने लगते है । जबकि लोक में एक दूसरे को छेकने(घेरने) , छुपकर थप्पी मारने, तालाबों में तैरने के माध्यम से लिखने वाली पट्टी को फेंककर उसे पकड़ने का आयोजन होता थे जिससे लोक के लोग केवल शारीरिक रूप से ही मजबूत नही होते थे बल्कि पानी के अधिक भराव में कैसे निकला जाए तथा अपनी जान कैसे बचाई जाए खेल-खेल में सीख जाते थे जो नदी नालों को भी पार कर लेते थे जबकि आज की स्वीमिंग में खतरों से खेलने का हुनर यत्र-तत्र ही दिखता है और जब जीत जाते थे तो पूरे मोहल्ले में हो हल्ला करते हुए लड़के इधर से उधर घूमते थे । बुन्देली धरा में प्रचलित विभिन्न खेलों का वर्णन करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं-

"तीन ककौरियाँ छै ककरा कउ खेलें  पड़ा- छिकौवाल
दुका दुकाउवल खेलत ते कउन ढूडे ढूढ़ा धुडउवल
सूजा-पाटी छुआ छुआउअल खेलें चिंग हिरल्ला ।
ची बोलत ते कितऊँ गल्ल की करत फिरत हो हल्ला ।।
किताऊँ अठारा गोटी खेलें गुइयाँ जैसे दांव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।"4

भारत देश विविध संस्कृतियों का देश है जहाँ पर भाषाई आधार, क्षेत्र के आधार पर लोक के अलग-अलग स्वरूप मिलते है बुन्देली संस्कृति में  ऐसे विविध स्वरूपों को देखा जा सकता है यहाँ लोक के बच्चे सुबह से ही तालाबों में घंटो स्नान करते थे स्वयं से बिना कोसी स्पेशल ट्रेनर के तैराकी सीख जाते हैं स्नान करते हुए भोज्य पदार्थ को प्राप्त कर लेने की कला केवल लोक में व्याप्त हो सकती है तालाबों में सिंघाड़े तोड़ कर भोजन भी प्राप्त कर लेते थे तो कमल-कुमुदनी के पुष्प को ले आते थे प्रकृति से सीधे साक्षात्कार कर हृदय में भावों को लोक ही भरता है सुंदरियां अपने सिर में गजरा को लगाती है बाबा भोले के विवाह में वह उल्लास केवल लोक में दिखाई देता है ऐसी बुन्देली के विविध स्वरूपो का वर्णन करते हुए श्री बाबूलाल द्विवेदी जी कहते हैं-

"जितै सपरना घाट ताल में जाकें रोजाऊँ लोरें ।
फेन्दा कांद सिंगारे जाके भर-भर दोना टोरें ।।
कमल कुमुदिनी उर गदुल के डोडी सुन्दा फुला
गोउत चढ़ा भोले बाबा खों बना देत ते दुला
उनको एक उतारन गजरा पैर गरे घर आंव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।" 5

बुंदलेखंड के लोक में वाचिक परम्परा का साहित्य भरा पड़ा है अशिक्षित लोगों के पास लोक के बहुत ही सुंदर शब्दों का समागम है, जिसमे मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुरम्य वर्णन बड़े बड़े लेखकों के पास भी नही मिलता है, लेकिन जमीनी शोध के अभाव में वृद्ध पुरुष एवं औरतों के निधन के साथ वाचिक परम्परा का साहित्य भी विलुप्त होता जा रहा है । चकिया में गेहूँ पीसती हुई औरत जनकल्याण के लिए जो लोकगीत गाती थी उसमें उसनीदे बच्चे में स्वत: संस्कारों का समावेश हो जाता था क्योंकि प्रत्येक दिन के गायन की एक-एक ध्वनि उसके कान में गूँजती थी । यह मनोविज्ञान भी कहता है जो हम लगातार सुनते है उन्हीं गुणों का समावेश हमारे हृदय में होता है ।
 
बुंदेली संस्कृति में बारातों का बहुत महत्व है लोक में किसी भी परिवार में बारात आई हो लेकिन पूरा का पूरा गांव उस शादी में सहयोग करता है सभी लोग हँसते खेलते है , नृत्य करते है, अलग-अलग वाद्य यंत्रों को बजाया जाता है । वृद्धजन फ़ाग गाने लगते है तो नवयुवक देशी गानों में ठुमका लगाते है औरते बन्नागीत(दूल्हे के लिए) गाती है घोड़ा नृत्य करता है कौन बाराती है कौन घराती यह कोई नही देखता है सभी लोग मिलजुल भाईचारे के भाव से नृत्य करते है जबकि आधुनिकता की चकाचौंध में लोक गायब सा हो गया है आज की बारात में झगड़ा होना निश्चित रहता है क्योंकि दारूबाज जरूर पहुंचते है । लोक के इसी स्वरूप के सम्बंध में श्री बाबूलाल द्विवेदी जी कहते है-
"आई बारातें नचे कांडरा कंसाउरी बजाके ।
रवला में रमतूला बज रए फ़ाग राई में गाकें ।।
कउन खसिया कउन नचै बेड़नी ढिमरयाउ कउन हो रई
बन्नागीत बईयरें गा रई दिल्दिल घोड़ी नच रई ।।
सबई बाराती और घराती झूमें अपने भाव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।"6

भारतीय लोक में में वाद्य यंत्रों का बड़ा महत्व है किसी भी उत्सव या त्यौहार में विविध प्रकार के वाद्य यंत्रों के बजाने का प्रचलन था । जिन्हें बजाए बिना शुभ कार्य पूर्ण नही होते है प्रत्येक रस्म के साथ अलग वाद्ययंत्र बजाया  जाता था । श्री बाबूलाल द्विवेदी जी ने बुन्देली धरा में प्रचारित-प्रसारित वाद्ययंत्रों का सुरम्य वर्णन किया है जबकि आज ये विविध वाद्ययंत्र विलुप्त से हो गए है और इसके विलोपन के साथ नाम भी विस्मृत हो गए है ऐसी दशा में रचनाकार द्वारा बुन्देली काव्य के माध्यम से उनके नामों को सुरक्षित करना ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है । वे कहते हैं -
"दौर ढाँक, नगरिया, मंबुउ, सारंगी, करताल ।
गागर, गनी, कंजीर, गिलबई, खँजरी उर ढ़पताल ।।
तुरई नगारो बिगुल बाँसुरी, झांझ, मजीरा, ढोल।
तासों, रमतूला सब मिल कें नौ की नोबत बोल ।।
नोबत बजी मधुप सुन रए अब बा नोबत काँ पावँ में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।"7

इस तरह 'भइया अपने गांव में' का समग्र अध्ययन करने के पश्चात बुन्देली लोक से अनजान व्यक्ति भी यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, लोकगीत आदि से भलीभाँति परिचित हो सकता है । इस पुस्तक का जितना महत्व साहित्यिक दृष्टि से है उससे अधिक ऐतिहासिक दृष्टि से भी है क्योंकि बुंदेलखंड के लोक में व्याप्त विभिन्न संस्कृतियों एवं लोक परम्पराओं को समेटने का प्रयास किया है । जिसमें साहित्य के साथ ऐतिहासिक दृष्टि भी परिलक्षित होती है । रचनाकार स्वयं बुन्देली लोक को जीने वाला है, इसीलिए जन्म से लेकर मृत्यु तक विविध रस्म रिवाज से संबंधित लोकगीत मिलते है, तो हास्य विलास के समय मे हृदय के उद्गार को रेखांकित किया है  ।  लोक को जीते हुए उसकी एक एक बारीकी को कलम से उकेरना बहुत ही कठिन काम होता है लेकिन श्री बाबूलाल द्विवेदी जी ने इसे बखूबी निभाया है यदि लोक संस्कृतियों से सम्बंधित पुस्तकों अध्ययन करने की बात आये तो इसका अपना एक अलग स्थान होगा ।

संदर्भ-
1.भइया अपने गांव में (बुन्देली काव्य) रचनाकार-प. बाबूलाल द्विवेदी, संपादक- डॉ राकेश नारायण द्विवेदी, जानकी प्रकाशन, ग्राम छिल्ला जिला ललितपुर,प्रथम संस्करण,2011, पृष्ठ-15
2.वही, पृष्ठ-26
3. वही, पृष्ठ-26
4. वही, पृष्ठ-27
5.वही, पृष्ठ-27
6.वही, पृष्ठ-28
7.वही, पृष्ठ-29

संत रविदास के लोक प्रचलित क्रांतिकारी विचार

संत रविदास के लोक प्रचलित क्रांतिकारी विचार
प्रदीप कुमार, शोधार्थी
हिंदी विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई
जालौन(उ0प्र0)
मोबाइल-8115393117
ईमेल-pradeepkumargautam72@gmail.com

    भारत देश में प्रारम्भ से ब्राह्मण एवं श्रमण  संस्कृति के मध्य निरंतर संघर्ष चलता रहा है ब्राह्मण हवन पूजा कर्मकांड पर आधारित पोंगापंथी समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करवाते है और सामान्य जनता को ठगकर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करते हैं , जबकि श्रमण संस्कृति को मनाने वाले लोग मेहनत के बल पर खून पसीने की कमाई से अपना जीवन यापन करते थे जिसमें वे तर्क पर आधारित लोक जीवन, लोक व्यवहार मानवतावादी समाज के निर्माण करते हैं जिसमें समता, बंधुत्व एकता, न्याय पर आधारित श्रेष्ठ समाज का निर्माण करते है । यही श्रमण परम्परा तथागत बुद्ध, चार्वाकों, सिद्धों ,नाथों से होते हुए मध्यकालीन भारत में 15वीं शताब्दी के मध्य शेषनागों(बचे हुए नागवंशी लोगों) ने अपने अधिकारों को माँगने का सिलसिला शुरू किया तो पूरे देश मे क्रांति की चिंगारी फैल गई जिसमें नागवंशी संतों कबीरदास, रैदास, दादूदयाल, आदि ने जातिगत, धर्मगत, लिंगगत भेदभावों के खिलाफ समाज को जाग्रत करना शुरू कर दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि वर्णवादी व्यवस्था चरमराने लगी थी बड़े-बड़े मंदिरों में लोगो ने जाना बंद कर दिया । संत रविदास का प्रभाव पूरे भारत देश मे था उनके चेले देश के कोने कोने में फैले हुए थे । सन्त रविदास की बहुत -सी वाणियाँ लोक पद्धति में आज भी विद्यमान है लेकिन लेखन परम्परा में उनका जिक्र नही मिलता है । मुझे लगता है इसके पीछे कुलीनतावादी लोगों से बहुजन समाज के लोग अलग न हो जाएं इसीलिए उनके ओजस्वी विचारों को दबा दिया गया तथा तोड़मरोड़ करके ऐसे  विचारों को सभी के सापेक्ष परोसा गया जिससे क्रांति न हो सके इसके बाद भी मध्यकाल में शेषनागों ने अपने सिर हिलाना शुरू कर दिए थे इसीलिए पूरे देश मे भूचाल आ गया था और बनी बनाई वर्णव्यवस्था  ध्वस्त होने लगी थी जिसका परिणाम यह हुआ कि लोगों में जागृति पैदा हुई । सन्त रविदास एक शिक्षित महामानव थे , साहित्य में उनकी चार तरह की वाणियाँ प्राप्त होती है जिसमें भेखरी(भेखली), मदा, वसन्ती और परा । प्रारम्भ की तीन तरह की वाणियों में जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के कर्मों को दिखाया गया है जिसे ब्राह्मणवादी लोग जोर शोर से प्रचारित करते है किंतु उनकी परा वाणियों को छिपाने का प्रयास किया जाता है । जिसमें वे श्रमण परंपरा के संवाहक के रूप में दिखाई देते है । सन्त रविदास को चारों वेदों का पूरी तरह से अध्ययन था और वे वेदों में वर्णित ब्रह्मा के घिनौने कृत्य को उजागर करते हैं , क्योंकि ब्रह्मा हिंदुओं के ऐसे देवता है जो अपनी पुत्री सरस्वती के साथ ही सम्भोग करते है, लेकिन आज जब इनके वेदों पर चर्चा की जाती है तो ब्राह्मणवादी लोग इस संदर्भ में ब्रह्मा के बचाव पक्ष में खड़ा होकर उनके इस कृत्य को सृष्टि निर्माण का चक्र कहते हैं लेकिन सन्त रविदास ब्राह्मणों को ललकारते है और उनसे स्वयं की पुत्री से सम्भोग करने वाले ब्रह्मा का जिक्र करने वाले वेदों को फूंकने की बात करते है उ की इन वाणियों को आज भी हरियाणा और पंजाब के ग्रामीणांचल क्षेत्रों में रविदासिया समाज के लोगों द्वारा गाया जाता है जिसमें रविदास जी कहते है-
"ब्रह्मा द्वारा रची सृष्टि वा सरस्वती आई
बाप बेटी की हुई बंदगी, फिर सृष्टि अदम रचाई ।
वेद कटेव भागवत गीता यह भी फूंके नाहीं
कह रविदास सुन रे बाभन तेरे वेद ने नारि लुटाई ।।"1

भारतीय समाज में कुलीनतावादी लोग सन्त रविदास को  हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा रक्षक घोषित करते है और उन्हें पूर्व जन्म का ब्राह्मण घोषित करते हैं, तो कुछ लोग उन्हें चंवर वंशज क्षत्रिय घोषित करते है । यह मूल रूप से साजिश करते है, क्योंकि मध्यकालीन भारत मे कबीर एवं रैदास की वैज्ञानिक चेतना का  इतना अधिक प्रभाव था कि परंपरावादी लोग इनसे डरे हुए थे । सन्त रविदास के गूढ़ ज्ञान से पूरा बहुजन समाज जाग्रत हो रहा था, जिससे वे गुलामी की जंजीरों को तोड़कर श्रमण परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे, वे माला, हरि, राम जैसे शब्दों से परहेज करने की बात करते है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज बहुजन समाज के ही ऐसे कई सन्त हो गए है जो उनकी मूल विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने की जगह  अंधविश्वास, आडम्बर की ओर लिए जा रहे है । सन्त रविदास के हाथों में हरि लिखकर उनकी मूर्तियाँ बेचते है और उनके नाम की मालाएँ बेचते है । वे बहुजन समाज के  महापुरुषों की वाणियों को अंगीकृत करने की बात करते है । इस संदर्भ में  संत रविदास कहते है-
"माला फेरूं न हरि भजूं मुख से कहूं न राम
मेरा हरि मुझको भजे और मैं करूँ विश्राम ।।"2
  सन्त रविदास के संदर्भ में बहुत से लोग यह प्रचारित-प्रसारित करते है कि वे सगुण और निर्गुण दोनों शाखाओं को मानने वाले थे । इसमें सगुण शब्द का अर्थ गुणों से युक्त होना है तो निर्गुण शब्द का अर्थ गुण विहीन है तब यह समझना जरूरी है कि क्या संत रविदास कबीर गुणविहीन थे ? सामंतवादी हिंदी साहित्य के इतिहासकारों द्वारा ये शब्द जबरन थोपे गए है कबीर एवं रैदास की क्रांतिकारी वाणी को दबाने का प्रयास करने के लिए इन्हें हाशिए पर डाल दिया गया था । निर्गुण शब्द की जगह पर यह मूलतः निर्गुर शब्द था जिसका अभिप्राय है बिना गुरु के । कबीर और रैदास के मूलतः कोई गुरु नही थे, ब्राह्मण को ही श्रेष्ठ घोषित करने के लिए उन्होंने रामानंद को गुरु घोषित कर दिया  जबकि कई जगहों पर कबीर इस बात का खंडन करते हुए कहते हैं -
"याको गुरु तो वा भयो वाको भयो तो वो
पैर पैलका कौन कबीरा वा कौन गुरु ज्ञान दियो ।।"3
गुरु के सम्बंध में मुझे एक चीज बड़ी आश्चर्यजनक लगती है कि रामानंद को कबीर , रैदास का गुरु घोषित किया गया है और इसके बाद 350 वर्ष बाद घासीदास के गुरु रामानन्द होते है जिससे यह स्पष्ट है कि केवल यह हिंदी साहित्य के इतिहासकार दोनों में से एक जगह तो झूठ बोल रहे है ।
जब हम तथागत बुद्ध, रैदास, डॉ अम्बेडकर की विचारधारा को समझने का प्रयास करते है तो यह मालूम होता है कि  ये सभी अपने -अपने समय पर एक ही बात कह रहे हैं । सन्त रविदास किसी ईश्वर की भक्ति की बात नही करते है बल्कि हिन्दू धर्म के देवताओं की विचारधारा को खत्म करके मानवतावादी सोच को विकसित करने की बात करते हैं  वे हिन्दू धर्म के ब्रह्मा, विष्णु , शिव की आडम्बर अंधविश्वास को खत्म करने की बात करते है , आदिशक्ति को पैरों से मसलने की बात करते है जिससे अभिप्राय यह है कि वे आदिशक्ति की कपोलकल्पना को समाप्त करना चाहते है इस देश मे काल(मृत्यु) का भय दिखाकर ही अत्यधिक देवताओं को पूजवाया गया है तब रैदास काल को पकड़कर नचाने की बात करते है जाति वर्ण की तो कल्पना को भी वे समाप्त करने की बात करते हैं उनका प्रभाव इतना अधिक है कि वे कई जगहों पर कहते है कि कोई भी व्यक्ति आडम्बर अंधविश्वास में फंसा हो यदि वह एक बार मेरे पास आ जाये तो उसे ब्राह्मणीकरण के तत्वों से मुक्त करा सकता हूँ  । उनकी यह क्रांतिकारी वाणी वाराणसी के एक सेमिनार में विद्वान वक्ताओं द्वारा सुनने को प्राप्त हुई । जब मैंने इसके संदर्भ पूछा तो उन्होंने बताया कि हरियाणा और पंजाब में आज भी रविदास की यह वाणी लोक गायन में प्रचलित है जिसे मैंने टेब कर लिया, जिसमे वे कहते हैं -
"मैं हूँ अमर कबहुँ न मरता खड़ग विज्ञान चलाऊँ रे
सामर्थ साधु कहलाऊँ ।
ब्रह्मा विष्णु का शीश काटकर शिव को मार भगाऊँ
आदिशक्ति को पैरों से दाबू काल को पकड़ नचाऊँ ।
दस अवतार डरे डर मेरे सूर्य चंद्र राहू
इंदरपुरी के देव सब डरते धरमराज मैं बुलवाऊं ।
चौदह लोक का करूँ निबेड़ा फिर एक ठिकाने लाऊँ
जाति वर्ण की मेट कल्पना सतोसत नाम कहाऊं ।
सुत्ता म्हारे चरणों की दासी मुख की ठौर न ठाउँ
कह रविदास सरन जो आए मैं उसको भी मुक्त कराऊँ ।।"4
इन्ही वाणियों को वर्तमान भारत के संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर अपनाते है । 1956 में जब वे बौद्ध धर्म की धम्म दीक्षा लेते है तब वे 22 प्रतिज्ञाओं  की शपथ भी लेते है जिसमें वे हिन्दू धर्म के ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं अन्य देवी देवताओं न ईश्वर मानते है और न ही पूजा करते है । मध्यकालीन भारत के बहुत से सन्त कवि क्रांतिकारी हुए है, लेकिन उनकी क्रांतिकारी वाणियों को सभी के सापेक्ष नही लाया गया है जिसका मुख्य कारण शिक्षा का अभाव होना था किंतु वर्तमान समय मे बहुजन समाज के हजारों शोधार्थी, साहित्यकार है, तब बहुजन वैचारिकी के सभी महापुरुषों वास्तविक वाणियों को खोजकर सामने लाना होगा । इन सभी वाणियों को पढ़ने के बाद यह तो निश्चित है कि सन्त रविदास हिन्दू धर्म के समर्थक नही थे बल्कि वे उनके मिथकों पर करारा प्रहार करते नजर आ रहे है और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करते नजर आते हैं ।
सन्दर्भ-
1. 30 जनवरी 2018 BHU वाराणसी के पढ़े गए शोध आलेखों की रिकार्डिंग ।
2.वही
3.वही
4.वही

खून(लघुकथा)

खून(लघुकथा)
...........प्रदीप कुमार गौतम
   रामकिशोर 21वीं सदी का  ऐसा गरीब इंसान था, जहाँ उसने शिक्षित होने के बाद भी गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने, जातिगत भेदभाव को खत्म करने का बीड़ा उठाया था तथा वह सुबह दो घंटे गाँव के गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करता था, इसके बाद चौधरियों के खेतों में जाकर भरण-पोषण हेतु मजदूरी करता था । खेतों में जीतोड़ मेहनत करने के पश्चात चौधरियों में उसकी अच्छी पकड़ हो गई थी । चौधरी उससे हमेशा ऐसा व्यवहार करते थे कि जैसे मानो जातिगत भेदभाव नाम की वस्तु पूर्णतः समाप्त हो गई हो ।
आज सुबह रामाधार चौधरी  रामकिशोर को खेतों में जाता देखकर बोला- सुन रामकिशोर !
उनकी बात को सुनकर वह ठहरते हुए बोला- बताओ काका
आज नाती की छठी है शाम के खाना खा लाइये । रामाधार चौधरी ने कहा ।
हौ काका कहते हुए रामकिशोर खेतों की ओर बढ़ गया ।
खेतों में दिनभर काम करने के बाद जब रामकिशोर घर लौटता है तो उसे चौधरी के घर खाना खाने की याद आती है, वह हाथ-मुंह धुलकर चौधरी के आंगन में लगी पंगत में बैठ जाता है ।पत्तलें परसी जाती हैं, खाना परोस दिया जाता है रामकिशोर खुश होकर विविध व्यंजनों का स्वाद चखने लगता है लेकिन तेज गति सी आती हुई आवाज ने उसके स्वाद में बाधा पहुंचा दी ।
भोस......मादर.... चमरा इहाँ कहाँ चौधरियों के बीच खाना खा रहा है । पुत्तन चौधरी ने ललकारते हुए बोला ।
भद्दी गालियों को सुनकर रामकिशोर का दिमाग भन्ना गया उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने गर्म शीशा पिघलाकर डाल दिया हो । वह पंगत से उठा तबतक पुत्तन ने नज़दीक आकर उसको थप्पड़ मार दिया ।
रामकिशोर का चेहरा तिलमिला गया गुस्से से उसके चेहरे में लावा धधकने लगा ऊंची आवाज़ में चिंघाड़ते हुए बोला- ख़बरदार! जो एक भी हाथ लगा दिया (आवाज पूरे आंगन में गूँज गयी)
सभी भोजन छोड़कर रामकिशोर की ओर देखने लगे पुत्तन वहीं पर ठिठक गया ।
रामाधार चौधरी तुरंत आ गए और रामकिशोर को देखकर बोले तू चौधरियों की पंगत के बीच क्या कर रहा है ?
काका आपने सुबह खाने के लिए बोला था । रामकिशोर ने कहा
अरे ! इसका मतलब यह तो नही कि तू हमारे बीच खाना खाए ।
पहले से तमतमाये रामकिशोर का चेहरा शिथिल हो गया चौधरियों के परिवार से उसे यही लगता था कि ये जातिगत भेदभाव नही मानते हैं, लेकिन उसका सोचना गलत निकला । फिर रामकिशोर ने कहा -अच्छा ! तो क्या मेरे घर में खाना नही है क्या ? जो स्वाभिमान एवं सम्मान को गिराकर आपके यहाँ भोजन करेंगे ।
रामाधार चौधरी के गुर्राते हुए बोला- अबे ! होश में बोल तू छोटी जात को हमाये बीच कैसे खा सकत खाना ?
यदि सबके साथ नही खिला सकते तो बड़ी अम्मा बनकर न्यौता न देव करो । रामकिशोर ने कहा
लगातार हो रही बहस में चौधरियों के लड़कों ने घेर लिया और मारना शुरू कर दिया । गुस्से में लाल रामकिशोर भी जोर देकर उठा और हाथ मे लिए कुल्हाड़ी से वार करना शुरू कर दिया । लगातार वार से पाँच छः युवाओं को वहीं पर ढेर कर दिया बाँकी भीड़ में भगदड़ मच गई चारो ओर खून के फुहारे फूट पड़े । पूरे गाँव मे आग की तरह यह बात फैल गई कि एक चमार ने छः चौधरियों को मार दिया । 

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...