खून(लघुकथा)
...........प्रदीप कुमार गौतम
रामकिशोर 21वीं सदी का ऐसा गरीब इंसान था, जहाँ उसने शिक्षित होने के बाद भी गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने, जातिगत भेदभाव को खत्म करने का बीड़ा उठाया था तथा वह सुबह दो घंटे गाँव के गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करता था, इसके बाद चौधरियों के खेतों में जाकर भरण-पोषण हेतु मजदूरी करता था । खेतों में जीतोड़ मेहनत करने के पश्चात चौधरियों में उसकी अच्छी पकड़ हो गई थी । चौधरी उससे हमेशा ऐसा व्यवहार करते थे कि जैसे मानो जातिगत भेदभाव नाम की वस्तु पूर्णतः समाप्त हो गई हो ।
आज सुबह रामाधार चौधरी रामकिशोर को खेतों में जाता देखकर बोला- सुन रामकिशोर !
उनकी बात को सुनकर वह ठहरते हुए बोला- बताओ काका
आज नाती की छठी है शाम के खाना खा लाइये । रामाधार चौधरी ने कहा ।
हौ काका कहते हुए रामकिशोर खेतों की ओर बढ़ गया ।
खेतों में दिनभर काम करने के बाद जब रामकिशोर घर लौटता है तो उसे चौधरी के घर खाना खाने की याद आती है, वह हाथ-मुंह धुलकर चौधरी के आंगन में लगी पंगत में बैठ जाता है ।पत्तलें परसी जाती हैं, खाना परोस दिया जाता है रामकिशोर खुश होकर विविध व्यंजनों का स्वाद चखने लगता है लेकिन तेज गति सी आती हुई आवाज ने उसके स्वाद में बाधा पहुंचा दी ।
भोस......मादर.... चमरा इहाँ कहाँ चौधरियों के बीच खाना खा रहा है । पुत्तन चौधरी ने ललकारते हुए बोला ।
भद्दी गालियों को सुनकर रामकिशोर का दिमाग भन्ना गया उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने गर्म शीशा पिघलाकर डाल दिया हो । वह पंगत से उठा तबतक पुत्तन ने नज़दीक आकर उसको थप्पड़ मार दिया ।
रामकिशोर का चेहरा तिलमिला गया गुस्से से उसके चेहरे में लावा धधकने लगा ऊंची आवाज़ में चिंघाड़ते हुए बोला- ख़बरदार! जो एक भी हाथ लगा दिया (आवाज पूरे आंगन में गूँज गयी)
सभी भोजन छोड़कर रामकिशोर की ओर देखने लगे पुत्तन वहीं पर ठिठक गया ।
रामाधार चौधरी तुरंत आ गए और रामकिशोर को देखकर बोले तू चौधरियों की पंगत के बीच क्या कर रहा है ?
काका आपने सुबह खाने के लिए बोला था । रामकिशोर ने कहा
अरे ! इसका मतलब यह तो नही कि तू हमारे बीच खाना खाए ।
पहले से तमतमाये रामकिशोर का चेहरा शिथिल हो गया चौधरियों के परिवार से उसे यही लगता था कि ये जातिगत भेदभाव नही मानते हैं, लेकिन उसका सोचना गलत निकला । फिर रामकिशोर ने कहा -अच्छा ! तो क्या मेरे घर में खाना नही है क्या ? जो स्वाभिमान एवं सम्मान को गिराकर आपके यहाँ भोजन करेंगे ।
रामाधार चौधरी के गुर्राते हुए बोला- अबे ! होश में बोल तू छोटी जात को हमाये बीच कैसे खा सकत खाना ?
यदि सबके साथ नही खिला सकते तो बड़ी अम्मा बनकर न्यौता न देव करो । रामकिशोर ने कहा
लगातार हो रही बहस में चौधरियों के लड़कों ने घेर लिया और मारना शुरू कर दिया । गुस्से में लाल रामकिशोर भी जोर देकर उठा और हाथ मे लिए कुल्हाड़ी से वार करना शुरू कर दिया । लगातार वार से पाँच छः युवाओं को वहीं पर ढेर कर दिया बाँकी भीड़ में भगदड़ मच गई चारो ओर खून के फुहारे फूट पड़े । पूरे गाँव मे आग की तरह यह बात फैल गई कि एक चमार ने छः चौधरियों को मार दिया ।
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Sunday, 29 May 2022
खून(लघुकथा)
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