भइया अपने गाँव में (बुंदेली काव्य) का लोक सांस्कृतिक अवलोकन
प्रदीप कुमार, शोधार्थी
हिंदी विभाग, गाँधी महाविद्यालय, उरई, जालौन(उ0प्र0)
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'भइया अपने गाँव में' बुन्देली काव्य श्री बाबूलाल द्विवेदी जी द्वारा रचित मुक्तक रचनाओं का संकलन है जिसे उनके पुत्र डॉ राकेश नारायण द्विवेदी जी द्वारा संकलित किया गया है । इस बुन्देली काव्य में रचनाकार ने बुन्देली लोक में प्रचलित जनजीवन का प्रत्येक दृश्य उकेरा है ।जिसमें लोक गीत, लोक साहित्य, लोक नृत्य, लोक भोजन, लोक उत्सव, लोक भजन इत्यादि का पर गहन दृष्टि डाली है लेखक मूलतः संस्कृत के प्रकांड विद्वान है लेकिन उनका जमीनी बोली बुन्देली का भी उतना ही गहन अध्ययन है । बुन्देली धरा के लोक में बहुत सी चीजें वाचिक परंपरा के रूप में प्रचलित है, जब हम उन्हें लिखित परम्परा में नही लेते है, तो वे चीजे कुछ समय पश्चात विलुप्त हो जाती है और लोक परम्पराओं के समापन से पीढ़ियों के इतिहास से हम वंचित हो जाते है इसीलिए इस काव्य ग्रंथ में रचनाकार ने बुन्देली साहित्य, शब्दों के साथ इतिहास को भी जिंदा रखने का काम किया है । 'भइया अपने गांव में' बुन्देली काव्य को पढ़ने के पश्चात बुंदेलखंड का लोक सामने दिखाई देने लगता है और यह विचार मन मे अनायास उत्पन्न होता है कि आज का युवा क्या इस लोक साहित्य से परिचित है या बीस साल पहले तक गाँव में प्राप्त होने वाली संस्कृति को वह जानता है । आज राष्ट्रीय भाषा भी आज अपनी राष्ट्रीयता से जूझ रही है, जिसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय बोलियों को तवज्जो न देना है । जबकि किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय भाषा का विकास उसकी बोलियों की सम्पन्नता पर निहित रहता है । इस संदर्भ में 'भइया अपने गाँव में' की भूमिका में डॉ राकेश नारायण द्विवेदी लिखते है -" हिंदी के पाठकों एवं श्रोताओं के बीच अपनी बोलियों के शब्दों, उनके बदलते अर्थ, रस, गुण और उसके मूल आशय से संबंधित जितनी जानकारी बढ़ेगी, उतना ही वे जीवन और कला के रस को खीचेंगे । साथ ही हमारी राष्ट्रभाषाएँ सम्पन्नतर होती चलेंगी ।आज की अनर्गल, अटपटी हिंगलिश या किताबी हिंदी के व्यवहार से दैनंदिन कामकाज भले चल जाए, किंतु ज्ञान विज्ञान की भाषा बनने के लिए किसी भाषा को परिचित और विपुल शब्द भंडार जुटाना होगा ।"1
लोक में अलग-अलग मौसम में तरह-तरह के पकवान बनाने का प्रचलन बहुत अधिक रहता है जिनका मौसम के हिसाब से स्वाद भी रसीला रहता है बरसात के मौसम में कहीं कहीं पर आज भी तिली की लडुवा बनते मिलते है तो गर्मियों में सतुआ मिलता था जो मौसम के हिसाब से लोगों को स्वस्थ रखने कारगर साबित होते थे बुन्देली साहित्य में मौसम के अलग अलग दृश्यों में विविध व्यंजनों का सुरम्य चित्रण प्राप्त होता है इस संदर्भ में श्री बाबूलाल द्विवेदी जी अपने एक मुक्तक में कहते है -
"लपटा, लटा, गुलगुला, चीला, अदरैनूं बसकारै ।
तिलकूचा, रसखीर, इंदरसे, मुरका खा जड़कारै ।।
जेठमास में डुबरी, सतुवा, भूंजा मयरी खा रए ।
खुरमा, बतियाँ, पुवा, ठडुला, दुरलभ हो गए ।।
गलगल-पच्चे खूब उड़त ते रै गए बिसरे नांव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।"2
लोक में व्यंजन हमेशा देशी खाद्य पदार्थो से बनते थे और दावत का बहुत ही सुंदर स्वरूप विद्यमान था वर्तमान समय मे लोक व्यवहार में अमूल चूल परिवर्तन हो गया है अब दावत में शारीरिक दुर्बलताओं को उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को भोजन में ग्रहण करते है दारू का प्रचलन आज शिक्षित, अशिक्षित समाज मे जोर शोर से होता है जबकि पूर्व में मक्के के आटे का प्रयोग होता था तो कहीं पर गुजियां बनाने में गेहूँ के आटे का प्रयोग किया जाता था आज कोल्ड्रिंक में जहरीली पेप्सी, कोकाकोला का प्रयोग होता है पहले नीबू पानी के साथ पुदीना एवं चीनी का घोल लोगों के हृदय को तरोताजा कर देता था आज इसे साधारण परिवारों की पहचान तक सीमित कर दिया है । भोजन के बाद दूध का प्रयोग निश्चित रहता था लेकिन वर्तमान में दूध लोगों के पास चाय के लिए ही नसीब होता है । इसीलिए श्री बाबूलाल द्विवेदी जी को ग्रामीण अंचल में व्याप्त प्रत्येक संस्कृति की चिंता है जिसे वे चिन्हित करते हुए कहते हैं -
"मका जुनई के पुवा बनत ते और कनक की गुजियां ।
सरबत संगै तुरवा खा रए रोटी बरीं पपइयाँ ।।
दूद डरो घोटुवा खात जब फुर्र फुर्र फुर्रआवे
सामे बैठत ललचत ते वे मनई मन गुर्रावें ।।
मधुप महेरो गुड़ला गुड़का स्वाद हतो फ़ुर्राव में
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।" 3
भारतीय समाज के प्रत्येक लोक में अलग-अलग खेलों का प्रचार बहुत अधिक रहा है जिसमे स्वस्थ्य मनोरंजन के साथ बालकों के विकास का एक सरल माध्यम होता था जिससे शारीरिक रूप के साथ मनोवैज्ञानिक रूप से भी बहुत मजबूत हो जाते थे आज बच्चों के जन्म के साथ टी0वी0 , कम्प्यूटर गेम के ऐसे अभ्यस्त हो जाते है कि छोटी उम्र में ही बच्चों को चश्मा लग जाता है तथा छोटी उम्र में ही तनाव से ग्रसित रहने लगते है । जबकि लोक में एक दूसरे को छेकने(घेरने) , छुपकर थप्पी मारने, तालाबों में तैरने के माध्यम से लिखने वाली पट्टी को फेंककर उसे पकड़ने का आयोजन होता थे जिससे लोक के लोग केवल शारीरिक रूप से ही मजबूत नही होते थे बल्कि पानी के अधिक भराव में कैसे निकला जाए तथा अपनी जान कैसे बचाई जाए खेल-खेल में सीख जाते थे जो नदी नालों को भी पार कर लेते थे जबकि आज की स्वीमिंग में खतरों से खेलने का हुनर यत्र-तत्र ही दिखता है और जब जीत जाते थे तो पूरे मोहल्ले में हो हल्ला करते हुए लड़के इधर से उधर घूमते थे । बुन्देली धरा में प्रचलित विभिन्न खेलों का वर्णन करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं-
"तीन ककौरियाँ छै ककरा कउ खेलें पड़ा- छिकौवाल
दुका दुकाउवल खेलत ते कउन ढूडे ढूढ़ा धुडउवल
सूजा-पाटी छुआ छुआउअल खेलें चिंग हिरल्ला ।
ची बोलत ते कितऊँ गल्ल की करत फिरत हो हल्ला ।।
किताऊँ अठारा गोटी खेलें गुइयाँ जैसे दांव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।"4
भारत देश विविध संस्कृतियों का देश है जहाँ पर भाषाई आधार, क्षेत्र के आधार पर लोक के अलग-अलग स्वरूप मिलते है बुन्देली संस्कृति में ऐसे विविध स्वरूपों को देखा जा सकता है यहाँ लोक के बच्चे सुबह से ही तालाबों में घंटो स्नान करते थे स्वयं से बिना कोसी स्पेशल ट्रेनर के तैराकी सीख जाते हैं स्नान करते हुए भोज्य पदार्थ को प्राप्त कर लेने की कला केवल लोक में व्याप्त हो सकती है तालाबों में सिंघाड़े तोड़ कर भोजन भी प्राप्त कर लेते थे तो कमल-कुमुदनी के पुष्प को ले आते थे प्रकृति से सीधे साक्षात्कार कर हृदय में भावों को लोक ही भरता है सुंदरियां अपने सिर में गजरा को लगाती है बाबा भोले के विवाह में वह उल्लास केवल लोक में दिखाई देता है ऐसी बुन्देली के विविध स्वरूपो का वर्णन करते हुए श्री बाबूलाल द्विवेदी जी कहते हैं-
"जितै सपरना घाट ताल में जाकें रोजाऊँ लोरें ।
फेन्दा कांद सिंगारे जाके भर-भर दोना टोरें ।।
कमल कुमुदिनी उर गदुल के डोडी सुन्दा फुला
गोउत चढ़ा भोले बाबा खों बना देत ते दुला
उनको एक उतारन गजरा पैर गरे घर आंव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।" 5
बुंदलेखंड के लोक में वाचिक परम्परा का साहित्य भरा पड़ा है अशिक्षित लोगों के पास लोक के बहुत ही सुंदर शब्दों का समागम है, जिसमे मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुरम्य वर्णन बड़े बड़े लेखकों के पास भी नही मिलता है, लेकिन जमीनी शोध के अभाव में वृद्ध पुरुष एवं औरतों के निधन के साथ वाचिक परम्परा का साहित्य भी विलुप्त होता जा रहा है । चकिया में गेहूँ पीसती हुई औरत जनकल्याण के लिए जो लोकगीत गाती थी उसमें उसनीदे बच्चे में स्वत: संस्कारों का समावेश हो जाता था क्योंकि प्रत्येक दिन के गायन की एक-एक ध्वनि उसके कान में गूँजती थी । यह मनोविज्ञान भी कहता है जो हम लगातार सुनते है उन्हीं गुणों का समावेश हमारे हृदय में होता है ।
बुंदेली संस्कृति में बारातों का बहुत महत्व है लोक में किसी भी परिवार में बारात आई हो लेकिन पूरा का पूरा गांव उस शादी में सहयोग करता है सभी लोग हँसते खेलते है , नृत्य करते है, अलग-अलग वाद्य यंत्रों को बजाया जाता है । वृद्धजन फ़ाग गाने लगते है तो नवयुवक देशी गानों में ठुमका लगाते है औरते बन्नागीत(दूल्हे के लिए) गाती है घोड़ा नृत्य करता है कौन बाराती है कौन घराती यह कोई नही देखता है सभी लोग मिलजुल भाईचारे के भाव से नृत्य करते है जबकि आधुनिकता की चकाचौंध में लोक गायब सा हो गया है आज की बारात में झगड़ा होना निश्चित रहता है क्योंकि दारूबाज जरूर पहुंचते है । लोक के इसी स्वरूप के सम्बंध में श्री बाबूलाल द्विवेदी जी कहते है-
"आई बारातें नचे कांडरा कंसाउरी बजाके ।
रवला में रमतूला बज रए फ़ाग राई में गाकें ।।
कउन खसिया कउन नचै बेड़नी ढिमरयाउ कउन हो रई
बन्नागीत बईयरें गा रई दिल्दिल घोड़ी नच रई ।।
सबई बाराती और घराती झूमें अपने भाव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।"6
भारतीय लोक में में वाद्य यंत्रों का बड़ा महत्व है किसी भी उत्सव या त्यौहार में विविध प्रकार के वाद्य यंत्रों के बजाने का प्रचलन था । जिन्हें बजाए बिना शुभ कार्य पूर्ण नही होते है प्रत्येक रस्म के साथ अलग वाद्ययंत्र बजाया जाता था । श्री बाबूलाल द्विवेदी जी ने बुन्देली धरा में प्रचारित-प्रसारित वाद्ययंत्रों का सुरम्य वर्णन किया है जबकि आज ये विविध वाद्ययंत्र विलुप्त से हो गए है और इसके विलोपन के साथ नाम भी विस्मृत हो गए है ऐसी दशा में रचनाकार द्वारा बुन्देली काव्य के माध्यम से उनके नामों को सुरक्षित करना ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है । वे कहते हैं -
"दौर ढाँक, नगरिया, मंबुउ, सारंगी, करताल ।
गागर, गनी, कंजीर, गिलबई, खँजरी उर ढ़पताल ।।
तुरई नगारो बिगुल बाँसुरी, झांझ, मजीरा, ढोल।
तासों, रमतूला सब मिल कें नौ की नोबत बोल ।।
नोबत बजी मधुप सुन रए अब बा नोबत काँ पावँ में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।"7
इस तरह 'भइया अपने गांव में' का समग्र अध्ययन करने के पश्चात बुन्देली लोक से अनजान व्यक्ति भी यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, लोकगीत आदि से भलीभाँति परिचित हो सकता है । इस पुस्तक का जितना महत्व साहित्यिक दृष्टि से है उससे अधिक ऐतिहासिक दृष्टि से भी है क्योंकि बुंदेलखंड के लोक में व्याप्त विभिन्न संस्कृतियों एवं लोक परम्पराओं को समेटने का प्रयास किया है । जिसमें साहित्य के साथ ऐतिहासिक दृष्टि भी परिलक्षित होती है । रचनाकार स्वयं बुन्देली लोक को जीने वाला है, इसीलिए जन्म से लेकर मृत्यु तक विविध रस्म रिवाज से संबंधित लोकगीत मिलते है, तो हास्य विलास के समय मे हृदय के उद्गार को रेखांकित किया है । लोक को जीते हुए उसकी एक एक बारीकी को कलम से उकेरना बहुत ही कठिन काम होता है लेकिन श्री बाबूलाल द्विवेदी जी ने इसे बखूबी निभाया है यदि लोक संस्कृतियों से सम्बंधित पुस्तकों अध्ययन करने की बात आये तो इसका अपना एक अलग स्थान होगा ।
संदर्भ-
1.भइया अपने गांव में (बुन्देली काव्य) रचनाकार-प. बाबूलाल द्विवेदी, संपादक- डॉ राकेश नारायण द्विवेदी, जानकी प्रकाशन, ग्राम छिल्ला जिला ललितपुर,प्रथम संस्करण,2011, पृष्ठ-15
2.वही, पृष्ठ-26
3. वही, पृष्ठ-26
4. वही, पृष्ठ-27
5.वही, पृष्ठ-27
6.वही, पृष्ठ-28
7.वही, पृष्ठ-29