Wednesday, 13 March 2024

घर-घर ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मारिका की समीक्षा

साहित्य चेतना मंच, सहारनपुर (उ. प्र.) द्वारा प्रकाशित 'घर-घर ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मारिका संकलन बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसकी महत्ता इस बात से है कि प्रथम संस्करण 30 जून 2023 को प्रकाशित हुआ और 500 प्रतियाँ निःशुल्क वितरण कर दी गयीं और जनसमुदाय की माँग पर दूसरा संस्करण 17 नवंबर 2023 को 500 प्रतियाँ निःशुल्क वितरण हेतु प्रकाशित की गयीं, जिसके वितरण में अहम भूमिका के तौर पर डॉ. नरेंद्र वाल्मीकि दिखाई दे रहे हैं, आप लगातार विश्व पुस्तक मेले में इसके वितरण के लिए सक्रिय भूमिका में दिखाई दिये, इस स्मारिका का जैसा नाम है, उसी तरह से इसके लिए साहित्य चेतना मंच सहारनपुर की पूरी टीम कार्य भी कर रही है.
इस स्मारिका में सबसे पहले ओमप्रकाश वाल्मीकि जी का संक्षिप्त जीवन परिचय दिया गया है, जिसमें गहन जाँच पड़ताल के बाद उनकी समस्त मौलिक एवं अनुदित रचनाओं का विवरण प्रस्तुत किया गया है तथा उन्हें प्राप्त हुए विभिन्न पुरस्कार एवं सम्मान का विवरण दिया गया है. डॉ.नरेन्द्र वाल्मीकि द्वारा लिखित आलेख 'ओमप्रकाश वाल्मीकि: व्यक्तित्व और कृतित्व बहुत ही महत्वपूर्ण एवं पठनीय है, इसके बाद ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित आत्मकथा जूठन का 'जोहड़ी के किनारे पर चूहडों के मकान' अंश दिया गया है, जिससे भारतीय समाज का हर वह व्यक्ति जिसे जाति के आधार पर भेदभाव दिखाई नहीं देता और उसे चारो तरफ समानता दिखाई देती है, वे इस अंश के माध्यम से दलित समुदाय की स्थिति से वाकिफ हो सकेंगे और ग्रामीण समाज में द्रोणाचार्य किस तरह तरह से आज भी एकलव्य का अंगूठा काटते हैं, उसकी वास्तविक हकीकत से परिचित होंगे. साथ ही दलित समुदाय के भोज्य पदार्थ का किस तरह से मज़ाक उड़ाया जाता है, इसको भी गहराई से समझ सकेंगे. इसमें ओमप्रकाश वाल्मीकि जी द्वारा लिखित सलाम एवं पचीस चौका डेढ़ सौ जैसी महत्वपूर्ण कहानियों को भी संकलित किया गया है, जो आज भी प्रासंगिक हैं. सलाम कहानी ने अपने प्रकाशन के साथ ही साहित्य जगत में भूचाल ला दिया था और जूठन आत्मकथा की आधारशिला के तौर पर इस कहानी को दर्ज किया गया है. इसमें ओमप्रकाश वाल्मीकि और सुधीर सागर के मध्य हुई बातचीत पर आधारित साक्षात्कार भी प्रकाशित किया गया है, जिसमें वाल्मीकि समाज के आंतरिक मुद्दों पर आधारित प्रश्नोत्तरों हैं. इसमें ओमप्रकाश वाल्मीकि के महत्वपूर्ण कथन तथा उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर देश के प्रमुख साहित्यकारों की महत्वपूर्ण टिप्पणी संकलित की गयीं हैं. जिसमें वरिष्ठ आलोचक कंवल भारती जी लिखते हैं- " मैं ओमप्रकाश वाल्मीकि के सदियों के संताप कविता संग्रह को ही दलित आंदोलन का घोषणा- पत्र मानता हूँ. " कँवल भारती जी की यह घोषणा उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है और इसी अंक में संकलनकर्ता ने ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की महत्वपूर्ण कविताओं को संकलित किया है, जिसमें साहित्यिक जगत के साथ राजनीतिक जगत में भूचाल ला देने वाली कविता ठाकुर का कुआँ और  साथ ही जाति, बस्स! बहुत हो चुका, चोट, झाड़ूवाली, पत्थर, वह मैं हूँ, सदियों का संताप, भोपाल कांड, तब तुम क्या करोगे, मुट्ठी भर चावल, एक और युद्ध, वे भयभीत हैं, शब्दजीवी, पेड़ और शब्द बोध आदि कविताओं को संकलित किया है. इसके साथ साहित्य चेतना मंच, सहारनपुर द्वारा ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान की भी शुरुआत की गयी है, जिसके माध्यम से साहित्यिक क्षेत्र में अहम् भूमिका निभानेवाले साहित्यकारों को प्रतिवर्ष सम्मानित किया जाता है और अंत में इस अंक में साहित्य चेतना मंच की पूरी टीम का विवरण दिया गया है.
वर्तमान दौर में जब सामंती ताकतें फिर से पैर पैसारते हुए धर्म के आधार पर समाज में कड़वाहट पैदा कर रही हैं, तब ओमप्रकाश वाल्मीकि का पुनः अध्ययन बेहद जरुरी हो जाता है, यह अंक मूलतः ओमप्रकाश वाल्मीकि की वैचारिक प्रतिबद्धता के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वाल्मीकि सरनेम के माध्यम से लोग ओमप्रकाश वाल्मीकि को महर्षि वाल्मीकि के रामराज्य से जोड़ने लगते हैं. तब ओमप्रकाश वाल्मीकि का साहित्य अध्ययन के लिए प्रेरित करता है, जिससे साहित्यिक जगत के साथ आमआदमी भी उनके साहित्य से रूबरू होकर अपने विकासपथ पर आगे बढ़ सके.

धम्म-पथ

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