Wednesday, 28 February 2018

भूख(लघुकथा)

                                              भूख (लघुकथा)
                                                           ....प्रदीप कुमार गौतम


      फटे- पुराने चीथड़ों से लिपटा हुआ एक व्यक्ति भूख से पीड़ित जंगल से निकलकर गाँव की ओर इस उम्मीद से आता है कि इंसानो की बस्ती में उसके पेट की भूख तो मिट ही जाएगी । रास्ते मे सधे कदमों के साथ गाँव की गली में प्रवेश करता है सभी बस्ती के  लोग उसकी दयनीय हालत देखकर करुणा की जगह अपनी नाक भौं सिकोड़ लेते है । एक चबूतरे में बैठी महिला को देखकर विनम्र भाव से उसने कहा-
माई  ! मैं भूख से तड़प रहा हूँ तीन -चार दिनों से पेट मे अन्न का एक दाना भी नही गया है । इसलिए खाने के लिए कुछ दे दीजिए ।
हट्ट हट्ट ! यहाँ से दूर हट(दुत्कारते हुए उसे दूर हटा देती है)
बेबस -लाचार कदम दो कदम आगे बढ़ता है , लेकिन पापी पेट मे रोटी न होने की वजह से एक कदम भी आगे नही बढ़ा पा रहा है जैसे ही वह आगे बढ़ता है उसे तेरह-चौदह साल का लड़का भोजन करते हुए दिखाई देता है वह वैसे ही भोजन के लिए करने के लिए व्याकुल हो जाता है जैसे  कोई व्यक्ति आम या अंगूर को देखकर मुँह में पानी आ जाता है । वह लाचार होकर कहता है-
भाऊ ! बहुत भूख लागी है कुछ खाने को दे देते तो मेहरबानी होती ।
नशैलची कहीं के दूर हट्ट । जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते है (वह उसे झल्लाते हुए दूर हटा देता है)
धीरे-धीरे भोजन प्राप्त होने की आस टूटती जा रही थी, उसे यह आभास हो गया कि इंसानो को बस्ती में इंसानियत दम तोड़ चुकी है ।
हताश, लाचार भाव से नाउम्मीदी लेकर वह आगे बढ़ा तभी उसे एक दुकान नज़र आई, जहाँ दुकान मालिक दिखाई नही दे रहा था उसे वहाँ कच्चे चावलों की पोटलियां दिखाई दी । हताशा, निराशा के भाव मे उसका इरादा बदल चुका था आखिर भूख से व्याकुल मरता क्या न करता । उसने चावलों की एक पोटली उठाकर चीथड़ों के बीच छुपा ली और आगे बढ़ने लगा । तभी दुकान मालिक अंदर से बाहर आ गया उसे पोटली कम होने का आभास हो थाउसने जोर से आवाज़ दी ।
अबे कबाड़ी ! थोड़ा रुक दुकानदार की आवाज सुनकर वह सहम गया उसे आभास हो गया कि पेट के लिए की गई चोरी में क्षमा नही मिलेगी वह सोच ही रहा था कि दुकानदार ने आकर उसकी गर्दन दबोच ली क्योंकि चीथड़ों के बीच में से चावल की पोटली अलग दिख रही थी ।
हरामखोर..... चोरी करता है
साहेब ! भूख लगी थी इसलिए चावल ले लिए है इतना कहते हुए वह पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगता है । दुकानदार की आवाज़ सुनकर  पड़ोस के लड़के इकट्ठा हो गए थे । एकत्रित  हुई भीड़ को चोर के पकड़े जाने की सूचना हो गई थी इसलिए भीड़  ने उसे पकड़कर पेड़ से बांध दिया  । जबतक वह अपनी व्यथा बताता । भीड़ ने पीटना शुरू कर दिया । लात-घुसो, डंडो, राडो पत्थरों जब तक पीटते रहे जबतक उसके शरीर मे जान रही । बदहवाश होकर वह पड़ा हुआ हुआ था और  एक किलो चावल की चोरी करने वाले चोर को मारकर  संवेदनहीन भीड़ सेल्फ़ी खींच रही थी ।  आखिर पेट की भूख जीत गई और एक इंसान हार गया ।

Tuesday, 13 February 2018

यात्रावृत्तांत

खोज से पूरा विज्ञान,दर्शन, समाज भरा पड़ा है इस देश और समाज मे ऐसा बहुत-सा सहित्य, विज्ञान एवं बहुजन नायकों का संघर्ष छिपा हुआ है, जिसे प्रायोजित तरीके से जमीदोज कर दिया गया है । तब ऐसी स्थिति में शोधकर्ताओं को चाहिए कि ऐसे साहित्य एवं नायकों की खोज की जाए, जिससे समाज और राष्ट्र को राष्ट्र नायकों के संघर्ष से परिचित हो । इसी क्रम में आज हम लोग पेरियार ललई की कर्मभूमि ग्वालियर के कुछ दृश्यों को देखकर संघर्ष की भूमि मुरैना के लिए निकल पड़े, जहाँ पर वे 21 अप्रैल 1933 ई0 में सशस्त्र पुलिस कंपनी 04 बावड़ी, जिला मुरैना  ग्वालियर नेशनल आर्मी के अधीन कनिष्ठ लिपिक पद पर भर्ती हुए थे तथा 22 अप्रैल 1934 ई0 में हेड कांस्टेबल पद पर प्रमोट हुए थे । देश और समाज मे छुआछूत का बोलबाला बहुत अधिक था जिससे सेना भी अछूती नही थी शुरुवाती दौर में अंग्रेजों द्वारा स्वच्छ पानी नही दिया जाता था तो ग्वालियर नेशनल आर्मी दलित पिछड़ी जातियों के सैनिकों से जातिगत भेदभाव किया जाता था ।  जिसकी वजह से पेरियार ललई द्वारा 22 मई 1935 ई0 स्वच्छ पानी की बावड़ी को लेकर किए जाने वाले अछूत भेदभाव के खिलाफ आंदोलन कर दिया ।  पेरियर ललई के संघर्ष के इस दौर को सामन्तवादी लेखकों ने उजागर नही होने दिया, जिसकी खोज में पेरियार ललई की समग्र रचनावली संपादित करने वाले यंग इंटेलेक्चुअल धर्मवीर यादव 'गगन', युवा साहित्यकार डॉ जितेंद्र विसारिया और मैं प्रदीप कुमार गौतम निकल पड़े थे एक छोटी सी बस में हम लोग बैठ गए भीड़ से भरी से बस किसी तरह हम लोगों को मुरैना पहुंचा रही थी । धक्का मुक्की के देते खाते हुए हम लोग मुरैना पहुंच गए । गगन बार-बार कहता भाई कुछ खा लो तभी मिशन चलेगा एक किलो सेव, अमरूद और अंगूरों को लेकर हम लोग ऑटो में बैठकर अमर शहीद ए रामप्रसाद विस्मिल संग्रहालय की ओर चल दिए ।  गंभीर चिंतन, मनन के साथ बीच-बीच मे हास्य विलास में तल्लीन हो जाते थे संग्रहालय से बहुत सी शोध सामग्री मिलने की उम्मीद थी इसलिए हृदय में उमंग का संचार हो रहा था बातचीत में तल्लीन कब संग्रहालय पहुँच गए मालूम ही नही पड़ा । जैसे ही संग्रहालय के दरवाजे पर पहुँचे मन आशंकित हो गया था, क्योंकि संग्रहालय का ताला बंद था वहाँ पर गार्ड से जानकारी हुई कि सोमवार को संग्रहालय बन्द रहता है ।
कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ बटोरकर हम लोग पल्टन 04 सशस्त्र  पुलिस कंपनी की खोज में निकल पड़े, रास्ते मे गोलगप्पे का ठेला देखकर तीनों लोग ठहर गए । डॉ विसारिया गोलगप्पे खाने के लिए मना करते रहे किन्तु हम लोग कहाँ मानने वाले थे ठेले वाले से गोलगप्पे खिलाने के लिए बोलने लगे , लेकिन उसने मसाला न बने होने कारण असमर्थता ज़ाहिर की हृदय में उत्पन्न हुए लालच को खत्म करते हुए, उस स्थान पर जा पहुंचे जहाँ 1933 ई0 में पेरियार ललई पुलिस कंपनी पर भर्ती हुए थे । अंग्रेजी शासन के समय के दस्तावेज खास हमारे हाथ नही लगे, लेकिन वर्तमान समय मे यह पुलिस लाइन, मुरैना के रूप में तब्दील हो गया है । वहाँ पर कुछ पुलिस कर्मियों से पूछने पर  ज्ञात हुआ कि मुरैना में 05वीं पल्टन है, जो इस समय S. A. F.(स्टेट आर्म्स फोर्स) नाम से चल रही है यह जानकारी मिलने पर उत्सुकता बढ़ गई  आखिर पेरियार ललई के संघर्षों को हम लोग खोज रहे थे इसलिए रुकने वाले कहाँ थे ई-रिक्सा करके 5वीं वाहिनी(पल्टन) की ओर प्रस्थान कर दिए । हम लोगों का विश्वास दृढ़ होता जा रहा था

Friday, 9 February 2018

पांच मिनट बाद (लघुकथा)

                लघुकथा
            पाँच मिनट बाद
         (प्रदीप कुमार गौतम)
बसों की ठेला -ठेली से आम आदमी को हमेशा गुजरना पड़ता है आप चाहकर भी बस वाहक के अधीन हो जाते हैं यदि निजी बस से आपका पाला पड़ गया तो बैठे -बैठे पिछवाड़े हल्ल हो जाएंगे लेकिन बस कंडेक्टर की सवारी पूर्ण करने के बाद ही रवानगी का इशारा करेंगे ।
ऐसी ही बस से मेरी भी मुलाकात हो गई, अपने साथी को दो घंटे में पहुंचने का आश्वासन देकर साठ किलोमीटर यात्रा पूरी करने हेतु उरई से भिंड वाली बस में बैठ गया , साथी से मिहोना में मुलाकात होनी थी
बस चल दी रास्ते मे ऐसे झूल रही थी जैसे मेरे जैसा भोंदू किसी मोटे रस्से के झूले में बैठ गया हो और च्यों-म्यो की आवाज आ रही हो । रास्ते मे सड़क की जगह बड़े बड़े गड्डों एवं गिट्टों के दर्शन हो रहे थे । बस किसी तरह पैंतालीस मिनट में जालौन पहुँची तो अच्छी सड़क मिलने की उम्मीद जाग गई  सड़क किनारे सभी लोग अपने-अपने पसंदीदा भोज्य पदार्थ खरीदने लगे पाँच-दस-पंद्रह-बीस -पचीस पूरा आधा घंटा हो गए बस में कोई हरकत नही ज्यों की त्यों खड़ी रही । सभी टोक रहे थे बस कब चलेगी  ?
पांच मिनट में ! कंडक्टर जवाब देता
इंतजार करने लगे पांच-दस-पंद्रह-बीस मिनट फिर निकल गए लेकिन बस में कोई हरकत नही । मैंने पूछा भाई कब चलेगी ?
बस पाँच मिनट में ! कंडक्टर ने फिरसे वही जवाब दिया
इंतजार अब बोझिल होता जा रहा था अब धीरे -धीरे गुस्सा आ रहा था लेकिन शांत बैठा था उसका पांच मिनट हमे शांत कर देता था । आखिर दस मिनट बाद बस चली । कुछ आस बंध गई थोड़ा चली फिर खड़ी हो  गई साथी से मिलने की जल्दी बस का यह उपक्रम परेशान किए हुए था रुकते ठहरते जालौन से बंगरा एक घंटे में पहुँच पाई  सीटें तो शायद ही किसी को मिल पा रही थी पूरी तरह से बस भरी होने के बाद भी लोग चड़े जा रहे थे इसी बीच झंडुबाम, प्राकृतिक दंतमंजन बस दस रुपये में ऐसी लम्बी बात की लंबे-लंबे भाषण देने वाले भी शरमा जाए । बस फिर से खड़ी हो आधा घंटे खड़े होने के बाद भी जब नही चली तो मैंने पूछ ही लिया कब चलेगी ?
पाँच मिनट में ! वही जवाब कंडक्टर ने दिया
आज साठ किलोमीटर की यात्रा छः घंटे की होने वाली थी एक छोर में हम दूसरे छोर में साथी गगन ।
बस इंतजार जारी था
बस के कंडक्टर का हर बार पाँच मिनट जारी था ।

Thursday, 8 February 2018

जहरीली गालियाँ

            लघुकथा
         जहरीली गालियाँ
        ( प्रदीप कुमार गौतम)
       

जालौन जिले के उत्तर दिशा की ओर कदौरा से बेतवा घाट की ओर जाने वाली सड़क पर कानाखेड़ा नाम का  छोटा-सा गाँव है । साल में दो चार बार ही गाँव जाना होता है, लेकिन इस वर्ष लगातार गाँव जाने का सिलसिला जारी है, तो वहाँ पर पानी के लिए संघर्ष करती महिलाओं को देखकर हृदय पीड़ित हो जाता है कई घरों के बीच एक हैडपम्प होने की वजह से सुबह से शाम तक भडेरी रखी रहती है कई बार तो भद्दी गालियों  से लड़ाई होकर मुड़ फुटौवल तक की नौबत आ जाती है । इस संघर्ष से होकर महिलाओं को पानी मिल पाता है और सब अपने अपने घरों की ओर चली हैं
   मैंने एक काकी से पूछा
   काहे काकी ! इस झगड़े को देखकर आपको बुरा नही लगता है
नही बेटा ! काकी ने जवाब दिया
काकी के जवाब को सुनकर मैं हत्प्रत रह गया
मैंने पूछा -क्यों
वो बोली- बेटा ये नल तो कल से लग गए हैं हम लोग साठिया कुआँ से पानी भरकर लाती थी, जिसमें पूरा-पूरा दिन बैठना पड़ता था कटी-भुजी गालियाँ सुननी पड़ती थी । यदि कभी ज्यादा बर्तन हो जाते थे तो पंडतैनियाँ और ठाकुरैनियाँ  कहती थी ।
ओ चमरिया ! यहाँ उतर आ घाट से तै चार दिना न नहाइये तो कौन कुछ बिगड़ जइ
और हम लोगों को घाट छोड़ना पड़ता था
कभी-कभी तो पूरा दिन पानी का इंतजार करना पड़ता था । आज अपने दरवाजे में आपस मे ही तो लड़ती है कमसे कम उन पंडतैनियाँ और ठाकुरैनियाँ की कटी-भुनी जहरीली गालियाँ तो नही सुननी पड़ती है ।

Friday, 2 February 2018

अध्ययन की लत से दूर होने के परिणाम

साहित्य के अध्ययन से सामाजिक समझ पैदा होती है और समाज मे काम करने से साहित्य को समझने की शक्ति प्रबल होती है । मेरे दिमाग मे कई बार अनेकों योजना तैयार होती है लेकिन उनको मैं कभी मुकाम तक नही पहुंचा पाया हूँ कई बार विचार किया कि क्या कारण है जिसकी वजह से मैं अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त नही कर पा रहा हूँ । साहित्य एवं समाज के अध्ययन में बहुत से द्वंद्व प्राप्त होते है क्योंकि समाज मे काम करते हुए साहित्यिक अध्ययन की कमी आती है । समाज मे काम करने वाले व्यक्ति को नौकरी की परवाह नही रहती है और नौकरी के अभाव में वह परिवार के भरण पोषण में सक्षम नही हो पाता है और पारिवारिक भरण पोषण में कमजोर होने पर उस पर अनेकों लांछन लगना स्वाभाविक है एक समाज का कुशल नेतृत्व करता में जरूरी नही रहता है कि वह उतना ही अधिक परिवार चलाने वाला हो । समाज मे काम करते हुए अनचाहे आपके अनेकों दुश्मन बनना तय है क्योंकि जो समाज मे जागरूकता के काम नही करते है और वे समाज मे खुद को सदैव प्रतिष्ठित रखना चाहते है ऐसे लोगो की नजरों में आप स्वाभाविक रूप से खटकने लगेंगे इसलिए समाज मे काम करते हुए ऐसे व्यक्तियों को अनदेखा करते हुए समाज मे काम करे यदि आपका उद्देश्य समाज को बेहतर दिशा देने का है तब आप अपने भविष्य को भी एक नया आयाम जरूर दें क्योंकि कई बार सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तो आप बहुत मजबूत हो जाते है और उम्र के उस पड़ाव में पहुंच जाते है जहाँ जॉब कि विभिन्न संभावनाएं लगभग खत्म हो जाती है आप अविवाहित रूप में समाज सेवा बेहतरीन तरीके से कर सकते है किंतु विवाहित होने के बाद आपके पार्टनर का समाज से कितना सरोकार है इस पर निर्भर हो जाता है । समाज और साहित्य कि चर्चा करते हुए मैं अपने उद्देश्य पर बात करना ही भूल गया । 2015 से मैं अपनी पुस्तक प्रकाशन की योजना तैयार कर रहा हूँ, किन्तु 2018 आने के बाद भी पूर्ण नही हो पाई । इसकी गहराई में जाकर में मैंने अध्ययन किया तो पाया कि मैं लगातार एक विषय पर केंद्रित नही रहा जिसकी वजह से पूर्व नियोजित योजनाएं निरंतर फैल होती गई । दलित आत्मकथाओं पर कई शोध आलेख  प्रकाशित होने पर आत्मकथा पर पुस्तक लाने की योजना तैयार की और कविता लेखन की ओर धयान चला गया और कई कविताएं लिखी, फिर काव्य पर पुस्तक लाने का विचार पैदा हुआ कविता लिखते लिखते लघुकथाओं की ओर ध्यान गया और एक माह तक निरन्तर लघुकथाएँ लिखी तब लघुकथाओं पर पुस्तक आनी चाहिए ऐसा विचार पैदा हुआ । मैं अपने ही द्वंदों में जीता रहा और कोई स्थायी पुस्तक नही ला पाया । लेखन के साथ फील्ड में काम करने से कई अनुभव प्राप्त हुए जब आप फील्ड में वर्क करते हो तो निश्चित रूप से धन बहुत खर्च होता है यदि आप रुपये माँगकर फील्ड में काम करते हो तो निश्चित ही आप पर दलाल जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाने लगेगा और यदि घर से रुपये खर्च करोगे तो निश्चित मानिए आप फॉर्म भरने तक के रुपये नही जुटा पाओगे आप कई तरीके के कौतूहल से भर जाएंगे एक समय तक आपको संगठन में काम करना बेहतर लगेंगा लेकिन एक उम्र के बाद स्थाई कैरियर की याद जरूर सताएगी । कई लोग ऐसे होते है कि सभी चीजें मैनेज करते हुए आगे बढ़ते है लेकिन उनके पास सुविधाएं हो सकती है या वे बहुत प्रतिभावान हो सकते है आपके पास इनमे से क्या है इसका जरूर आंकलन कर ले क्योंकि माता पिता बहुत ही उम्मीदों के साथ आपको शहर पढ़ने के लिए भेजते है किंतु यहाँ विभिन्न सामाजिक संगठन आपकी ऊर्जा को संगठनों में खर्च करने के लिए झोंक देते है ऐसा मैं बिल्कुल नही कहता हूं कि सामाजिक संगठनों में काम नही करो खूब करो किन्तु इससे आपकी शिक्षा पर प्रभाव तो नही पड़ रहा है यह जरूर देख लें क्योंकि कई बार जोश में आकर हम सही गलत का निर्णय नही कर पाते है और जब समझ पैदा होती है तब कोई एक मुकाम पर नही होते है क्योंकि सामाजिक रुचि निश्चित रूप से आपके अध्ययन में बाधा अवश्य पहुंचाती है क्योंकि मैं स्वयं 08 से 10 घंटे प्रतिदिन पढ़ता था और अच्छी खासी जानकारी रखता था कोई भी टेस्ट मेरे लिए आसान रहता था और थोड़ी से मेहनत में टेस्ट पास कर लेता था किंतु सामाजिक संगठनों के प्रभाव में आने के बाद एक तो स्थाई रूप से पढ़ाई में दिमाग नही लगता है और जो जानकारी पहले थी वह भी पूर्णतः भूल गया क्योंकि चाहे कर भी वह पढ़ाई नही हो पाती है । सामाजिक काम करने की ललक होनी चाहिए किन्तु माता पिता के अरमानों को भी थोड़ा खयाल कर लो क्योंकि किसी भी परीक्षा को पास करने हेतु छः माह की पढ़ाई पर्याप्त होती है इसलिए पहले जॉब हासिल करो इसके बाद समाज के लिए जो संघर्ष करना हो दिल खोलकर करो क्योंकि जब आपके पास किराए के लिए रुपये नही होते है और आप खुद को समाज सेवक कहते हो तब आपके मध्य के रोजगारपरक लोग आप पर हँसते है । आपके सामने लंबी लंबी बातें करने वाले यदि उनसे 10 हजार रुपये की मदद मांग लो तो नाक भौंह सिकोड़ने लगते है इसलिए समाज सेवा के माध्यम से राजनीति में जाना है या नौकरी में यह जरूर निर्धारित करो समाज और साहित्य में मैंने स्वयं लाइफ के 04 वर्ष पीछे चला गया हूँ क्योंकि मेरे साथ का प्रत्येक युवा जॉब कर रहा है मेरा भी चयन हुआ किंतु कुछ कारणों की वजह से स्थाई नही हो पाया हूँ । वे साथी समाज की लंबी लम्बी बातें तो करते है खुद को सबसे बड़ा हितैषी भी बताते हैं किंतु जब जरूरत दो चार हजार की आ पड़ी तो कहते है तुम्हारे पास चार हजार रुपये नही है मांगने पर तंज कसेंगे पिता को 25 हजार दे दिए है इसलिए नही दे पा रहा हूँ । हकीकत यह है कि उन्हें आपमें कोई दिलचस्पी नही होती है बल्कि आपकी समाजसेवा को वे महा मूर्ख समझते है पीठ पीछे बड़ी बड़ी ढींगे हांकते है । सत्य यह है कि आप यदि सफल है तो ही आपका वास्तविक बजूद है यदि समाज सेवा के क्षेत्र में जाना है तो भी नए मुकाम को हासिल करो यदि जॉब करते है तो बेहतर है और यदि खुद का बिजनेस डालते है तो और भी बेहतर है । क्योंकि ये सभी चीजें उम्र में हो तो उसका आनंद ही कुछ अलग होता है उम्र निकल जाने पर सभी का रंग फीका पड़ने लगता है । इसलिए भाई मैंने तो निर्धारित कर लिया है संगठन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपनी पुस्तक लाने की योजना पर काम करूँगा जिससे खुद के साथ समाज का भी कुछ भला हो सकेगा ।
जय भीम नमो बुद्धाय
जय मान्यवर कांशीराम
लेखक-प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...