....प्रदीप कुमार गौतम
माई ! मैं भूख से तड़प रहा हूँ तीन -चार दिनों से पेट मे अन्न का एक दाना भी नही गया है । इसलिए खाने के लिए कुछ दे दीजिए ।
हट्ट हट्ट ! यहाँ से दूर हट(दुत्कारते हुए उसे दूर हटा देती है)
बेबस -लाचार कदम दो कदम आगे बढ़ता है , लेकिन पापी पेट मे रोटी न होने की वजह से एक कदम भी आगे नही बढ़ा पा रहा है जैसे ही वह आगे बढ़ता है उसे तेरह-चौदह साल का लड़का भोजन करते हुए दिखाई देता है वह वैसे ही भोजन के लिए करने के लिए व्याकुल हो जाता है जैसे कोई व्यक्ति आम या अंगूर को देखकर मुँह में पानी आ जाता है । वह लाचार होकर कहता है-
भाऊ ! बहुत भूख लागी है कुछ खाने को दे देते तो मेहरबानी होती ।
नशैलची कहीं के दूर हट्ट । जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते है (वह उसे झल्लाते हुए दूर हटा देता है)
धीरे-धीरे भोजन प्राप्त होने की आस टूटती जा रही थी, उसे यह आभास हो गया कि इंसानो को बस्ती में इंसानियत दम तोड़ चुकी है ।
हताश, लाचार भाव से नाउम्मीदी लेकर वह आगे बढ़ा तभी उसे एक दुकान नज़र आई, जहाँ दुकान मालिक दिखाई नही दे रहा था उसे वहाँ कच्चे चावलों की पोटलियां दिखाई दी । हताशा, निराशा के भाव मे उसका इरादा बदल चुका था आखिर भूख से व्याकुल मरता क्या न करता । उसने चावलों की एक पोटली उठाकर चीथड़ों के बीच छुपा ली और आगे बढ़ने लगा । तभी दुकान मालिक अंदर से बाहर आ गया उसे पोटली कम होने का आभास हो थाउसने जोर से आवाज़ दी ।
अबे कबाड़ी ! थोड़ा रुक दुकानदार की आवाज सुनकर वह सहम गया उसे आभास हो गया कि पेट के लिए की गई चोरी में क्षमा नही मिलेगी वह सोच ही रहा था कि दुकानदार ने आकर उसकी गर्दन दबोच ली क्योंकि चीथड़ों के बीच में से चावल की पोटली अलग दिख रही थी ।
हरामखोर..... चोरी करता है
साहेब ! भूख लगी थी इसलिए चावल ले लिए है इतना कहते हुए वह पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगता है । दुकानदार की आवाज़ सुनकर पड़ोस के लड़के इकट्ठा हो गए थे । एकत्रित हुई भीड़ को चोर के पकड़े जाने की सूचना हो गई थी इसलिए भीड़ ने उसे पकड़कर पेड़ से बांध दिया । जबतक वह अपनी व्यथा बताता । भीड़ ने पीटना शुरू कर दिया । लात-घुसो, डंडो, राडो पत्थरों जब तक पीटते रहे जबतक उसके शरीर मे जान रही । बदहवाश होकर वह पड़ा हुआ हुआ था और एक किलो चावल की चोरी करने वाले चोर को मारकर संवेदनहीन भीड़ सेल्फ़ी खींच रही थी । आखिर पेट की भूख जीत गई और एक इंसान हार गया ।