खोज से पूरा विज्ञान,दर्शन, समाज भरा पड़ा है इस देश और समाज मे ऐसा बहुत-सा सहित्य, विज्ञान एवं बहुजन नायकों का संघर्ष छिपा हुआ है, जिसे प्रायोजित तरीके से जमीदोज कर दिया गया है । तब ऐसी स्थिति में शोधकर्ताओं को चाहिए कि ऐसे साहित्य एवं नायकों की खोज की जाए, जिससे समाज और राष्ट्र को राष्ट्र नायकों के संघर्ष से परिचित हो । इसी क्रम में आज हम लोग पेरियार ललई की कर्मभूमि ग्वालियर के कुछ दृश्यों को देखकर संघर्ष की भूमि मुरैना के लिए निकल पड़े, जहाँ पर वे 21 अप्रैल 1933 ई0 में सशस्त्र पुलिस कंपनी 04 बावड़ी, जिला मुरैना ग्वालियर नेशनल आर्मी के अधीन कनिष्ठ लिपिक पद पर भर्ती हुए थे तथा 22 अप्रैल 1934 ई0 में हेड कांस्टेबल पद पर प्रमोट हुए थे । देश और समाज मे छुआछूत का बोलबाला बहुत अधिक था जिससे सेना भी अछूती नही थी शुरुवाती दौर में अंग्रेजों द्वारा स्वच्छ पानी नही दिया जाता था तो ग्वालियर नेशनल आर्मी दलित पिछड़ी जातियों के सैनिकों से जातिगत भेदभाव किया जाता था । जिसकी वजह से पेरियार ललई द्वारा 22 मई 1935 ई0 स्वच्छ पानी की बावड़ी को लेकर किए जाने वाले अछूत भेदभाव के खिलाफ आंदोलन कर दिया । पेरियर ललई के संघर्ष के इस दौर को सामन्तवादी लेखकों ने उजागर नही होने दिया, जिसकी खोज में पेरियार ललई की समग्र रचनावली संपादित करने वाले यंग इंटेलेक्चुअल धर्मवीर यादव 'गगन', युवा साहित्यकार डॉ जितेंद्र विसारिया और मैं प्रदीप कुमार गौतम निकल पड़े थे एक छोटी सी बस में हम लोग बैठ गए भीड़ से भरी से बस किसी तरह हम लोगों को मुरैना पहुंचा रही थी । धक्का मुक्की के देते खाते हुए हम लोग मुरैना पहुंच गए । गगन बार-बार कहता भाई कुछ खा लो तभी मिशन चलेगा एक किलो सेव, अमरूद और अंगूरों को लेकर हम लोग ऑटो में बैठकर अमर शहीद ए रामप्रसाद विस्मिल संग्रहालय की ओर चल दिए । गंभीर चिंतन, मनन के साथ बीच-बीच मे हास्य विलास में तल्लीन हो जाते थे संग्रहालय से बहुत सी शोध सामग्री मिलने की उम्मीद थी इसलिए हृदय में उमंग का संचार हो रहा था बातचीत में तल्लीन कब संग्रहालय पहुँच गए मालूम ही नही पड़ा । जैसे ही संग्रहालय के दरवाजे पर पहुँचे मन आशंकित हो गया था, क्योंकि संग्रहालय का ताला बंद था वहाँ पर गार्ड से जानकारी हुई कि सोमवार को संग्रहालय बन्द रहता है ।
कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ बटोरकर हम लोग पल्टन 04 सशस्त्र पुलिस कंपनी की खोज में निकल पड़े, रास्ते मे गोलगप्पे का ठेला देखकर तीनों लोग ठहर गए । डॉ विसारिया गोलगप्पे खाने के लिए मना करते रहे किन्तु हम लोग कहाँ मानने वाले थे ठेले वाले से गोलगप्पे खिलाने के लिए बोलने लगे , लेकिन उसने मसाला न बने होने कारण असमर्थता ज़ाहिर की हृदय में उत्पन्न हुए लालच को खत्म करते हुए, उस स्थान पर जा पहुंचे जहाँ 1933 ई0 में पेरियार ललई पुलिस कंपनी पर भर्ती हुए थे । अंग्रेजी शासन के समय के दस्तावेज खास हमारे हाथ नही लगे, लेकिन वर्तमान समय मे यह पुलिस लाइन, मुरैना के रूप में तब्दील हो गया है । वहाँ पर कुछ पुलिस कर्मियों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि मुरैना में 05वीं पल्टन है, जो इस समय S. A. F.(स्टेट आर्म्स फोर्स) नाम से चल रही है यह जानकारी मिलने पर उत्सुकता बढ़ गई आखिर पेरियार ललई के संघर्षों को हम लोग खोज रहे थे इसलिए रुकने वाले कहाँ थे ई-रिक्सा करके 5वीं वाहिनी(पल्टन) की ओर प्रस्थान कर दिए । हम लोगों का विश्वास दृढ़ होता जा रहा था
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Tuesday, 13 February 2018
यात्रावृत्तांत
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धम्म-पथ
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