Thursday, 19 December 2013

प्रेम


यदि प्रेम बस शादी है
तो मैं नही मानता
प्रेम में भाव है यदि लेन -देन का
तो मैं नही मानता
प्रेम है उजागर करने का नाम
तो मैं नही मानता
प्रेम आत्महत्या का है नाम
तो मैं नही मानता
यदि प्रेम शक से हैं बंधा
तो मैं नही मानता
यदि प्रेम है आडम्बर का नाम
तो मैं नही मानता
क्योंकि जो मैं जनता हूँ
उसी को मैं प्रेम मानता हूँ
समर्पण है जँहा सदा नित्य
सहयोगी बना खड़ा हो साथं
जग एक ओर पर प्रेम है संग
शहादत के लिए तैयार है जो हरपल
जहाँ सूरत देख प्रेमी की
ह्रदय पुलकित हो जाता है
भ्रमर गुंजार करने के पश्चात्
पुष्प रस चख जाता है
जहाँ सर्वत्र समर्पण है
हर प्रकार से
बस !प्रेमी उसी का नाम है
प्रेमी उसी का नाम है

                                                                  प्रदीप कुमार गौतम
                                                                     १९/१२/२०१३

Wednesday, 18 December 2013

तू जान है मेरी


तू इबादत के संग पहचान थी  मेरी
हँसती हुई जिंदगी की चिराग थी  मेरी
खिले हुए मुखड़े पर मुस्कान थी मेरी
हाँ माना कि तुझे डांटा है मैंने तुझे
सताया भी हद से ज्यादा तुझे
तेरी शर्त के मुताबिक ढाला था अपने आपको
जब -जब तू रूठी मनाया मैंने
तेरी जिद के आगे सिर नवाया मैंने
कुछ जग में करके दिखाऊँगी था कथन तेरा
तेरे कथन को आयाम देने में लगा था मैं
तेरे हौंसलों को उड़ान देने में लगा था मैं
नहीं पिघलाया स्वहृदय को मैंने तेरे सामने
शायद तेरे ह्रदय को शिल समान बनाने में लगा था मैं
तेरी खातिर उसूलों को भी तोड़ा था
गुरु -शिष्य कि परम्परा में प्रेम बीज बोया था
मेरे उसूलों को तूने पूरी तरह धोया था
फिर भी मैं चुप था ,खामोश था
क्योंकि
इस ह्रदय में सिर्फ तू ही समायी थी
तू खूब दूर हो जा मुझसे
लेकिन मेरे ह्रदय में तेरी परछाई थी
नही तोड़ूंगा मैं बंधन यह प्रेम का
क्योंकि सम्पूर्ण जग में सिर्फ
तू ही मेरी एक जान थी
जान है
जान  रहेगी

                                                                            प्रदीप कुमार गौतम
                                                                             १८/१२/२०१३  

Monday, 16 December 2013

मन

हे मन !तू उदास क्यूँ है
तेरी चंचलता के किस्से
नित्य सुने हैं ढेर सारे
फिर आकुलता का कारण
क्या है
तू सृष्टि में एक मात्र
अथक रूप से करता है कार्य
प्रातः जागरण पर जाग मनुज संग
रहकर भी समीप नही होता तू
भ्रमण करता है तू
बहती शीतल समीर संग
हिम -खण्ड में लोटता पाया मैंने
या क्षीर का पान दृढवत अवयव को कर
क्रीड क्षेत्र में धावक बन दौड़ता
साथ रहकर भी घूमता है तू
मध्यान्ह में मनुज साथ रहकर भी
कहीं जूस का पान करता है
आखिर मन तो मन है
भ्रमण करना है उसका काम

प्रदीप कुमार गौतम
१६/१२/२०१३

Sunday, 15 December 2013

मोहब्बत

मोहब्बत चीज ही ऐसी है
 कभी होती है अपनों से
 कभी होती है सपनों से
 कभी अन्जान राहों से
 कभी गुमनाम नामों से
मोहब्बत चीज ही ऐसी है.....

कभी होती है फूलों से
 कभी बचपन के झूलों से
 कभी बेइख्त्यारी में
 कभी पक्के उसूलों में
 मोहब्बत बस मोहब्बत है
 मोहब्बत एक इबादत है .

मुहब्बत चीज ही ऐसी है …
दुखों में रुला देती है
,दर्द अनमोल देती है  है
,मोहब्बत चीज  ही  ऐसी  है.................  

                                                                प्रदीप कुमार गौतम
                                                                 १५/१२/२०१३

Saturday, 14 December 2013

आँखे

दिल यूँ ही नही धड़कता
उसमें अरमान उपजते हैं
नये जमाने के नये
पैगाम उमड़ते हैं
मेरी हसरत बन गयी है
तेरी आँखों की चाँदनी
आँखों की रुसवाई में डूब
हम आपके गुलाम बन गये हैं 

Monday, 9 December 2013

टेट की कहानी मेरी जुबानी


क्या खूब खेल मचा है
सर्वत्र वक्तव्यों का ढेर पड़ा है
२०११ के परीक्षा फल से
यूपी टेट का मेल पड़ा है
मायाराज में निकली थी भर्तियां
कुछ 72825 की संख्या में
तब से ठेलम -ठेल पड़ा है
विगत काल ड्राफ्ट की माँग हुई
तब पोस्ट ऑफिसों में झेलम -झेल पड़ा था
नही प्राप्त हुए थे उक्त समय
टिकट लिफाफे पर चिपकाने के लिए
फिर भी नौकरी कि चाह में
५० रू में २५ के टिकट मिले
संतोष किया था ह्रदय में
धैर्य को धारण कर
पर हाय !वह न पूर्ण हो सकी
चुनाव आ गया था
आचार संहिता लगी हुई थी
फिर माया के स्थान पर
 अखिलेश सरकार बनी हुई थी
ह्रदय में उमंगता का सैलाब
उमङ पड़ा था युवकों पर
क्योंकि युवा सरकार युवाओं हेतु
कुछ सुलभ फैसले लेगी
पर उनकी निगाहों में २०१४
 लोकसभा चुनाव अटका था
नियम ,कायदे ,कानून ,बदले सारे
टेट के स्थान पर गुणांक का
निर्धारण हुआ पर क्या हुआ
आप और हम सभी जानते है
कोर्ट के चक्कर काट -काट
हालत खस्ता हो गयी
मित्रो !कई लोगों के रिस्तों में
टेट कि कालिख पुत गयी
न कुछ हुआ है न कुछ होगा
बस यही है विनती मेरी
मत करो उम्र को बर्बाद ऐसे
जैसे देश विकास कर रहा है
हम भी साथ दे उसका
और तो कुछ नही कर सकते हम
जनसंख्या वृद्धि में ही
साथ दे उसका

                                                    प्रदीप कुमार गौतम

Monday, 2 December 2013

आज का भिक्षुक


वह दो टूक कलेजे कर पछताता
अब वक्तव्य जर्जर हो गया
निराला का चिंतन अब
व्यर्थ हो गया
अब जनसंख्या विस्फोट के साथ
भिक्षुकों कि तादात बढ़ गयी
अब उनमें दयनीयता का
ह्रास हो गया
कटोरा उनके हाथ में
अति रमणीयता के साथ
शोभित होता है
वह भीख दयनीयता की नही
हक़ से मांगते है
हुजूम का हुजूम निकलता है
उनके पास मंजिल दो मंजिल
छोड़ो बड़े- बड़े महल हैं उनके
क्योंकि भिक्षुक अब
कमजोर नही रहे
वे साधारण जनो से है सशक्त
मैं यह नही कहता की
आज सभी भिक्षुकों का ऐसा
हाल है
लेकिन आज भीख मज़बूरी से नही
शौक से मांगते है
उनमें उत्साह परिदृश्य होता है
चलती बसों में ,ट्रेनो में
आपके -हमारे मुहल्ले की
हर गली में
इनका धंधा फलफूल कर
विकसित हो रहा है

Sunday, 1 December 2013

फुले साहेब

जिसकी एक आवाज से
 चल पड़ा पूरा समाज
जिसकी एक हुंकार से
मच गया मनुवादियों में हाहाकार
शिक्षा की ज्योति जलायी उसने
उस महान आत्मा को शत -शत प्रणाम
 जय भीम जय भारत नमों बुद्धाय

Tuesday, 26 November 2013

कोपता

कोपता
वह शुक वर्ण से विकसित
स्व -लम्बाकार से मुखरित
डाल पर लहलहा रही थी
शुक पंख समान स्व -पत्रों से
गगन को चाह रही थी
तब लालची मनुज स्व कर से
बल्लरी को रौंद शुक पंख तुल्य
लौकी को विरल करता है
कायरता से भरकर मर्माहत
प्रहार निरत वह करता है
फिर छिलनी से लम्बाकार छील
पीलाकर बेसन में समिश्रण कर
गोलाइयों में ढालकर
प्याज को बारीकियों में
विभाजित कर
उसका भी समिश्रण नमक
साथ करता है
खौलते तेल के मध्य
छोड़ दिया जाता है
उछलकूद कर फड़फड़ाते हैं वे
भाग जाने कि चाह में
मनुज में तेल के छीटें
छोड़ जाते हैं वे
पूर्ण आगोश से दौड़ते है वे

सुबह


हे ऊषा !
आज हृदय क्यों आकुल है ?
तू बता ना
ओस की बूँदो को भरकर
तू कहाँ लायी
इतनी मनोहर शीतलता
तूने कहाँ से पायी ?
इतनी श्यामलता को समेत
अमृत की बूंद को
तू कहाँ से लायी ?
हे प्रभा !
तूने ऊषा का हरण कर लिया
अमृत कि बूंद को तत्क्षण
ऊषा से विरल कर दिया
श्यामलता को ढक
जगत को प्रकाशित कर दिया
गगन मण्डल को लालिमा से
मण्डित कर दिया।
हे प्रभा !
यह शक्ति तूने कहाँ से पायी ?
मुझे बता ना।
हे प्रातः !
ये क्या तूने सोते मनुज में
शक्ति ,ओज ,शौर्य,से
संचित कर दिया
धैर्य कि परम्परा को
विकसित कर दिया
प्रभा का हरण कर
लालिमा को विरल कर
अरुण की किरणों से
जगत को भर दिया।
मनुज जग गया
चिड़ियाँ चहक उठी
देवालयों में शंक बज उठे
हे प्रातः !
ये पुञ्ज तूने कहाँ से पायी
मुझे बता न। .

                                                                             प्रदीप कुमार गौतम
                                                                               २६/११/२०१३


























































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































Sunday, 24 November 2013

तेरे ख़यालों में


तेरे नैनों की कातर निगाहों से
दिल पथभ्रष्ट हो गया
बनना चाहता था अफसर
लेकिन मैं तेरा मजनू बना
सादगी सी उमंग उमड़ उठी
दिल चंचलता में खो गया
कहते थे इस संसार में
कुछ बड़ा करके दिखायेंगे
बड़ा तो कुछ कर न सके
तेरी कातर निगाहों के सामने
हाँ बस यही अरमान उपजा
डूबा रहूँ तेरी कातर निगाहों में
क्या करूँ क्या न करूँ
ये प्रश्न निरंतर है उपजते
सुबह -शाम आठों प्रहर
तेरा शशि -मुख मण्डल है घूमता
तेरी निगाहों की चंचलता से
तेरे ख़यालों में हूँ डूबता।

                                                                प्रदीप कुमार गौतम
                                                                     २४/११/२०१३

स्त्री आखिर क्यों


वह भूधरा पर  आते ही
लक्ष्मी का आगमन कहलाती है
वह नित्य कोमल हाथों से
परिवार में सादगी लाती  है
वह बचपन से ही घर को
सजाती और संवारती है
वह केवल घर ही नहीं
 विद्यालय को भी सजाती है
वह भाषणों में भी
नित्य नया सूरज जगाती है
वह पुरुष को भी
अपने स्वरूप से निखारती है
वह बन बहू ससुरालियों के
दिल में अलख जगाती है
वह बन माता ममता से
पुत्रों को दुलारती है
वह बन दादी अपने नातियों को
सदा लोरियाँ सुना हँसाती है
वह अंश है इस संसार का
वह कुञ्ज है ज्ञान भण्डार का
वह पुरूष की सहधर्मिणी है
वह समान है वह अलौकिक है
वह भण्डार है ममत्व का
फिर क्यों आज उसका ह्रास है
वह क्यों विक्षिप्त है समाज से
क्यों उसका आज अपमान है
वह सदियों से हमारी
बेटी ,माता ,बहू दादी
सब कुछ तो है वह
फिर क्यों उसे समानता नहीं
आखिर क्यों ?

                                                     प्रदीप कुमार गौतम
                                                       २४/११/२०१३

Saturday, 23 November 2013

दीवानगी


कोई तो है जो याद है
कोई तो है जो मुझे भाता है
पता नही क्या हो गया
जो दिन- रात मुझे कुछ बताता है
सिमट गये हैं दिन
उखड़ गयीं हैं राते
भूल गया सबकुछ
बीत गयीं बातें
कुछ दिल में कसक उठी
और रीत गयी पलकें


                                                                            प्रदीप कुमार गौतम

Wednesday, 13 November 2013

पतंगा


जैसे ही अरुण लालिमा को
अपनी गोद में भरकर
पहाड़ी की  गोद में जाकर
स्वयं मग्न होता है
लेता है हिलोरे उमंगताओं से भरकर
फिर यकायक दिवस गगन से
तिमिर स्व स्वरुप निखरता है
नालियों से पचपचाती गन्दगी से
पंख खोल मधुर गुंजार कर
प्रकाश कि चाह में
भर उड़ान चल पड़ा
यत्र -तत्र देखकर
चमचमाती विधुत लाइट को
पाने कि चाहे में
फैल पंखों को
एक उड़ान भर
अचानक पहुँचा समीप
झपटा आगोश में
समेटने के लिए
पर ऊष्मा कि लौ
धधकी अति जोर से
थोड़ा ठिठक हटा कुछ दूर
ऊष्मा को पाकर
चेतन में व्याकुलता बङी
उसे पाने कि चाहे में
धन कि चाहे में मनुज
जैसे घूमता है दौड़ता है
अधिक से अधिक एकत्र करने के लिए
खो देता है अपना स्वरुप
वैसे ही वह दौड़ा
उसे समेटने के लिए
पर हाय !वह मिट गया
उस ऊष्मा की
धधकती लौ से

                                                                         प्रदीप कुमार गौतम
                                                                               १३/११/२०१३

अमावस की रात


अँधेरी रात में बैठा अकेले
आकाश को निहारा था
तारों की रोशनी थी मद्दियम
उन्होंने किसी को पुकारा था
दुग्धावल स्वेद किरणों को भरकर
शीतलता को समेटकर
उसे दिया इशारा था
मानो बादल अर्द्धरात्रि में
अटखेलियां करते हुए
ताराओं कि शीतल किरणों का
स्पर्श करना चाहता था
लेकिन ताराओं को तो केवल
एक चाँद ही प्यारा था
वे सूर्यास्त होते ही
मिलन कि आस में
बैठ गये थे अपनी
चांदनी चद्दर फैलाकर
वे ह्रदय में आकुलता को भरे हुए
बिलबिला रहे थे मिलन के लिए
लेकिन उनकी आस अधूरी थी
और रहेगी भी आज सम्पूर्ण निशा
क्योंकि आज
अमावस की रात थी

                                                                                      प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                        १३/११/२०१३

Tuesday, 12 November 2013

मित्रता कि परत


तू आज मुरझायी कली -सी क्यों है
स्ववाकपटुता में चातुर्य को भरे
फिर भी अवयव से अकुलायी क्यों है
आत्म -चेतनता से है तू संचित
फिर यह नीरसता पायी क्यों है
माधुर्य भर देता है तेरे करों का छुअन
पर उनमें श्यामलता छायी क्यों है
तेरे वर्णों की अभिव्यंजना है अति मनोहर
फिर उन्होंने बेरूखू दिखायी क्यों है
तेरे वदन में मंद मुस्कान है मुखरित
फिर उसमें यह सिकुड़न तूने बढ़ायी क्यों है
तेरे अधरों की प्रफुल्लता है अति रमणीय
पर उसमें यह धूल सनायी क्यों है
तेरे कदमों की चाल है बढ़ी मंथर
फिर उनमें यह रूकावट आयी क्यों है
तेरे मस्तिष्क का विश्वास है अति दृढ़
फिर उसने यह व्याकुलता दिखायी क्यों है
तेरे धमनियों का रक्त हैअति तीव्र
फिर उसने यह शीतलता पिघलायी क्यों है
सर्वत्र जगत में तू है सम्पूर्ण
फिर मेरी मित्रता की परत हटायी क्यों है


                                                                                        प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                          १२/११/२०१३

Sunday, 10 November 2013

आज का युवा

आज फिर बात होगी
नये -नये वक्ताओं से मुलाकात होगी
सभी कि जहन में सवाल होगा
आज क्या युवा का हाल  होगा
सूखी हुई हड्डियों में जान होगी
अपने पुराने तीरों से बरसात होगी
विवेकानंद जी कि फिर संगोष्ठियाँ होगीं
जिसमें आज के युवा पर सीधी कमान होगी
बम फुटेगें ,धमाके होगें
आज युवा पर सभी के निशाने होगें
क्या किसी ने आज के
युवा को जाना है
अर्थ का युग है
टेट ,नेट ,पीएचडी ,क्या नही किया
आज के युवा ने
फिर भी वह आज बेकार है
क्यूँ क्या किसी ने सोचा है
 सरकार की  रणनीतियों से
समाज कि बेरुखी से
उसे आज हतोत्साहित
किया जाता है
ना करे कोई आज आलोचना
क्योंकि उसी ने
छुआ है आसमान
आज का युवा है
श्रेष्ठ श्रेष्ठ...............................

Saturday, 9 November 2013

माँ


माँ दिव्यता की स्रोत
ममता का भण्डार
अखंड ज्योति -सा
जिसका पावन प्यार
नित्य जिसमें उमड़ता
बच्चों के प्रति दुलार
नतमस्तक हो जाता
जिसके सामने संसार
गंगा -सा पवित्र
जिसका आशीर्वाद
अलौकिक स्नेह निर्झर
जिसमे संसार
फिर आज क्यों हो रहा
उसी का तिरस्कार
पुरुष का स्वरूप
आज होता अत्याचार
बर्बरता कि सीमा
लांघा पुरुष अपार
जिसकी वजह से
है वह पोषित
नित्य करता
उसी को शोषित
मातृ भाव
दिखलाता झूटा
ममता का वह
खून चूसता
लद गये दिन
आज पुरुष के
स्त्री हो गयी
कटी पतंग -सी
नही खिचेगी
तुमसे डोर
भूल जाओ
अत्याचारियों  अब रोड
ममता कि
कसम निभायेंगे
माँ को माँ
हम  बनायेंगे …………।

                                                              प्रदीप कुमार गौतम

                                                                   ०९/११/२०१३

Thursday, 7 November 2013

चाय


आग के ऊपर रख पात्र
नीर आहुति देता है
ऊष्मा कि चाह में
जैसे ही नीर ऊष्मा को
करता है प्राप्त
क्षीर समाहित हो जाता है
उसमे
मिल करते अटखेलियाँ
उचकते फड़फड़ाते दोनों
अपने अस्तित्व के लिए
उनकी समझ से परे
यह  क्या हो रहा है हमारा
बस
वे यह ही चिंतन करते
चिंतन के आगोश में
खोय हुए इधर -उधर ताक रहे थे
तभी अचानक उनके ऊपर
कृष्ण वर्ण छोटे -छोटे डेन
समिश्रित हुए
अब तीनो मिल करने लगे कोलाहल
लेकिन कोई न सुन रहा था
उनका यह कारुणिक रुदन
तभी खांड आकर
उनका हल -चल पूछता है
सांत्वना दिलाता है
उसके एहसास से
उन्हें अपना स्वरूप साकार
समझ आता है
वैश्वानर से विरल
छोटे -छोटे छिद्रों से
पटतरौं कि गहराई से
साँस लेते हैं
साँस लेते ही उनके
तप भाप का स्वरुप लेता है
तब मनुज उस रसताप को
अधरों से मिलाकर
एक चुस्की लेता है
उस चुस्की से वह रस
गले के द्वार को लांघता हुआ
जीभ के ऊपर दौड़ता हुआ
संगीत से भरकर
उमंग से चलकर
गले में स्वताप
छोड़ता हुआ
आँतों को अपना एहसास
दिलाता हुआ
उदर में जाकर
आराम लेता है
उस रसताप के एहसास से
मनुज में जागती  है
चेतना ,स्फूर्ति ,ताजग़ी
आलस्य से विरल कर
उसे पुनः शक्ति से
संचित करता है वह
आज उसका है महत्व अति
हरेक सदन में
होटलों में ,दफ्तरों में
अति धनवान से लेकर
निर्धन के घर भी
है उसका दबदबा
वह करता है नित्य
प्रातः गान।
आखिर है तो वह
आज के मनुज का
प्रिय पेय पदार्थ
वह तीव्र ताप को छोड़ता
लेकिन मनुज
एक चुस्की चाय की
जरुर लेता है।

                                                            प्रदीप कुमार गौतम
                                                            ०७/११ /२०१३

गाँव

गाँव
वह मेरा छोटा -सा गाँव
कितनी रमणीयता को समेटे हुए
सदा मोहकता को लपेटे
स्वविरल चेतनता को भरे
मंद -मंद गति से
प्रमुद हो रहा था।
नीम के वृक्षों की
सरसराहट की आवाज़
छोटी -छोटी पत्तियां
उस पर उनकी कोपलता
थोड़ा कड़वाहट को समेटे
हर रोग को हरती थी
उस पर इमली का बड़ा -सा
विशाल -वृक्ष मंद -मंद हिल
स्वोपरि देवदूतों का झुण्ड
चीखते थे हर रोज़
पास में जाकर स्वमित्रों के साथ
देखते थे हर दिन उन्हें
गालियाँ सदा हमारी
मित्र हुआ करती थी
झुण्ड का झुण्ड दौड़ता था
सदा उस पर
कितनी सजीवता थी
उस समय
संगठित था पूरा समाज
एक -दूसरे के समीप बैठ
हाल  -चाल लिया करते थे
थोड़े कष्ट में भी
सभी सरीक हो जाते थे
हर पर्व में वह
सदा गुंजार करता था
बच्चों कि टोलियाँ
किलकारियाँ मरते हुए
सम्पूर्ण गाँव के भीतर
गलियों में घूमते थे
लेकिन आज मानो
मरघट में तब्दील हो गया है
कितना अजीब -सा लगता है
यहाँ आकर
सर्वत्र खंडहर
जिस पर स्वानों का झुण्ड
पिल्लों का सदन
बस
और कुछ नही बचा
अब सभी नगरीय में ढल रहे हैं
गाँव से विरल हो
शहरी बन रहे हैं।


                                                          प्रदीप कुमार गौतम
                                                            ०८/११/२०१३                                                                        

Friday, 1 November 2013

केश


वे इधर लहरायें ,उधर लहरायें
फिर कपोलों को आकर
कोमलता से भरकर थोड़ा
खटपट तरीके से
मेरा चुम्बन कर जाएँ।
वे नैनों के आगें आकर
फुदक -फुदक नृत्य करें
मैं उन्हें हटाऊँ तो हूँ
वे पीठ में जाकर
मधुर -मधुर गान सुनाएँ
उनकी श्यामलता को देख
स्वतः मेरा उन पर
हाथ फिर जाये। .

Wednesday, 30 October 2013

तिल


मैं निरत देखूँ उसे
लेकिन वह छिपा है
तेरे श्यामल केशों में
उसे देखने के लिए हूँ
आतुर ………
फिर भी कपोलों में
बैठकर खेलता है वह
छुपाछुपी.................
मैं हूँ निरत प्रयास में
उसे देखने के लिए
लेकिन वह फिर भी
कभी छाया में ,बालों में
अधरों के ऊपर छुपा बैठा है
नासिका के नीचे आगोश में
वह छोटा सा तिल।

                                                                                                     प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                                          ३०/१०/२०१३

एक युग का अंत


1986 से हंस पत्रिका का संपादन करने वाले डॉ राजेंद्र यादव जी के अचानक निधन की खबर आते ही साहित्यकारों में शोक की  लहर दौड़ गयी .क्योंकि यादव जी ने अपने विचारों से साहित्य में दलित साहित्य एवं स्त्री विमर्श चिंतन की जो धारा प्रवाहित की वह साहित्य में एक नवीन चिंतन की  शुरूवात थी जो आज का प्रमुख चिंतन है। हंस पत्रिका के माध्यम से इन्होने अनेक कालजयी कवियों ,चिंतकों एवं समीक्षकों को उत्पन्न किया। ऐसे साहित्यकार के गमन से एक युग का अंत हो गया। शोक अभिव्यक्त करते है।

                                                                                                                               प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                                                         राजेंद्र नगर ,उरई ,जालौन

Tuesday, 29 October 2013

बाबा साहेब का बन्दन करें














हे मसीहा !तेरा मैं बन्दन करूँ
तूने इस भू -धरा को
स्वजन्म से पुलकित किया।
अपने स्व अध्यन के कांरवा से
नवीनता को सृजित किया
स्वम ने दुख देखे अनेक
मानव द्वारा अमानवीय व्यवहार को
है आपने घुट घुट पिया।
छुआ -छूत का परिवेश ऐसा
था किसी ना देश में
जिसे उखाड़ फेकने का संकल्प
आपने है स्वजन्म में लिया।
आप जैसा उस समय
दुनिया में न कोई हुआ
शिक्षा कि अलख ऐसी दिखी नही
सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में
मनवाया आपने लोहा
इस अथाह संसार को
देश कि स्वतंत्रता के बाद
था न  कोई विधान देश का
स्वकरों से आपने तब
संविधान को रचाया था
स्वदेश को संविधान से
संविधान का विश्व गुरु बनाया था
लेकिन आज उसी संविधान को
तोड़ने में लगे आज सामंतशाही के जन
स्वदेश की  आहुति देकर
पुनापैक्ट समझौता किया था आपने
लेकिन आज मनुवादी कहते हैं
आरक्षण व्यवस्था बेकार है
क्या करें उन आरक्षण विरोधियों का
जो करते हैं आज हमसे तुलना
आज भी वे हैं हमसे बलिष्ट
धन से ,मान से ,सम्मान से
वे दे न सके आज तक
हमें मान ,सम्मान हैं
फिर भी क्यों करते हैं विरोध
आरक्षण का वे
इसलिए आज हम दृढ संकल्पित हों
आरक्षण बचाओ मुहिम में
पूरी तन्मयता से साथ हों
इसलिए आओ आज
हम सब बाबा साहेब
बंदन करें बंदन करें बंदन करें .................

                                                                                                                   प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                                                       २८/१० /

Monday, 28 October 2013

गेंहू


वह पहले जमीन की
कोख़ पर छिपकर करता  है
अपने को अंकुरित
फिर वह अपनी यौवनता पर
लहलहाता है क्षेत्र पर
फिर मद्धिम गति पाकर
प्रौढ़ता को स्वीकार कर
बलिदान देता है वह अपना
सूखकर हमारे पोषण के लिए
क्षेत्र से आकर माँ के हाथों
धुला जाता है उसे
फिर सदन के आँगन में
फैलकर अंगड़ाई लेता है
फिर सूखकर हमारे पोषण
के लिए बलिदान देता है
चाक के दो पाटों के मध्य में
मिट जाता है अस्तित्व उसका
बदल देता है अपना रंग
तसले के मध्य पुनः आहुति देता है
फिर पीटा जाता है उसे दो करों से
फिर गोलाई में जाकर
बेलन से नया रूप धारण
करता है वह अपना
आग में जाकर स्वयं जलता है
फिर निवाला बनता है
हमारी बुभुक्षा मिटाने के लिए
उसका अस्तित्व है साकार
 वह है अविरल महान
तभी तो वह दुर्दांत दुःख
सहन करके
मिटाता है हमारी
कारुणिक बुभुक्षा को.. …………………।

धम्म-पथ

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