वह भूधरा पर आते ही
लक्ष्मी का आगमन कहलाती है
वह नित्य कोमल हाथों से
परिवार में सादगी लाती है
वह बचपन से ही घर को
सजाती और संवारती है
वह केवल घर ही नहीं
विद्यालय को भी सजाती है
वह भाषणों में भी
नित्य नया सूरज जगाती है
वह पुरुष को भी
अपने स्वरूप से निखारती है
वह बन बहू ससुरालियों के
दिल में अलख जगाती है
वह बन माता ममता से
पुत्रों को दुलारती है
वह बन दादी अपने नातियों को
सदा लोरियाँ सुना हँसाती है
वह अंश है इस संसार का
वह कुञ्ज है ज्ञान भण्डार का
वह पुरूष की सहधर्मिणी है
वह समान है वह अलौकिक है
वह भण्डार है ममत्व का
फिर क्यों आज उसका ह्रास है
वह क्यों विक्षिप्त है समाज से
क्यों उसका आज अपमान है
वह सदियों से हमारी
बेटी ,माता ,बहू दादी
सब कुछ तो है वह
फिर क्यों उसे समानता नहीं
आखिर क्यों ?
प्रदीप कुमार गौतम
२४/११/२०१३
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