डॉ भीमराव अंबेडकर का शैक्षणिक योगदान
प्रदीप कुमार, शोधार्थी,हिंदी विभाग
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी(उ0प्र0)
किसी भी समाज एवं राष्ट्र के
निर्माण के लिए उस देश के नागरिकों का जागरूक होना अत्यावश्यक होता है और जागरूकता
गहन अध्ययनशीलता एवं स्वच्छंद चिंतन से आती है । तब शिक्षा के स्वरूप को हम समझने
का प्रयास करें, तो हमें डॉ भीमराव अंबेडकर के शिक्षा दर्शन को समझना होगा,
जिन्होंने राष्ट्र को गर्त में जाने बचाया ही नही है बल्कि विश्वविभूतियों में
गिने जाने योग्य तथागत बुद्ध के धम्म को नई ऊर्जा एवं चेतना से पुनः रोपने का काम
किया जिसका परिणाम यह हुआ कि विश्व के श्रेष्ठ विभूतियों में तथागत बुद्ध का प्रथम स्थान रहा एवं डॉ भीमराव अंबेडकर का नाम छठवें नंबर पर अंकित
हुआ जिसकी वजह से केवल विश्व में भारत देश
की विद्वता ही नही बल्कि धम्म की भी स्वीकार्यता है । डॉ भीमराव अंबेडकर जी के
अध्ययन क्षेत्र को यदि हम देखें तो ऐसा कोई ही क्षेत्र होगा जिसमें बाबा साहेब ने
काम न किया हो । सम्पूर्ण वांग्मय का अध्ययन करते समय यह निश्चित हुआ कि बाबा
साहेब के बहुत से विचारों को मनुवादियों एवं बहुजन साहित्यकारों द्वारा भी
नजरअंदाज किया गया है, केवल उन्हीं वक्तव्यों को बताया गया, जो आमजन मानस को
रुचिकर लगें, जबकि डॉ अम्बेडकर को समझने के लिए उनके तीन प्रमुख सिद्धांतों
शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो में प्रथम सिद्धांत शिक्षित बनो को समझना
होगा और इसी क्रम आगे बाबा साहेब के शिक्षा दर्शन को समझने का प्रयास करेंगे .
वर्तमान समय में सभी राजनैतिक दल बाबा साहेब के राग अलापने में लगे हुए है, लेकिन
उनके विचारों से कहीं साम्यता नजर नही आती है . देश की स्वतंत्रता के पश्चात जिस
तरीके से पूंजीवाद के प्रभाव में भारत देश आया है, तबसे यहाँ गरीब ग़रीबी में दफ़न
हो रहा है और अमीर निरंतर अमीर होता जा रहा है और इसमें मुख्य रूप से जातिगत
भेदभाव से पीड़ित हाशिए में डाल दिए गए समाज को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है
. जिसका प्रभाव यह हुआ कि आज प्रत्येक क्षेत्र में निजीकरण किया जा रहा है . यहाँ
तक कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी निजीकरण की भट्टी में
झोंक दिया गया है , जबकि अन्य विकसित देशों में नजर डाले तो शिक्षा और स्वास्थ्य
का राष्ट्रीयकरण किया गया है, जिससे कि पढ़ाई लिखाई और स्वास्थ्य की देखभाल में आम
नागरिक को कोई मुसीबत न उठानी पड़े . वर्तमान भारत में सर्वाधिक निजीकरण शिक्षा का
हुआ है जिससे हालात यह है कि गरीब तो छोड़िए, जो साधारण नौकरी वाला व्यक्ति है वह
अपने बच्चों को मनमाफ़िक शिक्षा मुहैया नही करा पा रहा है . यदि तजा उदहारण देखें
तो उत्तराखंड सरकार ने निजी विश्वविद्यालयों को स्वयं की फ़ीस बढ़ाने की स्वीकृति
प्रदान कर दी, तो MBBS की फ़ीस पांच- सात लाख से बढाकर बीस से तीस लाख के बीच में
कर डी गयी, जो सामान्य नागरिक तो छोडिए मध्यम वर्गीय परिवार भी नहीं दे सकते हैं .
फ़ीस में भारी बढ़ोत्तरी देखकर छात्र सामूहिक धरने में बैठकर इच्छा म्रत्यु की मांग
करने लगे तब सरकार का झक्का खुला और अपने फैसले को वापिस लिया . बाबा साहेब
अम्बेडकर भविष्य के इसी द्रश्य को लेकर बहुत अधिक चिंतित थे . इस संदर्भ में गंभीर
चिंतन व्यक्त करते हुए बम्बई विधानसभा
मंडल में अपनी बात को रखते हुए कहा था कि -"छानबीन करने से मुझे यह पता लगा
है कि आर्ट्स कालिजों पर जो खर्च होता है, उसका 36 प्रतिशत भाग फीस से मिलता है हाईस्कूलों पर जो खर्च होता
है उसका 31 प्रतिशत भाग फीस से आता है । महोदय ! मेरा निवेदन है कि यह
शिक्षा का व्यवसायीकरण है । शिक्षा तो एक ऐसी चीज है,
जोकि सबको मिलना चाहिए ।शिक्षा विभाग ऐसा नही है जो इस आधार
पर चलाया जाए कि जितना वह खर्च करता है, उतना विद्यार्थियों से वसूल किया जाए शिक्षा को सभी सम्भव उपायों से व्यापक रूप में
सस्ता बनाया जाना चाहिए ।"1
देश की आजादी के बाद दलित,पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक समाज के युवा शिक्षा ग्रहण करते हुए प्रत्येक
क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं , तब ऐसी स्थिति में
सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि देश का कोई भी युवा अर्थ के अभाव में अपनी
शिक्षा न छोड़ पाए क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार देश के प्रत्येक नागरिक का यह
अधिकार है कि वह अपने देश में बेहतर से बेहतर शिक्षा ग्रहण करे. इस विषय मे बाबा
साहेब कहते हैं -" अब हम उस स्थिति पर आ गए हैं,
जब समाज के निचले तबके के लोगों के बच्चे हाईस्कूल,
मिडिल स्कूल और कालिजों में जा रहे हैं । इसलिए इस विभाग की
नीति यह होनी चाहिए कि निचले वर्गों के लिए उच्च शिक्षा को जितना संभव हो सस्ता
बनाया जाए ।"2
वर्तमान समय मे दलित समाज को जोड़ने के लिए सभी राजनैतिक दल लगे हुए हैं,
किन्तु वस्तुस्थिति में उतरकर कोई भी उनकी समस्याओं का
स्थायी समाधान नही खोज रहा है यदि देखा जाए तो आधुनिक भारत मे दलित राजनैतिक
प्राणी हो गया है, जो चुनाव के समय पर सबको भाता है और चुनाव जीत जाने के सब दूर
हो जाते हैं, उसी का परिणाम है कि 90 प्रतिशत दलित आज भी अभाव की जिंदगी जी रहे है जिनके पास न तो बेहतर शिक्षा,स्वास्थ्य है और न ही कोई रोजगार है . वे आज भी लाचार होकर
मेहनत मजदूरी करते हुए जीवन यापन कर रहे है उनमें से कुछ लोगों को संवैधानिक
अधिकार प्राप्त हो जाने के पश्चात थोड़ा स्थिति में सुधार हुआ भी है, तो उन्हें
पुनः उसी स्थिति में पहुंचाने के लिए जो संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए है उन पर
लगातार कुठाराघात किया जा रहा है । वर्तमान NDA सरकार के कुछ मंत्री लगातार संविधान की समीक्षा की बात
उठाते हैं, तो आरएसएस के प्रचारक आरक्षण को समाप्त करके पुनः मनुस्मृति लागू करने की बात
करते हैं . जबकि विभिन्न शासन कर्ताओं ने सुनियोजित तरीके से उच्च शिक्षा से लेकर
विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण लागू कर दिया है, जिसकी वजह से आरक्षण मात्र दिखावा रह गया है . उसे
अंदर ही अंदर इतना कमजोर कर दिया गया है कि उसके रहने या रहने से बहुत अंतर नही
पड़ने वाला है । आरक्षण वैसे प्रतिनिधित्व का अधिकार है . जो प्रत्येक नागरिक को
समान रूप से प्राप्त होना ही चाहिए । 05 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)
, नई दिल्ली द्वारा एक आदेश दिया गया है जिसमें आरक्षण के
नए रोस्टर विश्वविद्यालय को इकाई न मानकर विभाग को इकाई माना गया है,
जिसकी वजह से आरक्षण होने के बाद भी दलित,
पिछड़े, आदिवासी समाज के युवकों को उसका लाभ प्राप्त नही होने वाला
है . बाबा साहेब डॉ आंबेडकर दलितों पिछड़ों के कोई हक और अधिकार न छीन पाए इसके
लिए सरकार को निगरानी करने के लिए कहते है इसके उलट वर्तमान NDA
सरकार धीरे-धीरे जानबूझ कर दलित पिछड़ों को हाशिए पर डाल
रही है और प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित करती जा रही है । बाबा साहेब कहते
हैं-"वर्तमान शासन के अंतर्गत दलित वर्ग अपने को अत्यंत दयनीय स्थिति में
महसूस करते हैं । वे ऐसे लोगों से घिरे हुए हैं, जो उनकी महत्वाकांक्षाएं या उनकी विकास और प्रगति की
इच्छाओं में किसी तरह भागीदार नही बन सकते हैं । इसलिए मेरा कहना है कि इस बात की
और भी अधिक आवश्यकता है कि सरकार किसी निरीक्षक एजेंसी को अपने सीधे नियंत्रण में
नियुक्त करे, जो यह देखे कि वे निकाय जिनको शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण काम सौंपा गया है,
दलितों की उपेक्षा न करें ।"3
वर्तमान समय में प्रत्येक शहर,
कस्बे में बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के किए गए संघर्ष की वजह
से बेहतर हॉस्टलों की व्यवस्था हो गई है जिसकी वजह से गाँव,गली, देहातों के नव युवाओं को बहुत बड़ी राहत प्राप्त हुई है,
क्योंकि शहर में यदि किसी को रहने का आशियाना प्राप्त हो जाये तो इससे बेहतर क्या
होगा ?
कस्बों एवं नगरों में स्थापित हॉस्टल अनुसूचित जाति,
पिछड़े एवं आदिवासी अभ्यर्थियों के लिए वरदान साबित हुए हैं
लेकिन जब कभी भी इन वर्गों की अहितकारी सरकारें बनती है, तब-तब इन अभ्यर्थियों को
बहुत संघर्ष करना पड़ता है उनकी सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में बाधा पहुंचाई जाती है तो प्राप्त
होने वाली सुविधाओं में एकाएक भारी कटौती कर दी जाती है । वर्तमान समय मे यदि आप
सरकारी हॉस्टलों के आसपास का वातावरण देखेंगे, तो पाएंगे कि ऐसे लोगों का जमावड़ा
है . जो जुए, शराब इत्यादि की लत में तल्लीन रहते है . यह सब जानबूझकर किया गया है और
प्रशासन ऐसे लोगों को वहाँ से हटाता भी नही है ।
डॉ भीमराव अम्बेडकर जी पिछड़े बच्चों हेतु छात्रावास की सुविधा मुहैया
कराने हेतु जोर देते हुए कहते हैं - " मैं माननीय मंत्री को सुझाव देना चाहता
हूँ कि क्या यह बेहतर नही होगा कि वह इस धन का उपयोग छात्रावासों की अभिवृद्धि के
लिए करें,
जिसे या तो सरकार खुद बनाए-चलाए या यह काम पिछड़ी जातियों
की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली निजी संस्था करे । महोदय ! इससे दोहरी बचत होगी ।
सबसे पहली बात तो यह कि छात्रावास लड़कों को गंदे माहौल से दूर रखता है । उसे
प्रभावी निरीक्षण उपलब्ध होता है और जब छात्रावास की व्यवस्था निजी संस्था द्वारा
की जाएगी,
तो सरकारी धन की कुछ बचत होगी ।"4
अनुसंधान उच्च शिक्षा में
विश्वविद्यालय, महाविद्यालय का जीव होता है इसके अभाव में विश्वविद्यालय का कोई महत्व नही रह
जाता है वह मात्र परीक्षा करने-कराने का माध्यम मात्र रह जाता है . अनुसंधान के
अभाव में विश्वविद्यालय थोथा कल्पना मात्र है, क्योंकि शोध के मार्ग उच्च शिक्षण
संस्थाओं से ही खुलते है जो राष्ट्र को एक सुनहरा भविष्य दिखाने के लिए सामाजिकी,
मानविकी में बेहतर शोध को प्रकट करते है । उच्च शिक्षा में
अनुसंधान की आवश्यकता को महसूस करते हुए बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर कहते हैं -"
किसी भी विश्वविद्यालय को अनुसंधान कार्यों या उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देने में
सफलता नही मिल सकेगी, अगर वह परीक्षा प्रणाली को ही अपने अस्तित्व का एकमात्र
ध्येय मान लेता है । 1902 ई0 में गठित विश्वविद्यालय आयोग ने स्वीकार किया था और उसकी
रिपोर्ट के बाद प्रस्तुत किए गए विधेयक में इस तथ्य को स्वीकार किया गया था कि जिस
विधान से यह विश्वविद्यालय बना, उसे इस तरह बदलना चाहिए, जिससे विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की परीक्षाएं तो लेता
रहे,
परंतु इसके साथ ही वह पढ़ाने का भी काम कर सके ।"5
उच्च शिक्षा के वर्तमान हालातों का
यदि हम विश्लेषण करें तो बाबा साहेब विचारों से बिल्कुल उलट स्थिति प्राप्त होती
है, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण को पूरी तरह से बंद करने की बात कही
थी क्योंकि निजीकरण से देश समाज के हाशिए में पड़े व्यक्ति का ही नुकसान होता है
वर्तमान समय मे देश के अंदर 70-80 प्रतिशत संस्थाएं निजीकरण के हवाले है . जिससे उच्च शिक्षा
की हालात बहुत बिगड़ चुके है, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से 20 मार्च 2018 को
घोषणा कि गई जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा 05 केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
21राज्य विश्वविद्यालय, 24 डीम्ड विश्वविद्यालय और दो निजी विश्वविद्यालयों को
स्वायत्तता प्रदान की गई है, जिसकी वजह से सामाजिक न्याय की अवधारणा प्रतिबंधित
होकर अन्याय अत्याचार एवं धन उगाही के स्थल बन जायेंगे एवं दलित आदिवासी पिछड़ा
अल्पसंख्यक एवं गरीब तबके के लोगों को हाशिए में डाल दिए जायेगा . जहाँ डिग्री तो प्राप्त हो रही है, किंतु ज्ञानविहीन
युवाओं की भीड़ पैदा की जा रही है और इन विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में
शिक्षक की हालत क्लर्क से भी बदतर कर दी गई है यहाँ अनुसंधान तो बहुत दूर बल्कि
कक्षा शिक्षण भी मुहैया नही हो रहा है जबकि बाबा साहेब अंबेडकर शिक्षक के संदर्भ
में कहते हैं- " जिस प्रोफेसर को गुलाम जैसा काम करना पड़ता है,
वह कभी भी सच्चे अर्थों में अध्यापक नही बन सकता है । वह एक
साधारण कर्मचारी ही बन सकता है और तैयार कुंजी की मदद से ही अपना काम करेगा । हम
उससे मौलिकता की कोई उम्मीद नही रख सकते और वह उन विद्यार्थियों को जिनको
दुर्भाग्यवश उससे पढ़ना पड़ रहा है, कोई प्रेरणा नही दे सकता है । सारा शिक्षण मात्र एक
यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है ।"6
बाबा साहेब अंबेडकर के मात्र
विचार ही प्रेरणा के स्त्रोत नही है बल्कि उनका समग्र जीवन से ही हम प्रेरणा
प्राप्त कर सकते हैं । वर्तमान समय में युवा पढ़ने से अधिक भोग की वस्तुओं को पहले
जुटाने का प्रयास करता है जिससे निश्चित ही पढ़ाई में बाधा उत्पन्न होती है और कुछ
युवा तो लगातार कोई न कोई वस्तु न होने का बहाना बनाकर शिक्षा से दूर भागते नज़र
आते है, तो ग़रीब परिवार के बच्चों के लिए बाबा साहेब सर्वाधिक प्रेरणादायी है,
क्योंकि बाबा साहेब ने बहुत ही कष्ट के साथ पढ़ाई की धनाभाव बहुत रहा लेकिन
उन्होंने पढ़ाई बन्द नही कि बल्कि दुगनी ऊर्जा के साथ अध्ययन किया और निरंतर सफलता
की ओर अग्रसर हुए मेरा मानना है कि यदि कोई युवा सच्चा अम्बेडकरवादी तभी हो सकता
है जब वह धन अभाव की परवाह किए बिना निरंतर संघर्ष के साथ उनके प्रथम सूक्त 'शिक्षित बनो' को पूर्ण करे । कोलंबिया विश्वविद्यालय में में बाबा साहेब
प्रतिदिन 16 से 18 घंटे तक गहन अध्ययन करते थे और पुस्तकों से उन्हें बेहद लगाव
था, जिसकी वजह से उन्होंने एक पुस्तक खरीद ली और उसकी वजह से उन्होंने दो दिनों तक
भोजन नही किया था .इस सन्दर्भ में आनन्द श्रीकृष्ण लिखते हैं –“एक दिन होटल में वह
खाना खाने पहुँच गए . खाना खाने के लिए जब उन्होंने हाथ बढाया तब उन्हें ध्यान आया
कि खाने के पैसों से तो वे किताब खरीद लाए हैं . वे बगैर खाना खाए कमरे लौट आये और
दो दिनों तक भूखे रहे क्योंकि उन्होंने जो किताब खरीद ली थी उसकी कीमत उनके दो
दिनों के खाने के बराबर थी. उनका महीने के खर्च का बजट न बिगड़ने पाए इसलिए वे दो
दिन तक भूखे रहकर ही पढाई करते रहे .”7
बाबा साहेब अम्बेडकर शिक्षा के
माध्यम से ही सभी मार्ग प्रशस्त करते है उनका स्पष्ट मत था कि शिक्षा के बिना
सामाजिक उत्थान संभव नही है और सामाजिक उत्थान के अभाव में संस्कृतिक परिवर्तन
नहीं किया जा सकता है एवं संस्कृतिक परिवर्तन किए बिना अछूत कभी हिंदू धर्म में स्वाभिमान
और सम्मान प्राप्त करने योग्य नहीं हो सकता है . भले ही दलित विद्यावाचस्पति की
उपाधि हासिल कर ले, लेकिन वह हिंदू धर्म के
निरा पोंगा ब्राहमण से निम्न ही रहेगा . इन सबके बाद भी भारतीय संविधान की
द्रष्टि में मानव-मानव एक समान की अवधारणा में सभी मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ से
श्रेष्ठतर स्तर पर शिक्षा के माध्यम से ले जा सकते हैं . बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर
स्पष्ट लिखते हैं-“शिक्षा और समाज का अटूट रिश्ता है, क्योंकि शिक्षा ही समाज के
सांस्कृतिक उन्नयन का आधार है वे कहते हैं कि समाज अपना स्तर ऊँचा उठाने के लिए सामूहिक
पद्धति से जो प्रयास करता है, वह शिक्षा है. समता मूलक समाज निर्माण के लिए सबको
शिक्षा मिलनी जरुरी है .”8
बाबा साहेब अम्बेडकर शिक्षा को मुख्य मानते है इसीलिए उन्होंने पहला सूत्र ही
शिक्षित बनो से दिया है .
सन्दर्भ-
1.बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर, सम्पूर्ण वांग्मय, खंड-03, प्रकाशक- डॉ अम्बेडकर
प्रतिष्ठान, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, सातवाँ
संस्करण, 2013 अक्टूबर, पृष्ठ-57
2.वही, पृष्ठ-57
3. वही, पृष्ठ-60
4. वही, पृष्ठ-61
5. वही, पृष्ठ-63
6. वही, पृष्ठ-64
7.दलित दस्तक, संपादक-अशोकदास, प्रकाशकीय कार्यालय-पांडव नगर नई दिल्ली मासिक,अप्रैल
2016, पृष्ठ-17
8. वही, पृष्ठ-42
प्रकाशित- हाशिये की आवाज, अप्रैल, २०२१