Sunday, 26 March 2017

मैं नास्तिक क्यों हूँ -भगत सिंह

भगतसिंह 


भगतसिंह
मैं नास्तिक क्यों हूँ (अंग्रेज़ी: Why I am an Atheist) भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह द्वारा लिखा गया एक लेख है, जो उन्होंने लाहौर की केंद्रीय जेल में अपने बंदी जीवन के समय लिखा था। यह लेख 27 सितम्बर, सन 1931 को लाहौर के समाचार पत्र 'द पीपल' में प्रकाशित हुआ था। इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ-साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है। यह भगतसिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में से एक रहा है।

बाबा रणधीर सिंह और भगतसिंह का वार्तालाप
भगतसिंह स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह (1930-31) के बीच लाहौर की केंद्रीय जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे, जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगतसिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज़ होकर कहा- "प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो, जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है।" इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने निम्न लेख लिखा-

लेख

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त - शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ - मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?

मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ - यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनों ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।

Thursday, 23 March 2017

बहुजन आंदोलन की धुरी सामाजिक आंदोलन

                   प्रदीप कुमार गौतम, शोधार्थी
                 बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
                  मोबाइल-8115393117

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आने पर बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व  पर प्रश्न खड़े हो गए हैं, विभिन्न प्रकार की आलोचनाएं संपूर्ण देश में हो रही हैं तो विदेशों में रहने वाले बहुजन समाज के लोगों में भी निराशा घर कर गयी है । लेकिन यहाँ एक चीज समझना जरूरी है कि राजनैतिक सत्ता को प्राप्त करना तथा सामाजिक आंदोलन को अनवरत बरक़रार रखना अलग-अलग पहलू हैं । बहुजन आंदोलन आज से नही बल्कि हजारों वर्षों से निरंतर गतिशील है जिसे मनुवादी ताकतों ने समय-समय पर खंडित करने का प्रयास किया है और कभी तो जमीन में दफनाने का काम किया, लेकिन उसे कभी खत्म नही कर पाए ।
इस देश में दो विरोधी विचारधाराओं का आपसी टकराव प्राचीन काल से चला आ रहा है । बुद्ध जी के उदय से पूर्व बहुजन समाज को राक्षस, दैत्य, दानव,असुर, शुद्र इत्यादि नामों से पुकारा जाता था, लेकिन बुद्ध जी के उदय के पश्चात् श्रवण कहलाने लगे । गौतम बुद्ध के समय पर  मनुवादी ताकतें बेहद कमजोर पड़ गयी थी और वैज्ञानिक पद्धति का युग शुरू हो गया था । लेकिन बुद्ध जी के 400-500 वर्ष पश्चात् मनुवादी ताकतें आई और भारतीय संस्कृति को नष्ट किया लेकिन सम्राट अशोक जी ने बुद्ध धम्म का प्रचार किया और वह सम्पूर्ण काल ही बौध्द काल जाना जाता है । चूँकि बहुजन समाज की एक कमजोरी शुरू से रही है कि जैसे ही सत्ता पर काबिज हुए तो सामाजिक आंदोलन की गति को कमजोर कर दिया और मनुवादियों को अपने साथ मिला लिया और उन्ही मनुवादियों ने दीमक का काम करते हुए सामाजिक आंदोलन को खोखला कर दिया । सम्राट अशोक की तीसरी पीढ़ी शासक वृहद्रथ ने सामाजिक आंदोलन के काम में रूचि नही दिखाई बल्कि पुरखो के नाम की सत्ता का उपभोग वे लगातार करते रहे और जिन्होंने समझाने का प्रयास किया उसे सत्ता से बेदखल कर दिया, इसी आलस्य के भाव को समझकर उस समय पुष्पमित्र शुंग नामक मनुवादी सैनिक सत्ता के शीर्ष पद सेनापति बन जाता है और मौका पाते ही वृहद्रथ की हत्या कर देता है तथा बौद्ध भिखुओं के सिर कलम किए जाने लगते हैं और बहुजन आंदोलन की धुरी को कुचलकर मनुवादी शासन स्थापित हो जाता है । समय के साथ जुल्म-ज्यात्ती के नए-नए कानून स्थापित कर दिए जाते हैं । लेकिन बहुजन आंदोलन की गति तो धीमी पड़ती है, लेकिन बहुजनों के हृदय में  वह चिंगारी सदा जलती रहती है ।
मध्यकाल में आकर कबीरदास, रविदास, दादूदयाल, इत्यादि की वाणियों में स्पष्ट रूप से झलकता है और कबीरदास तो समाज सुधार का आंदोलन ही चलाते हैं । मुगलकाल गुजर जाता है लेकिन बहुजन आंदोलन निरन्तर गति पकडे रहता है । ब्रिटिश ईष्ट इंडिया कम्पनी पैर जमाती है जिसमें शिक्षा का समान अधिकार मिलता है जिसमें ज्योतिबराव फुले, पेरियार, नारायनगुरु, इत्यादि की चेतना जागृत होती है राजनैतिक चेतना से हीन होने पर भी बहुजन आंदोलन को पुनर्स्थापित करते हैं और मनुवादी ताकतों का खुला मुकाबला करते हैं ऐसे समय पर दो राजा छत्रपति शाहूजी महाराज एवं राजा गायकवाड़ भी बहुजन आंदोलन में मशाल देने का काम करते हैं और बुद्ध के शासन काल को पुनर्स्थापित करने के लिए बाबा साहेब का उद्भव होता है और वे जीवन पर्यंत बहुजन समाज के हक़ अधिकार के लिए संघर्ष करते है और सामाजिक आंदोलन को गति प्रदान करते हैं । संविधान के माध्यम से सभी के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं ।
          इसके बाद धीरे धीरे बहुजन समाज में जागरूकता आने लगती है लेकिन सत्ता विहीन होने की वजह से आंदोलन की गति धीमी बनी रहती है और ऐसे समय पर बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी अपना घरवार, नौकरी छोड़कर बहुजनों को राजनैतिक चेतना से पूर्ण करने के लिए मनुवादियों के मुकाबले में खड़े होते हैं ऐसा नही है कि इनसे से आंदोलन नही हुए । आंदोलन हुए लेकिन उनका स्वरूप छोटा होने की वजह से वे चर्चा में नही आये, लेकिन मान्यवर साहेब ने देशव्यापी आंदोलन के माध्यम से सभी सामाजिक सङ्गठनो को अपने में समेट लिया और सामाजिक आंदोलन के माध्यम से अपनी राजनैतिक फसल तैयार कर दी और बहुजन आंदोलन में राष्ट्रीय नेतृत्व कर्ता के रूप में DS4, बामसेफ, बहुजन समाज पार्टी देश के सामने आई ।
   राजनैतिक सत्ता हासिल होने पर बहुजन समाज में थोड़ा ताजगी, सादगी आई और उसकी मेहनत से बसपा चार बार उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई । मनुवादियों की निगाहों में यह भी खटकने लगा और सेंधमारी करते हुए देश के अंदर 7 अलग अलग बामसेफ तैयार हो गयी जिनका एक मात्र उद्देश्य बसपा को कमजोर करना रह गया । राजनैतिक सत्ता का रस चखने के बाद बहुजन समाज में कई  मुखौटाधारी कांशीराम के रूप में आये लेकिन न ही उन्होंने घर छोड़ा, न ही नौकरी छोड़ी और न ही सुंदरी । लेकिन बसपा पर हमले चालू हो गए ।
   हम सत्ता पर तो कम ही रहे हैं, लेकिन आंदोलन सतत चलते रहे हैं । इसलिए नेतृत्व जो कर रहा है उसको टोको कोई दिक्कत नही लेकिन सामाजिक आंदोलन को भी लगातार गति प्रदान करते रहो क्योंकि यह एक दो वर्षों का नही बल्कि हजारों वर्षों का संघर्ष है जो लगातार चलता रहेगा । इसलिए राजनैतिक हार से विचलित हुए बिना सामाजिक आंदोलन को गति प्रदान किए रहो और जीवन में उद्भव पराभव सदा होता है और कोई नेतृत्व सदा नही रहता है बल्कि आपको स्वयं आगे आकर नेतृत्व करना होता है ।
जय भीम नमो बुद्धाय
जय कांशीराम

Friday, 17 March 2017

बहुजन समाज पार्टी के पतन का एक कारण

                     प्रदीप कुमार,शोधार्थी
                    बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

जिस कौम को मुफ़्त मे खाने की आदत पडी हो, वो कौम क्रांति नही कर सकती, जो क्रांति नही करेगे, वो कभी शासक नही बन सकते, और जो कौम शासक नही होती । उसकी बहन ,बेटी सुरक्षित नही होती. - मान्यवर कांशीराम
मान्यवर कांशीराम साहेब का यह कथन दूर दृष्टि का परिचायक है । मान्यवर कांशीराम जी राजनैतिक सत्ता के साथ जन आंदोलन में विश्वास रखते थे, कार्यकर्ताओं से मिलते थे और मनुवादी ताकतों का जमकर मुकाबला करते थे तथा समाज के दबे कुचले तबके को मेहनत के लिए प्रेरित करते थे , जबकि दलित, पिछड़े समाज के लोगो ने कभी भी मुफ्त की रोटी नही खाई उन्होंने सदा मेहनत को ही अपनी जिंदगी का हिस्सा माना है या यों कहें कि मेहनत के बल पर ही दो जून की रोटी उपलब्ध होती थी । मान्यवर साहेब के रहते हुए बसपा सरकार ने गाँव के पट्टों में मजलूम लोगों को कब्ज़ा दिलवाया 15/85 के नारे पर चलते हुए सवर्ण के अत्याचारों से बहुजन समाज को मुक्ति दिलाई । जितने भी सामाजिक संगठनों द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ मान्यवर साहेब सभी कार्यक्रमों में सरीक हुए तथा सामाजिक संगठनों को खड़ा करने के लिए लोगों को प्रेरित किया । किन्तु उनके परिनिर्वाण के तत्पश्चात ही 2007 के विधानसभा आमचुनाव में बहुजन समाज पार्टी का नारा बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय कर दिया गया  । 15% समाज को 35 से 50% तक टिकट वितरण किये गए । निवर्तमान मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के पार्टी कार्यकर्ताओं के अत्यचार से जनता त्रस्त हो गयी तथा बसपा को 2007 में भारी बहुमत से जिताया । बसपा के सत्ता में आने के बाद बहुजन समाज के सामाजिक संगठनों को ही निशाना बनाया गया । सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम बन्द कर दिए गए और पूर्व के शासन काल में जो जनता दरबार लगता था, 2007 में पूरी तरह बंद कर दिया गया और बसपा के बैनर तले  धरने प्रदर्शन बन्द हो गए ।
   मान्यवर साहेब बहुजन समाज को न बिकने वाला समाज बनाने की बात कह रहे थे । लेकिन बसपा का अ ब स न जानने वाला मोटी थैली देकर बसपा के विधायक, सांसद बनने लगे। जिसके चलते बसपा के कार्यकर्ताओं की अवहेलना होने लगी । तानाशाही का राज स्थापित हो गया । पुष्पमित्र शुंग  के इशारे पर वृहद्रथ रूपी बहिन जी अपने ही समाज से काटती चली गयी । यदि किसी भी सामाजिक संगठन ने सामाजिक जागरूकता का काम किया । तो बसपा के मठाधीशों द्वारा उन्हें बसपा विरोधी घोषित किया जाने लगा और बढ़ते संगठनों को जमीजोद करने पर उतारू हो गए ।
  जो मान्यवर साहेब सामाजिक संगठनों को सर्वाधिक महत्व देते थे , उन्ही के पैरोकार सामाजिक संगठनों को दफ़नाने को आतुर हो गए । तब मान्यवर साहेब की सामाजिक मूवमेंट का काम बसपा सुप्रीमों जी ने बन्द कर दिया और हाथी नही गणेश के नारे का हश्र 2012,2014,2017 में आपके समक्ष है ।

Thursday, 16 March 2017

वर्तमान शिक्षा में नकल

                               प्रदीप कुमार गौतम
                              शोधार्थी, गाँधी महाविद्यालय,उरई
                              जनपद-जालौन(उ0प्र0)
                               मोबाइल-81153931157
आज से हाईस्कूल इण्टर और उच्च शिक्षा में बी0ए0, बीएस0 सी, की बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो गयी हैं । लेकिन बोर्ड शब्द नाम मात्र के लिए है, क्योंकि 2002 में मुलायम सिंह यादव जी के शासन सत्ता में आने के बाद उन्होंने सबसे पहले नकल अध्यादेश वापिस ले लिया था और प्रदेश भर के  सेंटरों को स्थाई कर दिया गया था । जिससे बोर्ड जैसी परीक्षा मूक बधिर हो गयी और नकल का अंबार छाने लगा तथा निजीकरण के चलते स्कूलों की बाढ़ सी आ गयी । खुद को बेहतर साबित करने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों के प्रबंधकों ने  सिद्धांतो को ताक पर रखकर नक़ल कार्रवाई और नकल का प्रभाव ऐसा बढ़ा कि नकल करवाने , छात्रों को पास करवाने के ठेके उठने लगे और शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे नीचे खिसकने लगा । आज निजीकरण ने शासकीय, अशासकीय विद्यालयों, महाविद्यालयों में ताला डालने की कगार पर खड़ा कर दिया है क्योंकि इन कॉलेजों में नकल सामग्री की उचित व्यवस्था मुहैया नही कराई जाती है । ऐसे में छात्र व अभिभावक सर्वाधिक अंक पाने की चाहे में निजी कॉलेजों में प्रवेश लेते हैं । जहाँ उन्हें बिना कुछ पढ़े ही बेहतर अंक प्राप्त होते है । ऐसा नही है कि नकल के बारे में सरकार, राज्यपाल, कुलपति को ज्ञात न हो उन्हें इनके बारे में भलीभांति सब कुछ ज्ञात है । लेकिन वे भी धनार्जन करने में संलग्न समझ में आते हैं  । समाज का पैरोकार मानने वाले लोग सर्वाधिक इस व्यवस्था के भागीदार हैं । ऐसे महाविद्यालयों के प्रबंधकों को मंचो से बड़े आदर्श के उपदेश देते सुना है लेकिन हकीकत में वे एक युवा पीढ़ी को गर्त में डालने का काम कर रहे हैं जिसमें शासन प्रशासन मुख्य रूप से दोषी हैं ।
   आज नकल के चलते प्रत्येक छात्र के 70-80 % से नंबर कम नही आ रहे है, इसमें वो लोग हताश है, जिन्होंने नकल से नही बल्कि अक्ल से पढाई करके परीक्षा पास की है, क्योंकि पुलिस से लेकर btc तक सभी वैकेंसी अंको को आधार बनाकर भरी जा रही है । जिससे कम अंक प्राप्त करने वाले युवाओं के हृदय में हताशा घर कर लेती है । आज के युवा को यह ज्ञात ही नही हो पाता है कि जिस नकल से आज हम उपाधियाँ हासिल कर रहे हैं, कल यही उपाधियाँ हमारी अयोग्यता को दर्शाकर सभी के मध्य हंसी का पात्र बना देगी या अयोग्यता के रहते भी यदि कहीं जुगाड़ से  नौकरी हासिल कर भी ली तो कई लोगों के भविष्य को बर्बाद करने में सबसे बड़ा दोषी भी साबित होगा ।
एन केन प्रकारेण नकल आज का सबसे बड़ा सच है जिसकी जड़े बहुत गहरी हो चुकी है और युवाओं का भविष्य अंधकारमय है । केवल शासन ही इसमें कुछ बड़ा परिवर्तन कर सकता है । अभिभावकों से लेकर छात्रों , प्रबंधको से लेकर अध्यापकों , कुलाधिपति से लेकर कुलपति , प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को इस विषय में चिंतन करने की जरुरत है क्योंकि एक सुनहरे भविष्य के निर्माण के लिए नक़ल जैसी बुराई को समाप्त करना होगा ।

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...