Thursday, 26 April 2018

आदिवासी रानी गैदीनल्यू का राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

इस देश के इतिहासकारों ने हमेशा से आदिवासियों, दलितों ,पिछड़ों को ठगा है । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे अधिक शुक्रगुजार होना है, तो अंग्रेजों का होइए क्योंकि उन्होंने जाति, नस्ल, क्षेत्र को देखकर दस्तावेजीकरण नही किया, बल्कि कानून को कानून के हिसाब से लागू किया, जिसकी वजह से आज जब उन दस्तावेजों को खंगालते है, तो जिनके योगदान के लिए बड़े बड़े ग्रंथ लिख दिए गए । वे झूठे और थोथे समझ मे आते है, यदि बात हम स्त्री चेतना तथा स्वतंत्रता आंदोलन में भागेदारी की करें, तो पुरुषों से अधिक आदिवासी, दलित, पिछड़ें वर्ग की महिलाओं ने लड़ी है और केवल लड़ाई ही नही लड़ी बल्कि अंग्रेजों की यातना सहते हुए 05, 10, 15 वर्ष तक जेलों में व्यतीत किए हैं, लेकिन इस देश इतिहासकारों ने किस दोगली मानसिकता के तहत उनको अनदेखा किया है यह समझा जा सकता है इसके साथ वर्तमान समय में ऐसे शोधकर्ताओं की भारी आवश्यकता आ पड़ी है, जो ऐतिहासिक तथ्यों को एकजुट करके विभिन्न भाषाओं में अनुवादित करके अपने पुरुखों के किए वास्तविक संघर्ष को सबके समक्ष प्रस्तुत करे । इस देश को देश बनाने में सर्वाधिक योगदान आदिवासियों का है, जिन्होंने जल, जंगल, जमीन की महत्ता को समझकर निरंतर संघर्ष किया है तथा अंग्रेजों द्वारा जारी किए गए उपनिवेशवाद का उन्होंने जमकर सामना किया जिसकी वजह से अंग्रेजों के समय उनके जंगल काफी सुरक्षित बने रहे किंतु देश की स्वतंत्रता के पश्चात पूंजीवाद ने दुगनी गति से अपने पैर पसारने शुरू कर दिए और आदिवासियों द्वारा सुरक्षित जंगलों को भी उजाड़कर प्रदूषित कर दिया गया है और अब उसी प्रदूषण से देश को बचाने के लिए लाखों करोड़ों की योजनाएं लागू की जाती हैं और  विज्ञापन प्रचारित प्रसारित किए जाते हैं और करोड़ो रुपयों का बंदरबाट किया जाता है और जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ते हुए लाखों आदिवासी पुरुषों, महिलाओं को जेल में ठूस दिया गया । लेकिन उन्होंने कभी समझौता नही किया बल्कि राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए, वे सतत उपनिवेशवाद का विरोध करती रही, तो कई नायिकाओं ने सीधे अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों से मोर्चा लिया और उनकी वीरता का कई अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी डायरियों में वर्णन किया है तथा उन पर दर्ज किए गए मुकदमों की फाइलों को सुरक्षित रखा गया, जिसकी वजह से आज हमें महत्वपूर्ण संदर्भ प्राप्त होते हैं । इस संदर्भ में अंग्रेज कमिश्नर ई.टी.डाल्टन ने लिखा है- "आदिवासी इलाकों में उन्हें 'जीतना' पड़ा ।' रक्तरंजित आदिवासी विद्रोह औरतों की साझेदारी के बिना न पूर्ण हुए और न वह ऐतिहासिक समृध्दि पा सके । समझौता विहीन और आरपार का संघर्ष कर तिलका मांझी उर्फ जारा पहड़िया से लेकर, तेलंगा खड़िया, बिरसा, जतना ने नींव डाली ।विद्रोहियों का ब्रिटिश  फौज के सामने न झुकने का एक बड़ा कारण था औरतों द्वारा मर्दों का पूरा साथ दिया जाना ।विद्रोह की कड़ी में 1855-56 का संताल हूल आदिवासी संघर्ष का ऐसा उदाहरण है जिसमें आत्मगौरव और आत्म सम्मान के लिए दस हजार से ज्यादा लोगों ने कुर्बानी दी । संताल औरतों का अपहरण और कुकर्म के बाद हत्या,  अंग्रेजों महाजनों, और जमीदारों के जुल्म से आदिवासी त्रस्त हो उठे, तो औरत मर्द सभी ने हथियार थाम लिए ।संताल हूल के नायक सिद्धों, चाँद, भैरव के साथ उनकी दो बहिनें फूलों और झानो ने अंग्रेजों के शिविर में जाकर 21 सिपाहियों की हत्या की । संताल लोकगीतों में आज भी इन बहादुर औरतों को याद करके यह समान आत्मगौरव से यह समाज भर उठता है  । खूब लड़ी मर्दानी माकी जैसी बलिदानी और फूलों झानो की कुर्बानी भला कैसे भुलाई जा सकती है ।"1
आदिवासी महिलाओं के संघर्ष को देखकर अंग्रेजों को यह आभास हो गया कि उपनिवेशवाद के विस्तार का सपना इनकी वजह से पूर्ण नही हो पायेगा, उन्होंने कभी भी अपनी संस्कृति को कमजोर नही होने दिया बल्कि जिसने भी उनकी सभ्यता संस्कृति पर आंख उठाई उलटे उसे मुँह की खानी पड़ी ।
  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नागालैंड की आदिवासी रानी गैदीनल्यू ने अंग्रेजों से कभी समझौता नही किया बल्कि उनका मुँह तोड़ जवाब दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय युवा अवस्था को 15 साल जेल में रहकर गुजारा, जब यह देश आजाद हो गया तब कहीं जाकर उन्हें जेल से रिहा किया गया भारत सरकार से पदम  भूषण पुरस्कार प्राप्त होने के पश्चात भेदभाव कारी इतिहासकारों ने उनका कहीं जिक्र नही किया, लेकिन समय का पहिया है कि बाबा साहेब के भारतीय संविधान की बदौलत आज उनके विचारों को आदर्श मानने वाली पीढ़ी निरन्तर काल के गर्त में दफना दिए गए क्रांतिकारियों को खोजकर ही नही निकाल रही बल्कि उचित मान सम्मान दिलाने के निरंतर संघर्ष कर रही है । आज हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाली नागालैंड की आदिवासी रानी गैदीनल्यू का विस्तार पूर्वक अध्ययन करेंगे ।
गैदीनल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 ई0 को मणिपुर के तामेड़ लोड़ जिला के लुआड़ काओ गांव में हुआ था । इनकी माता का नाम कलोटलेनिल्यू पामेई और पिता का नाम लोथोनांग पामेई था । आप बचपन से ही बहुत बहादुर थी बचपन से शिकार का आपको बहुत शौक था जिसकी वजह से कई जंगली जानवरों को आप तीर का शिकार बना लेती थी । रानी गैदीनल्यू 13 वर्ष की उम्र में ही समाज सेवा तथा नागालैंड की जनता के कल्याण के लिए रात दिन मेहनत करती थी अपनी उम्र की कई लड़कियों को तीरंदाजी एवं तलवार चलाने का प्रशिक्षण देना प्रतिदिन का काम था जिसकी वजह से पूरे क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थी  । अपनी लोक सांस्कृतिक विरासत पर जीते जी उन्होंने आंच नही आने दी देश की रक्षा के लिए क्रांतिकारी जडोनांग के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चेबंदी की तैयारी कर दी जिसमें उन्होंने अपने द्वारा प्रशिक्षित किए गए युवकों एवं युवतियों की छावनी बनाना शुरू कर दिया, जिसका प्रभाव यह हुआ कि हजारों युवतियाँ उनके आंदोलन में शरीक होने के लिए छावनी में प्रवेश लेने लगी अलग-अलग गांवों में भी टुकड़ियां तैयार की जाने लगी सर्वप्रथम उन्होंने अन्तेगवा गाँव मे छावनी स्थापित की, लेकिन अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई और अंग्रेज रानी गैदीनल्यू को पकड़ने के लिए भारी संख्या में फोर्स लेकर अन्तेगवा आती है जब तक रानी गैदीनल्यू के गुप्तचर उनको इसकी सूचना प्रदान कर देते हैं जिससे वे तत्काल अपनी छावनी वहां से स्थानांतरित करके हांग्रुम
ले आती हैं रानी गैदीनल्यू की गतिविधियों से अंग्रेजों में खौफ पैदा हो गया था क्योंकि पूरे क्षेत्र में उनकी छावनी का होहल्ला हो गया था तथा अंग्रेजों की रातों की नींद हराम हो गई थी जिसकी वजह से वे उन्हें गिरफ्तार करने के उद्देश्य से हांग्रुम पहुँचते है लेकिन रानी गैदीनल्यू के गुप्तचर बहुत तेज थे और वे अंग्रेजों की प्रत्येक गतिविधि पर नजरें रखते थे रानी गैदीनल्यू ने अपनी छावनी पुइबा गांव में स्थापित कर दी । अंग्रेजों के लिए रानी गले की फांस बनती जा रही थी जिसकी वजह से उनको पकड़ने की प्रक्रिया तेज कर गई और एक दिन ऐसा आ गया कि अंग्रेज सैनिकों एवं रानी द्वारा तैयार किए गए क्रांतिकारियों का आमना-सामना 16 फरवरी 1932 ई0 को हो गया भयंकर रक्तपात में बीसों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया जिसमें क्रांतिकारियों को भी भारी क्षति उठानी पड़ी लेकिन रानी गैदीनल्यू को पकड़ने में अंग्रेज सैनिक नाकाम रहे । इस संदर्भ में वासवी किड़ो लिखती हैं -"रानी गैदीनल्यू को गिरफ्तार करने की जब कोशिशें तेज हो गईं, तो सैनिकों के साथ 16 फरवरी 19312 ई0 को उनके नागा योद्धाओं की खूनी मुठभेड़ हुई । इस रक्तपात में रानी गैदीनल्यू के सात योद्धा शहीद हो गए । लेकिन नागा योद्धाओं ने अपनी जान की बाजी लगाकर रानी गैदीनल्यू को फिरंगियों के चंगुल में जाने से बचा लिया । इसके बाद उन्होंने अपनी छावनी का स्थल बदल दिया ।"2
वे अपने योद्धाओं को लगातार भालेबाजी, तीरंदाजी एवं बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दे रही थी, लेकिन आदिवासी संस्कृति के अनुसार वीर योद्धाओं  राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर विदेशी हथियारों को चलाने से इनकार कर दिया, इसके बाद रानी गैदीनल्यू ने भी अपने वीर बांकुरों पर कोई दवाब नही बनाया और संघर्ष जारी रखा । इसी बीच पुइबा गाँव में किले का आधे से अधिक निर्माण हो गया था, तभी अंग्रेजी सेना के कैप्टन ने 17 अक्टूबर 1932 ई0 को प्रातः काल मे भारी संख्याबल के साथ पुइबा गाँव मे धावा बोल दिया । रानी गैदीनल्यू के वीर बाँकुरे हमले से बेखबर थे इसलिए अचानक हुए हमले के लिए वे पहले से तैयार नही थे । अंग्रेजी सेना ने किले को चारों ओर से घेर लिया था कहीं से भी निकलने का रास्ता नही था । रानी गैदीनल्यू अचानक आई मुसीबत से परेशान हो उठी क्योंकि उनके मन मे गहरा सदमा यह लगा कि उनके ही बीच के ही किसी व्यक्ति ने अंग्रेजों से मिलकर राष्ट्रीय भावना से गद्दारी की थी । इसके बाद भारी संघर्ष प्रारम्भ हुआ बंदूक की गोली और तीर कमान के खूनी संघर्ष में कई अंग्रेज हताहत हुए तो कई वीर बाँकुरे शहादत को प्राप्त हुए बंदूक की गोली और मजबूत घेराबंदी के सामने तीर कमान का जोर न चला । आख़िरकार रानी गैदीनल्यू को बंदी बनाकर कैप्टन मैकडोनाल्ड ने घसीटते हुए बाहर निकाला जिसकी वजह से रानी क्रोध की आग में धधक उठी और उन्होंने मैकडोनाल्ड के हाथ में इतनी भंयकर तरीके से काटा कि खून की धारा बह निकली और कैप्टन मैकडोनाल्ड की दो दिनों बाद मृत्यु हो गई । इसके बाद रानी को कोहिमा की जेल में ले जाया गया । इस संदर्भ में वासवी किड़ो कहती है -"सबसे पहले ब्रिटिश सैनिकों ने रानी गैदीनल्यू की पहचान की और उसे बंदी बनाकर । कैप्टन मैकडोनाल्ड ने रानी गैदीनल्यू के प्रति सख्ती बरतते हुए उसे खींचते हुए बाहर निकाला । ऐसा करने के लिए कैप्टन ने रानी गैदीनल्यू का हाथ पकड़ा तो इसका रानी गैदीनल्यू ने तीखा प्रतिकार किया और कैप्टन मैकडोनाल्ड के हाथ ऐसा हाथ गड़ाया कि उसमें गहरे ज़ख्म हो गए । इसी ज़ख्म की वजह से कैप्टन मैकडोनाल्ड की दो दिनों बाद ही मौत हो गई । रानी गैदीनल्यू को कोहिमा ले जाया गया । जब रानी गैदीनल्यू को ले जाया जा रहा था, तो योद्धाओं ने सैनिकों को काफी भला बुरा कहा था और गालियाँ दी थी । एक सिपाही को तो एक आदिवासी ने मार गिराया था ।"3
भारत देश के आजाद हो जाने के पश्चात भी रानी गैदीनल्यू को आजादी नही प्राप्त हुई इसके पीछे के कारणों को समझना होगा जब देश 1947 को आजाद हुआ तो उन्हें जेल से निकालकर मणिपुर के तामेंगलोंग जिला के के.वी. यिमरूपप नामक एक चम्ब नागा गांव के एक घर मे पांच वर्षों के लिए नजरबंद रखा गया था जो इस देश के शासकों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सम्मानित करने का दौर चल रहा था वहीं एक क्रांतिकारी स्त्री नायिका को नजरबंद रखा गया इसके पीछे का प्रमुख कारण जो जान पड़ता है वह यह कि रानी गैदीनल्यू पूरे क्षेत्र में बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व थी देश की आजादी के पश्चात निश्चित ही उन्हें शासन सत्ता में हिस्सेदारी देनी पड़ती केवल हिस्सेदारी ही नही बल्कि वे उस पूरे क्षेत्र की मजबूत नेता होती जिसकी वजह से क्रांतिकारियों में उनका नाम प्रमुखता से उजागर होता और घोषित क्रांतिकारियों नाम इतना अधिक जोरों से नही चल पाता इसी वजह से जानबूझकर उन्हें पांच साल के लिए नजरबंद किया गया और इन पांच सालों के दौरान सत्ता के मद में चूर लोगों ने क्रांतिकारी महिला की ओर से ध्यान फेर लिया । इस संदर्भ में मार्मिक शब्दो में वासवी किड़ो लिखती है -"ज़ुरा जेल से उन्हें तब मुक्त किया गया जब भारत को 1947 ई0 में आजादी मिली ।..लेकिन आजाद भारत मे भी उन्हें नजरबंद रखा गया । आजादी के तुरंत बाद जेल से निकलने के साथ ही पांच सालों के लिए उन्हें मणिपुर के तामेंगलोंग जिला के वी. यिमरूपप नामक एक चम्ब नागा गांव के एक घर मे नागरबन्द रखा गया था ।"4
04 अप्रैल 1952 ई0 को रानी गैदीनल्यू को अपने पुरुखों के गांव लुआड़ खाओ में भेज दिया गया इसके पश्चात उन्होंने अपने क्षेत्र में सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने का काम शुरू किया और इन्हीं कामों में उनके दिन व्यतीत होने लगे वे लगातार पशुबलि का विरोध करती थी उन्हें बाद में सरकार की ओर से बिरसा मुंडा पुरस्कार, स्वामी विवेकानंद पुरस्कार तथा पदम भूषण पुरस्कार स्व नवाजा गया । इस तरह एक असली नायिका 17 फरवरी 1993 ई0 को हम सभी के बीच स्व चली गई । इस देश अनेकों ऐसी नायिकाओं ने जन्म लिया तथा जमीन पर संघर्ष किया लेकिन उनकी जाति और वर्ग उनके सामने आकर ऐसे अड़ गया कि कभी भी द्विज की कलम से इन नायिकाओं के लिए एक शब्द नही निकले ।

Saturday, 21 April 2018

बाबू ज्वाला प्रसाद अहिरवार जी का जीवन संघर्ष और साहित्य लेखन

     ज्वालाप्रसाद अहिरवार बुन्देलखण्ड की धरती पर 1960 से 1980 के बीच सामाजिक क्रांति के क्षेत्र में बहुचर्चित नाम था । जिन्होंने लगातार जमीदारों से संघर्ष करते हुए समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करते हुए सामाजिक चेतना पैदा की, उस दौर में आपने उच्च शिक्षा ग्रहण करके शिक्षक के पद पर तैनात हुए तथा गले मांस को खाने, मरे जानवरों को उठाने के प्रतिरोध में अभियान चलाया जिसमें कई बार उच्च जातियों द्वारा गोलियाँ भी चलाई गई जिसकी वजह से उस समय आपने राइफल का लाइसेंस लेकर इन लोगों से मुकाबला किया । 1960 के दशक के जितने भी क्रांतिकारियों को देखता हूँ तो पाता हूँ कि वे केवल भाषणों द्वारा ही समाज को जागरूक नही कर रहे थे बल्कि लेखनी भी बहुत मजबूत थी । इसी कड़ी बुंदेली धरती में आल्हा लोक गायन बहुत अधिक प्रचलित था आल्हा को सुनने के लिए जमावड़ा लग जाता था इसलिए बाबू ज्वाला प्रसाद जी ने उस दौर में बाबा साहेब के पूरे जीवन संघर्ष को आल्हा तर्ज पर लिखकर लोगों के बीच गायन परंपरा के माध्यम से भी सामाजिक चेतना पैदा करने का काम किया और इसी क्रम में मुझे आज गोपाल महीप सर के माध्यम से इसकी प्रति प्राप्त हुई जो बहुत ही महत्वपूर्ण है पांच से छः पन्ने के इस लोक परंपरा भीम आल्हा में बहुत ही सारगर्भित बातों को लिखा गया है और उस दौर में ये पंक्तियाँ लोक परंपरा में बुंदेलखंड की धरती में गुनगुनाई जाती थी । आगे प्रयास जारी रहेगा जो साथी इस संदर्भ की कड़ी को आगे जोड़ते हुए समग्र जीवन संघर्ष के बारे जानते हो बताने का कष्ट करें क्योंकि पूरे बुन्देलखण्ड में बहुजन चेतना के रूप में यह बहुचर्चित नाम रहा है ।
ऐसे बहुजन नायक को क्रांतिकारी जय भीम

बाबू ज्वाला प्रसाद जी द्वारा लिखित 'आल्हा चेतावनी' की प्रारंभिक कुछ पंक्तियाँ रख रहा हूँ । आप सभी सुझाव जरूर दें-
भुमियाँ सिमरो महू छावनी, भुइयां माता तुम्हें मनाए ।
फूले बैठो मेरे कंठ में, भूले अक्षर देव बताए ।।
मालो पिता जी सीस नबाऊँ, भीमाभाई के चरण मनाए ।
जन्मे भीम कुंख इन्हीं की, कलयुग 'मनु' की पदवी पाय ।।
विधि मंत्री बन बैठे दिल्ली, बुद्धि का मिला न बारा पार ।
नेहरू, पटेल, गांधी काँपे, बाबा भीम ने दई ललकार ।।
हिन्दू धर्म मे जात पात की, भारी खाई परी दिखलाए ।
बाबा बोले नेहरू जी से, ऐसे राज्य पनप है नाय ।।
जाति पात का कोढ़ देश में, भारी बीमारी दिखलाए ।
दवा विचारों जल्दी इसकी, नहिं तो देश रसातल जाए ।।
चुप्पी साधी नेहरू गांधी, बाबा समझ गए मन माह ।
14 अक्टूबर सन 56 में, बौद्ध धर्म लीन अपनाए ।।
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Wednesday, 11 April 2018

डॉ भीमराव आंबेडकर का शैक्षणिक योगदान

                   डॉ भीमराव अंबेडकर का शैक्षणिक योगदान
                                                                प्रदीप कुमार, शोधार्थी,हिंदी विभाग
                                                                बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी(उ0प्र0)

      किसी भी समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के लिए उस देश के नागरिकों का जागरूक होना अत्यावश्यक होता है और जागरूकता गहन अध्ययनशीलता एवं स्वच्छंद चिंतन से आती है । तब शिक्षा के स्वरूप को हम समझने का प्रयास करें, तो हमें डॉ भीमराव अंबेडकर के शिक्षा दर्शन को समझना होगा, जिन्होंने राष्ट्र को गर्त में जाने बचाया ही नही है बल्कि विश्वविभूतियों में गिने जाने योग्य तथागत बुद्ध के धम्म को नई ऊर्जा एवं चेतना से पुनः रोपने का काम किया जिसका परिणाम यह हुआ कि विश्व के श्रेष्ठ विभूतियों  में तथागत बुद्ध का प्रथम स्थान रहा एवं  डॉ भीमराव अंबेडकर का नाम छठवें नंबर पर अंकित हुआ जिसकी वजह से  केवल विश्व में भारत देश की विद्वता ही नही बल्कि धम्म की भी स्वीकार्यता है । डॉ भीमराव अंबेडकर जी के अध्ययन क्षेत्र को यदि हम देखें तो ऐसा कोई ही क्षेत्र होगा जिसमें बाबा साहेब ने काम न किया हो । सम्पूर्ण वांग्मय का अध्ययन करते समय यह निश्चित हुआ कि बाबा साहेब के बहुत से विचारों को मनुवादियों एवं बहुजन साहित्यकारों द्वारा भी नजरअंदाज किया गया है, केवल उन्हीं वक्तव्यों को बताया गया, जो आमजन मानस को रुचिकर लगें, जबकि डॉ अम्बेडकर को समझने के लिए उनके तीन प्रमुख सिद्धांतों शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो में प्रथम सिद्धांत शिक्षित बनो को समझना होगा और इसी क्रम आगे बाबा साहेब के शिक्षा दर्शन को समझने का प्रयास करेंगे .    
वर्तमान समय में सभी राजनैतिक दल बाबा साहेब के राग अलापने में लगे हुए है, लेकिन उनके विचारों से कहीं साम्यता नजर नही आती है . देश की स्वतंत्रता के पश्चात जिस तरीके से पूंजीवाद के प्रभाव में भारत देश आया है, तबसे यहाँ गरीब ग़रीबी में दफ़न हो रहा है और अमीर निरंतर अमीर होता जा रहा है और इसमें मुख्य रूप से जातिगत भेदभाव से पीड़ित हाशिए में डाल दिए गए समाज को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है . जिसका प्रभाव यह हुआ कि आज प्रत्येक क्षेत्र में निजीकरण किया जा रहा है . यहाँ तक कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी निजीकरण की भट्टी में झोंक दिया गया है , जबकि अन्य विकसित देशों में नजर डाले तो शिक्षा और स्वास्थ्य का राष्ट्रीयकरण किया गया है, जिससे कि पढ़ाई लिखाई और स्वास्थ्य की देखभाल में आम नागरिक को कोई मुसीबत न उठानी पड़े . वर्तमान भारत में सर्वाधिक निजीकरण शिक्षा का हुआ है जिससे हालात यह है कि गरीब तो छोड़िए, जो साधारण नौकरी वाला व्यक्ति है वह अपने बच्चों को मनमाफ़िक शिक्षा मुहैया नही करा पा रहा है . यदि तजा उदहारण देखें तो उत्तराखंड सरकार ने निजी विश्वविद्यालयों को स्वयं की फ़ीस बढ़ाने की स्वीकृति प्रदान कर दी, तो MBBS की फ़ीस पांच- सात लाख से बढाकर बीस से तीस लाख के बीच में कर डी गयी, जो सामान्य नागरिक तो छोडिए मध्यम वर्गीय परिवार भी नहीं दे सकते हैं . फ़ीस में भारी बढ़ोत्तरी देखकर छात्र सामूहिक धरने में बैठकर इच्छा म्रत्यु की मांग करने लगे तब सरकार का झक्का खुला और अपने फैसले को वापिस लिया . बाबा साहेब अम्बेडकर भविष्य के इसी द्रश्य को लेकर बहुत अधिक चिंतित थे . इस संदर्भ में गंभीर चिंतन व्यक्त करते हुए  बम्बई विधानसभा मंडल में अपनी बात को रखते हुए कहा था कि -"छानबीन करने से मुझे यह पता लगा है कि आर्ट्स कालिजों पर जो खर्च होता है, उसका 36 प्रतिशत भाग फीस से मिलता है हाईस्कूलों पर जो खर्च होता है उसका 31 प्रतिशत भाग फीस से आता है । महोदय ! मेरा निवेदन है कि यह शिक्षा का व्यवसायीकरण है । शिक्षा तो एक ऐसी चीज है, जोकि सबको मिलना चाहिए ।शिक्षा विभाग ऐसा नही है जो इस आधार पर चलाया जाए कि जितना वह खर्च करता है, उतना विद्यार्थियों से वसूल किया जाए  शिक्षा को सभी सम्भव उपायों से व्यापक रूप में सस्ता बनाया जाना चाहिए ।"1
देश की आजादी के बाद दलित,पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक समाज के युवा शिक्षा ग्रहण करते हुए प्रत्येक क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं , तब ऐसी स्थिति में सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि देश का कोई भी युवा अर्थ के अभाव में अपनी शिक्षा न छोड़ पाए क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार देश के प्रत्येक नागरिक का यह अधिकार है कि वह अपने देश में बेहतर से बेहतर शिक्षा ग्रहण करे. इस विषय मे बाबा साहेब कहते हैं -" अब हम उस स्थिति पर आ गए हैं, जब समाज के निचले तबके के लोगों के बच्चे हाईस्कूल, मिडिल स्कूल और कालिजों में जा रहे हैं । इसलिए इस विभाग की नीति यह होनी चाहिए कि निचले वर्गों के लिए उच्च शिक्षा को जितना संभव हो सस्ता बनाया जाए ।"2
    वर्तमान समय मे दलित समाज को  जोड़ने के लिए सभी राजनैतिक दल लगे हुए हैं, किन्तु वस्तुस्थिति में उतरकर कोई भी उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नही खोज रहा है यदि देखा जाए तो आधुनिक भारत मे दलित राजनैतिक प्राणी हो गया है, जो चुनाव के समय पर सबको भाता है और चुनाव जीत जाने के सब दूर हो जाते हैं, उसी का परिणाम है कि 90 प्रतिशत  दलित आज भी अभाव की जिंदगी जी रहे है जिनके पास न तो बेहतर शिक्षा,स्वास्थ्य है और न ही कोई रोजगार है . वे आज भी लाचार होकर मेहनत मजदूरी करते हुए जीवन यापन कर रहे है उनमें से कुछ लोगों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो जाने के पश्चात थोड़ा स्थिति में सुधार हुआ भी है, तो उन्हें पुनः उसी स्थिति में पहुंचाने के लिए जो संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए है उन पर लगातार कुठाराघात किया जा रहा है । वर्तमान NDA सरकार के कुछ मंत्री लगातार संविधान की समीक्षा की बात उठाते हैं, तो आरएसएस के प्रचारक आरक्षण को समाप्त करके पुनः मनुस्मृति लागू करने की बात करते हैं . जबकि विभिन्न शासन कर्ताओं ने सुनियोजित तरीके से उच्च शिक्षा से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण लागू कर दिया है, जिसकी  वजह से आरक्षण मात्र दिखावा रह गया है . उसे अंदर ही अंदर इतना कमजोर कर दिया गया है कि उसके रहने या रहने से बहुत अंतर नही पड़ने वाला है । आरक्षण वैसे प्रतिनिधित्व का अधिकार है . जो प्रत्येक नागरिक को समान रूप से प्राप्त होना ही चाहिए । 05 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) , नई दिल्ली  द्वारा एक आदेश दिया गया है जिसमें आरक्षण के नए रोस्टर विश्वविद्यालय को इकाई न मानकर विभाग को इकाई माना गया है, जिसकी वजह से आरक्षण होने के बाद भी दलित, पिछड़े, आदिवासी समाज के युवकों को उसका लाभ प्राप्त नही होने वाला है . बाबा साहेब डॉ आंबेडकर दलितों पिछड़ों के कोई हक और अधिकार न छीन पाए इसके लिए सरकार को निगरानी करने के लिए कहते है इसके उलट वर्तमान NDA सरकार धीरे-धीरे जानबूझ कर दलित पिछड़ों को हाशिए पर डाल रही है और प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित करती जा रही है । बाबा साहेब कहते हैं-"वर्तमान शासन के अंतर्गत दलित वर्ग अपने को अत्यंत दयनीय स्थिति में महसूस करते हैं । वे ऐसे लोगों से घिरे हुए हैं, जो उनकी महत्वाकांक्षाएं या उनकी विकास और प्रगति की इच्छाओं में किसी तरह भागीदार नही बन सकते हैं । इसलिए मेरा कहना है कि इस बात की और भी अधिक आवश्यकता है कि सरकार किसी निरीक्षक एजेंसी को अपने सीधे नियंत्रण में नियुक्त करे, जो यह देखे कि वे निकाय जिनको शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण काम सौंपा गया है, दलितों की उपेक्षा न करें ।"3
     वर्तमान समय में प्रत्येक शहर, कस्बे में बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के किए गए संघर्ष की वजह से बेहतर हॉस्टलों की व्यवस्था हो गई है जिसकी वजह से गाँव,गली, देहातों के नव युवाओं को बहुत बड़ी राहत प्राप्त हुई है, क्योंकि शहर में यदि किसी को रहने का आशियाना प्राप्त हो जाये तो इससे बेहतर क्या होगा ? कस्बों एवं नगरों में स्थापित हॉस्टल अनुसूचित जाति, पिछड़े एवं आदिवासी अभ्यर्थियों के लिए वरदान साबित हुए हैं लेकिन जब कभी भी इन वर्गों की अहितकारी सरकारें बनती है, तब-तब इन अभ्यर्थियों को बहुत संघर्ष करना पड़ता है उनकी सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में बाधा पहुंचाई जाती है तो प्राप्त होने वाली सुविधाओं में एकाएक भारी कटौती कर दी जाती है । वर्तमान समय मे यदि आप सरकारी हॉस्टलों के आसपास का वातावरण देखेंगे, तो पाएंगे कि ऐसे लोगों का जमावड़ा है . जो जुए, शराब इत्यादि की लत में तल्लीन रहते है . यह सब जानबूझकर किया गया है और प्रशासन ऐसे लोगों को वहाँ से हटाता भी नही है ।  डॉ भीमराव अम्बेडकर जी पिछड़े बच्चों हेतु छात्रावास की सुविधा मुहैया कराने हेतु जोर देते हुए कहते हैं - " मैं माननीय मंत्री को सुझाव देना चाहता हूँ कि क्या यह बेहतर नही होगा कि वह इस धन का उपयोग छात्रावासों की अभिवृद्धि के लिए करें, जिसे या तो सरकार खुद बनाए-चलाए या यह काम पिछड़ी जातियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली निजी संस्था करे । महोदय ! इससे दोहरी बचत होगी । सबसे पहली बात तो यह कि छात्रावास लड़कों को गंदे माहौल से दूर रखता है । उसे प्रभावी निरीक्षण उपलब्ध होता है और जब छात्रावास की व्यवस्था निजी संस्था द्वारा की जाएगी, तो सरकारी धन की कुछ बचत होगी ।"4
     अनुसंधान उच्च शिक्षा में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय का जीव होता है इसके अभाव में विश्वविद्यालय का कोई महत्व नही रह जाता है वह मात्र परीक्षा करने-कराने का माध्यम मात्र रह जाता है . अनुसंधान के अभाव में विश्वविद्यालय थोथा कल्पना मात्र है, क्योंकि शोध के मार्ग उच्च शिक्षण संस्थाओं से ही खुलते है जो राष्ट्र को एक सुनहरा भविष्य दिखाने के लिए सामाजिकी, मानविकी में बेहतर शोध को प्रकट करते है । उच्च शिक्षा में अनुसंधान की आवश्यकता को महसूस करते हुए बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर कहते हैं -" किसी भी विश्वविद्यालय को अनुसंधान कार्यों या उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देने में सफलता नही मिल सकेगी, अगर वह परीक्षा प्रणाली को ही अपने अस्तित्व का एकमात्र ध्येय मान लेता है । 19020 में गठित विश्वविद्यालय आयोग ने स्वीकार किया था और उसकी रिपोर्ट के बाद प्रस्तुत किए गए विधेयक में इस तथ्य को स्वीकार किया गया था कि जिस विधान से यह विश्वविद्यालय बना, उसे इस तरह बदलना चाहिए, जिससे विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की परीक्षाएं तो लेता रहे, परंतु इसके साथ ही वह पढ़ाने का भी काम कर सके ।"5
    उच्च शिक्षा के वर्तमान हालातों का यदि हम विश्लेषण करें तो बाबा साहेब विचारों से बिल्कुल उलट स्थिति प्राप्त होती है, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण को पूरी तरह से बंद करने की बात कही थी क्योंकि निजीकरण से देश समाज के हाशिए में पड़े व्यक्ति का ही नुकसान होता है वर्तमान समय मे देश के अंदर 70-80 प्रतिशत संस्थाएं निजीकरण के हवाले है . जिससे उच्च शिक्षा की हालात बहुत बिगड़ चुके है, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से 20 मार्च 2018 को घोषणा कि गई जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा 05 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 21राज्य विश्वविद्यालय, 24 डीम्ड विश्वविद्यालय और दो निजी विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता प्रदान की गई है, जिसकी वजह से सामाजिक न्याय की अवधारणा प्रतिबंधित होकर अन्याय अत्याचार एवं धन उगाही के स्थल बन जायेंगे एवं दलित आदिवासी पिछड़ा अल्पसंख्यक एवं गरीब तबके के लोगों को हाशिए में डाल दिए जायेगा .  जहाँ डिग्री तो प्राप्त हो रही है, किंतु ज्ञानविहीन युवाओं की भीड़ पैदा की जा रही है और इन विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शिक्षक की हालत क्लर्क से भी बदतर कर दी गई है यहाँ अनुसंधान तो बहुत दूर बल्कि कक्षा शिक्षण भी मुहैया नही हो रहा है जबकि बाबा साहेब अंबेडकर शिक्षक के संदर्भ में कहते हैं- " जिस प्रोफेसर को गुलाम जैसा काम करना पड़ता है, वह कभी भी सच्चे अर्थों में अध्यापक नही बन सकता है । वह एक साधारण कर्मचारी ही बन सकता है और तैयार कुंजी की मदद से ही अपना काम करेगा । हम उससे मौलिकता की कोई उम्मीद नही रख सकते और वह उन विद्यार्थियों को जिनको दुर्भाग्यवश उससे पढ़ना पड़ रहा है, कोई प्रेरणा नही दे सकता है । सारा शिक्षण मात्र एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है ।"6
      बाबा साहेब अंबेडकर के मात्र विचार ही प्रेरणा के स्त्रोत नही है बल्कि उनका समग्र जीवन से ही हम प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं । वर्तमान समय में युवा पढ़ने से अधिक भोग की वस्तुओं को पहले जुटाने का प्रयास करता है जिससे निश्चित ही पढ़ाई में बाधा उत्पन्न होती है और कुछ युवा तो लगातार कोई न कोई वस्तु न होने का बहाना बनाकर शिक्षा से दूर भागते नज़र आते है, तो ग़रीब परिवार के बच्चों के लिए बाबा साहेब सर्वाधिक प्रेरणादायी है, क्योंकि बाबा साहेब ने बहुत ही कष्ट के साथ पढ़ाई की धनाभाव बहुत रहा लेकिन उन्होंने पढ़ाई बन्द नही कि बल्कि दुगनी ऊर्जा के साथ अध्ययन किया और निरंतर सफलता की ओर अग्रसर हुए मेरा मानना है कि यदि कोई युवा सच्चा अम्बेडकरवादी तभी हो सकता है जब वह धन अभाव की परवाह किए बिना निरंतर संघर्ष के साथ उनके प्रथम सूक्त 'शिक्षित बनो' को पूर्ण करे । कोलंबिया विश्वविद्यालय में में बाबा साहेब प्रतिदिन 16 से 18 घंटे तक गहन अध्ययन करते थे और पुस्तकों से उन्हें बेहद लगाव था, जिसकी वजह से उन्होंने एक पुस्तक खरीद ली और उसकी वजह से उन्होंने दो दिनों तक भोजन नही किया था .इस सन्दर्भ में आनन्द श्रीकृष्ण लिखते हैं –“एक दिन होटल में वह खाना खाने पहुँच गए . खाना खाने के लिए जब उन्होंने हाथ बढाया तब उन्हें ध्यान आया कि खाने के पैसों से तो वे किताब खरीद लाए हैं . वे बगैर खाना खाए कमरे लौट आये और दो दिनों तक भूखे रहे क्योंकि उन्होंने जो किताब खरीद ली थी उसकी कीमत उनके दो दिनों के खाने के बराबर थी. उनका महीने के खर्च का बजट न बिगड़ने पाए इसलिए वे दो दिन तक भूखे रहकर ही पढाई करते रहे .”7
   बाबा साहेब अम्बेडकर शिक्षा के माध्यम से ही सभी मार्ग प्रशस्त करते है उनका स्पष्ट मत था कि शिक्षा के बिना सामाजिक उत्थान संभव नही है और सामाजिक उत्थान के अभाव में संस्कृतिक परिवर्तन नहीं किया जा सकता है एवं संस्कृतिक परिवर्तन किए बिना अछूत कभी हिंदू धर्म में स्वाभिमान और सम्मान प्राप्त करने योग्य नहीं हो सकता है . भले ही दलित विद्यावाचस्पति की उपाधि हासिल कर ले, लेकिन वह हिंदू धर्म के  निरा पोंगा ब्राहमण से निम्न ही रहेगा . इन सबके बाद भी भारतीय संविधान की द्रष्टि में मानव-मानव एक समान की अवधारणा में सभी मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर स्तर पर शिक्षा के माध्यम से ले जा सकते हैं . बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर स्पष्ट लिखते हैं-“शिक्षा और समाज का अटूट रिश्ता है, क्योंकि शिक्षा ही समाज के सांस्कृतिक उन्नयन का आधार है वे कहते हैं कि समाज अपना स्तर ऊँचा उठाने के लिए सामूहिक पद्धति से जो प्रयास करता है, वह शिक्षा है. समता मूलक समाज निर्माण के लिए सबको शिक्षा मिलनी जरुरी है .”8
बाबा साहेब अम्बेडकर शिक्षा को मुख्य मानते है इसीलिए उन्होंने पहला सूत्र ही शिक्षित बनो से दिया है .
सन्दर्भ-
1.बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर, सम्पूर्ण वांग्मय, खंड-03, प्रकाशक- डॉ अम्बेडकर प्रतिष्ठान, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, सातवाँ संस्करण, 2013 अक्टूबर, पृष्ठ-57
2.वही, पृष्ठ-57
3. वही, पृष्ठ-60
4. वही, पृष्ठ-61
5. वही, पृष्ठ-63
6. वही, पृष्ठ-64
7.दलित दस्तक, संपादक-अशोकदास, प्रकाशकीय कार्यालय-पांडव नगर नई दिल्ली मासिक,अप्रैल 2016, पृष्ठ-17
8. वही, पृष्ठ-42 


प्रकाशित- हाशिये की आवाज, अप्रैल, २०२१ 

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