Tuesday, 26 November 2013

कोपता

कोपता
वह शुक वर्ण से विकसित
स्व -लम्बाकार से मुखरित
डाल पर लहलहा रही थी
शुक पंख समान स्व -पत्रों से
गगन को चाह रही थी
तब लालची मनुज स्व कर से
बल्लरी को रौंद शुक पंख तुल्य
लौकी को विरल करता है
कायरता से भरकर मर्माहत
प्रहार निरत वह करता है
फिर छिलनी से लम्बाकार छील
पीलाकर बेसन में समिश्रण कर
गोलाइयों में ढालकर
प्याज को बारीकियों में
विभाजित कर
उसका भी समिश्रण नमक
साथ करता है
खौलते तेल के मध्य
छोड़ दिया जाता है
उछलकूद कर फड़फड़ाते हैं वे
भाग जाने कि चाह में
मनुज में तेल के छीटें
छोड़ जाते हैं वे
पूर्ण आगोश से दौड़ते है वे

सुबह


हे ऊषा !
आज हृदय क्यों आकुल है ?
तू बता ना
ओस की बूँदो को भरकर
तू कहाँ लायी
इतनी मनोहर शीतलता
तूने कहाँ से पायी ?
इतनी श्यामलता को समेत
अमृत की बूंद को
तू कहाँ से लायी ?
हे प्रभा !
तूने ऊषा का हरण कर लिया
अमृत कि बूंद को तत्क्षण
ऊषा से विरल कर दिया
श्यामलता को ढक
जगत को प्रकाशित कर दिया
गगन मण्डल को लालिमा से
मण्डित कर दिया।
हे प्रभा !
यह शक्ति तूने कहाँ से पायी ?
मुझे बता ना।
हे प्रातः !
ये क्या तूने सोते मनुज में
शक्ति ,ओज ,शौर्य,से
संचित कर दिया
धैर्य कि परम्परा को
विकसित कर दिया
प्रभा का हरण कर
लालिमा को विरल कर
अरुण की किरणों से
जगत को भर दिया।
मनुज जग गया
चिड़ियाँ चहक उठी
देवालयों में शंक बज उठे
हे प्रातः !
ये पुञ्ज तूने कहाँ से पायी
मुझे बता न। .

                                                                             प्रदीप कुमार गौतम
                                                                               २६/११/२०१३


























































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































Sunday, 24 November 2013

तेरे ख़यालों में


तेरे नैनों की कातर निगाहों से
दिल पथभ्रष्ट हो गया
बनना चाहता था अफसर
लेकिन मैं तेरा मजनू बना
सादगी सी उमंग उमड़ उठी
दिल चंचलता में खो गया
कहते थे इस संसार में
कुछ बड़ा करके दिखायेंगे
बड़ा तो कुछ कर न सके
तेरी कातर निगाहों के सामने
हाँ बस यही अरमान उपजा
डूबा रहूँ तेरी कातर निगाहों में
क्या करूँ क्या न करूँ
ये प्रश्न निरंतर है उपजते
सुबह -शाम आठों प्रहर
तेरा शशि -मुख मण्डल है घूमता
तेरी निगाहों की चंचलता से
तेरे ख़यालों में हूँ डूबता।

                                                                प्रदीप कुमार गौतम
                                                                     २४/११/२०१३

स्त्री आखिर क्यों


वह भूधरा पर  आते ही
लक्ष्मी का आगमन कहलाती है
वह नित्य कोमल हाथों से
परिवार में सादगी लाती  है
वह बचपन से ही घर को
सजाती और संवारती है
वह केवल घर ही नहीं
 विद्यालय को भी सजाती है
वह भाषणों में भी
नित्य नया सूरज जगाती है
वह पुरुष को भी
अपने स्वरूप से निखारती है
वह बन बहू ससुरालियों के
दिल में अलख जगाती है
वह बन माता ममता से
पुत्रों को दुलारती है
वह बन दादी अपने नातियों को
सदा लोरियाँ सुना हँसाती है
वह अंश है इस संसार का
वह कुञ्ज है ज्ञान भण्डार का
वह पुरूष की सहधर्मिणी है
वह समान है वह अलौकिक है
वह भण्डार है ममत्व का
फिर क्यों आज उसका ह्रास है
वह क्यों विक्षिप्त है समाज से
क्यों उसका आज अपमान है
वह सदियों से हमारी
बेटी ,माता ,बहू दादी
सब कुछ तो है वह
फिर क्यों उसे समानता नहीं
आखिर क्यों ?

                                                     प्रदीप कुमार गौतम
                                                       २४/११/२०१३

Saturday, 23 November 2013

दीवानगी


कोई तो है जो याद है
कोई तो है जो मुझे भाता है
पता नही क्या हो गया
जो दिन- रात मुझे कुछ बताता है
सिमट गये हैं दिन
उखड़ गयीं हैं राते
भूल गया सबकुछ
बीत गयीं बातें
कुछ दिल में कसक उठी
और रीत गयी पलकें


                                                                            प्रदीप कुमार गौतम

Wednesday, 13 November 2013

पतंगा


जैसे ही अरुण लालिमा को
अपनी गोद में भरकर
पहाड़ी की  गोद में जाकर
स्वयं मग्न होता है
लेता है हिलोरे उमंगताओं से भरकर
फिर यकायक दिवस गगन से
तिमिर स्व स्वरुप निखरता है
नालियों से पचपचाती गन्दगी से
पंख खोल मधुर गुंजार कर
प्रकाश कि चाह में
भर उड़ान चल पड़ा
यत्र -तत्र देखकर
चमचमाती विधुत लाइट को
पाने कि चाहे में
फैल पंखों को
एक उड़ान भर
अचानक पहुँचा समीप
झपटा आगोश में
समेटने के लिए
पर ऊष्मा कि लौ
धधकी अति जोर से
थोड़ा ठिठक हटा कुछ दूर
ऊष्मा को पाकर
चेतन में व्याकुलता बङी
उसे पाने कि चाहे में
धन कि चाहे में मनुज
जैसे घूमता है दौड़ता है
अधिक से अधिक एकत्र करने के लिए
खो देता है अपना स्वरुप
वैसे ही वह दौड़ा
उसे समेटने के लिए
पर हाय !वह मिट गया
उस ऊष्मा की
धधकती लौ से

                                                                         प्रदीप कुमार गौतम
                                                                               १३/११/२०१३

अमावस की रात


अँधेरी रात में बैठा अकेले
आकाश को निहारा था
तारों की रोशनी थी मद्दियम
उन्होंने किसी को पुकारा था
दुग्धावल स्वेद किरणों को भरकर
शीतलता को समेटकर
उसे दिया इशारा था
मानो बादल अर्द्धरात्रि में
अटखेलियां करते हुए
ताराओं कि शीतल किरणों का
स्पर्श करना चाहता था
लेकिन ताराओं को तो केवल
एक चाँद ही प्यारा था
वे सूर्यास्त होते ही
मिलन कि आस में
बैठ गये थे अपनी
चांदनी चद्दर फैलाकर
वे ह्रदय में आकुलता को भरे हुए
बिलबिला रहे थे मिलन के लिए
लेकिन उनकी आस अधूरी थी
और रहेगी भी आज सम्पूर्ण निशा
क्योंकि आज
अमावस की रात थी

                                                                                      प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                        १३/११/२०१३

Tuesday, 12 November 2013

मित्रता कि परत


तू आज मुरझायी कली -सी क्यों है
स्ववाकपटुता में चातुर्य को भरे
फिर भी अवयव से अकुलायी क्यों है
आत्म -चेतनता से है तू संचित
फिर यह नीरसता पायी क्यों है
माधुर्य भर देता है तेरे करों का छुअन
पर उनमें श्यामलता छायी क्यों है
तेरे वर्णों की अभिव्यंजना है अति मनोहर
फिर उन्होंने बेरूखू दिखायी क्यों है
तेरे वदन में मंद मुस्कान है मुखरित
फिर उसमें यह सिकुड़न तूने बढ़ायी क्यों है
तेरे अधरों की प्रफुल्लता है अति रमणीय
पर उसमें यह धूल सनायी क्यों है
तेरे कदमों की चाल है बढ़ी मंथर
फिर उनमें यह रूकावट आयी क्यों है
तेरे मस्तिष्क का विश्वास है अति दृढ़
फिर उसने यह व्याकुलता दिखायी क्यों है
तेरे धमनियों का रक्त हैअति तीव्र
फिर उसने यह शीतलता पिघलायी क्यों है
सर्वत्र जगत में तू है सम्पूर्ण
फिर मेरी मित्रता की परत हटायी क्यों है


                                                                                        प्रदीप कुमार गौतम
                                                                                          १२/११/२०१३

Sunday, 10 November 2013

आज का युवा

आज फिर बात होगी
नये -नये वक्ताओं से मुलाकात होगी
सभी कि जहन में सवाल होगा
आज क्या युवा का हाल  होगा
सूखी हुई हड्डियों में जान होगी
अपने पुराने तीरों से बरसात होगी
विवेकानंद जी कि फिर संगोष्ठियाँ होगीं
जिसमें आज के युवा पर सीधी कमान होगी
बम फुटेगें ,धमाके होगें
आज युवा पर सभी के निशाने होगें
क्या किसी ने आज के
युवा को जाना है
अर्थ का युग है
टेट ,नेट ,पीएचडी ,क्या नही किया
आज के युवा ने
फिर भी वह आज बेकार है
क्यूँ क्या किसी ने सोचा है
 सरकार की  रणनीतियों से
समाज कि बेरुखी से
उसे आज हतोत्साहित
किया जाता है
ना करे कोई आज आलोचना
क्योंकि उसी ने
छुआ है आसमान
आज का युवा है
श्रेष्ठ श्रेष्ठ...............................

Saturday, 9 November 2013

माँ


माँ दिव्यता की स्रोत
ममता का भण्डार
अखंड ज्योति -सा
जिसका पावन प्यार
नित्य जिसमें उमड़ता
बच्चों के प्रति दुलार
नतमस्तक हो जाता
जिसके सामने संसार
गंगा -सा पवित्र
जिसका आशीर्वाद
अलौकिक स्नेह निर्झर
जिसमे संसार
फिर आज क्यों हो रहा
उसी का तिरस्कार
पुरुष का स्वरूप
आज होता अत्याचार
बर्बरता कि सीमा
लांघा पुरुष अपार
जिसकी वजह से
है वह पोषित
नित्य करता
उसी को शोषित
मातृ भाव
दिखलाता झूटा
ममता का वह
खून चूसता
लद गये दिन
आज पुरुष के
स्त्री हो गयी
कटी पतंग -सी
नही खिचेगी
तुमसे डोर
भूल जाओ
अत्याचारियों  अब रोड
ममता कि
कसम निभायेंगे
माँ को माँ
हम  बनायेंगे …………।

                                                              प्रदीप कुमार गौतम

                                                                   ०९/११/२०१३

Thursday, 7 November 2013

चाय


आग के ऊपर रख पात्र
नीर आहुति देता है
ऊष्मा कि चाह में
जैसे ही नीर ऊष्मा को
करता है प्राप्त
क्षीर समाहित हो जाता है
उसमे
मिल करते अटखेलियाँ
उचकते फड़फड़ाते दोनों
अपने अस्तित्व के लिए
उनकी समझ से परे
यह  क्या हो रहा है हमारा
बस
वे यह ही चिंतन करते
चिंतन के आगोश में
खोय हुए इधर -उधर ताक रहे थे
तभी अचानक उनके ऊपर
कृष्ण वर्ण छोटे -छोटे डेन
समिश्रित हुए
अब तीनो मिल करने लगे कोलाहल
लेकिन कोई न सुन रहा था
उनका यह कारुणिक रुदन
तभी खांड आकर
उनका हल -चल पूछता है
सांत्वना दिलाता है
उसके एहसास से
उन्हें अपना स्वरूप साकार
समझ आता है
वैश्वानर से विरल
छोटे -छोटे छिद्रों से
पटतरौं कि गहराई से
साँस लेते हैं
साँस लेते ही उनके
तप भाप का स्वरुप लेता है
तब मनुज उस रसताप को
अधरों से मिलाकर
एक चुस्की लेता है
उस चुस्की से वह रस
गले के द्वार को लांघता हुआ
जीभ के ऊपर दौड़ता हुआ
संगीत से भरकर
उमंग से चलकर
गले में स्वताप
छोड़ता हुआ
आँतों को अपना एहसास
दिलाता हुआ
उदर में जाकर
आराम लेता है
उस रसताप के एहसास से
मनुज में जागती  है
चेतना ,स्फूर्ति ,ताजग़ी
आलस्य से विरल कर
उसे पुनः शक्ति से
संचित करता है वह
आज उसका है महत्व अति
हरेक सदन में
होटलों में ,दफ्तरों में
अति धनवान से लेकर
निर्धन के घर भी
है उसका दबदबा
वह करता है नित्य
प्रातः गान।
आखिर है तो वह
आज के मनुज का
प्रिय पेय पदार्थ
वह तीव्र ताप को छोड़ता
लेकिन मनुज
एक चुस्की चाय की
जरुर लेता है।

                                                            प्रदीप कुमार गौतम
                                                            ०७/११ /२०१३

गाँव

गाँव
वह मेरा छोटा -सा गाँव
कितनी रमणीयता को समेटे हुए
सदा मोहकता को लपेटे
स्वविरल चेतनता को भरे
मंद -मंद गति से
प्रमुद हो रहा था।
नीम के वृक्षों की
सरसराहट की आवाज़
छोटी -छोटी पत्तियां
उस पर उनकी कोपलता
थोड़ा कड़वाहट को समेटे
हर रोग को हरती थी
उस पर इमली का बड़ा -सा
विशाल -वृक्ष मंद -मंद हिल
स्वोपरि देवदूतों का झुण्ड
चीखते थे हर रोज़
पास में जाकर स्वमित्रों के साथ
देखते थे हर दिन उन्हें
गालियाँ सदा हमारी
मित्र हुआ करती थी
झुण्ड का झुण्ड दौड़ता था
सदा उस पर
कितनी सजीवता थी
उस समय
संगठित था पूरा समाज
एक -दूसरे के समीप बैठ
हाल  -चाल लिया करते थे
थोड़े कष्ट में भी
सभी सरीक हो जाते थे
हर पर्व में वह
सदा गुंजार करता था
बच्चों कि टोलियाँ
किलकारियाँ मरते हुए
सम्पूर्ण गाँव के भीतर
गलियों में घूमते थे
लेकिन आज मानो
मरघट में तब्दील हो गया है
कितना अजीब -सा लगता है
यहाँ आकर
सर्वत्र खंडहर
जिस पर स्वानों का झुण्ड
पिल्लों का सदन
बस
और कुछ नही बचा
अब सभी नगरीय में ढल रहे हैं
गाँव से विरल हो
शहरी बन रहे हैं।


                                                          प्रदीप कुमार गौतम
                                                            ०८/११/२०१३                                                                        

Friday, 1 November 2013

केश


वे इधर लहरायें ,उधर लहरायें
फिर कपोलों को आकर
कोमलता से भरकर थोड़ा
खटपट तरीके से
मेरा चुम्बन कर जाएँ।
वे नैनों के आगें आकर
फुदक -फुदक नृत्य करें
मैं उन्हें हटाऊँ तो हूँ
वे पीठ में जाकर
मधुर -मधुर गान सुनाएँ
उनकी श्यामलता को देख
स्वतः मेरा उन पर
हाथ फिर जाये। .

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...