कोपता
वह शुक वर्ण से विकसित
स्व -लम्बाकार से मुखरित
डाल पर लहलहा रही थी
शुक पंख समान स्व -पत्रों से
गगन को चाह रही थी
तब लालची मनुज स्व कर से
बल्लरी को रौंद शुक पंख तुल्य
लौकी को विरल करता है
कायरता से भरकर मर्माहत
प्रहार निरत वह करता है
फिर छिलनी से लम्बाकार छील
पीलाकर बेसन में समिश्रण कर
गोलाइयों में ढालकर
प्याज को बारीकियों में
विभाजित कर
उसका भी समिश्रण नमक
साथ करता है
खौलते तेल के मध्य
छोड़ दिया जाता है
उछलकूद कर फड़फड़ाते हैं वे
भाग जाने कि चाह में
मनुज में तेल के छीटें
छोड़ जाते हैं वे
पूर्ण आगोश से दौड़ते है वे
वह शुक वर्ण से विकसित
स्व -लम्बाकार से मुखरित
डाल पर लहलहा रही थी
शुक पंख समान स्व -पत्रों से
गगन को चाह रही थी
तब लालची मनुज स्व कर से
बल्लरी को रौंद शुक पंख तुल्य
लौकी को विरल करता है
कायरता से भरकर मर्माहत
प्रहार निरत वह करता है
फिर छिलनी से लम्बाकार छील
पीलाकर बेसन में समिश्रण कर
गोलाइयों में ढालकर
प्याज को बारीकियों में
विभाजित कर
उसका भी समिश्रण नमक
साथ करता है
खौलते तेल के मध्य
छोड़ दिया जाता है
उछलकूद कर फड़फड़ाते हैं वे
भाग जाने कि चाह में
मनुज में तेल के छीटें
छोड़ जाते हैं वे
पूर्ण आगोश से दौड़ते है वे