Tuesday, 10 October 2017

मजदूरी

मजदूरी(लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम

        चार दिनों से भगीरथ बहुत परेशान हो गया था ,  रोजी रोटी की जुगाड़ में दिन दिन भर राठ रोड में खड़ा रहता, लेकिन कोई औने पौने दाम में भी उसे मजदूरी नही देता था ।  वह थक हारकर घर पहुंचा उसकी हालत देखकर पत्नी समझ गई कि आज भी मजदूरी नही मिल पाई है । वह दिलासा देती फिर भी उससे रहा न जाता तो वह कहती ऐसे कब तक चलेगा तीन माह से रोहित की फीस जमा नही की है वह हरेक दिन विद्यालय न जाने की जिद करता है । कहता है मुझे रोज कक्षा से बाहर खड़ा कर दिया जाता है फिर फीस के लिए मैडम कहती है ।  वह सबकुछ सुनते हुए मौन धारण किए रहा, उसे  कोई उपाय नही सूझ रहा था ।
           भगीरथ दो साल पहले ही अपने गाँव कानाखेड़ा से उरई पूरे परिवार सहित आ गया था । वह अनपढ़ था लेकिन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से रात दिन पति पत्नी मिलकर मजदूरी करते थे । सुबह राठ रोड पर पहुंच जाते जहाँ से कोई न कोई उन्हें ईट काम मे 350 रुपये मजदूरी पर ले जाते थे । बच्चों की पढ़ाई के साथ परिवार का भरण पोषण अच्छे से हो रहा था किंतु अचानक हुई नोटबन्दी से लोगों ने काम करवाना बन्द करवा दिया कभी कोई साहूकार काम करवाने के लिए मजदूर लेने आता तो कई मजदूर उसके पीछे पड़ जाते, जिससे औने पौने रुपये देकर जी भर काम लिया जाता, लेकिन नोटबन्दी के साथ बालू बंदी ने ईट गारे वाले मजदूरों की कमर तोड़ दी थी, जिससे उनके बच्चों की शिक्षा दीक्षा तो दूर खाने के लाले पड़ गए थे, उसी समस्या में आज भगीरथ का पूरा परिवार अभाव में जीने को मजबूर था ।

सूखा

सूखा(लघुकथा)
.... प्रदीप कुमार गौतम
  
      इस वर्ष राजीव ने खेतों में ज्वार, एवं अलग-अलग दलहन की बुवाई कर दी थी, जानवरों के लिए अलग से हरियाली बो दी, जिससे गाय भैंसों को चारा मिलता रहे पूरे क्षेत्र की खेती बरसात के पानी पर टिकी थी । वर्षा समय पर हो जाती, तो खेत लहलहा जाते किसानों के चेहरे खिल उठते थे, लेकिन लगातार तीन वर्षों से खेती बाड़ी में कुछ खास पैदा नही हो पा रहा था । उल्टे प्रत्येक वर्ष पांच-दस हजार की उधारी बढ़ती जा रही थी । 
         बुवाई होने के पश्चात पूरे बुन्देलखण्ड में सूखा पड़ गया । जानवरों के साथ लोग भी परेशान हो गए गुजारा कैसे करें ? दूर-दूर तक कोई रास्ता नही सूझ रहा था,  उसने गाय एवं भैंस को बेचने का प्रण किया, लेकिन बाजार में उचित दाम प्राप्त नही हुए । अकाल की स्थिति में राजीव खुद के परिवार का भरण पोषण में करने में असमर्थ हो गया । जिससे वह पूरे परिवार के साथ शहर में रोजगार की तलाश हेतु चला गया  ।
      उसकी भैंस तो रिश्तेदारों ने ले ली किन्तु गाय को अन्ना छोड़ दिया । आजकल गाँव की सभी गायें खड़ी फसलों को खा रही थी । आखिर करते भी क्या ? क्योंकि पूरा का पूरा क्षेत्र सूखा से ग्रसित था ।

Monday, 9 October 2017

मान्यवर साहेब

मान्यवर कांशीराम साहेब को 13 सितम्बर 2003 को जब ब्रेन स्ट्रोक हुआ तो उन्हें बत्रा हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया और 2003 के बाद वे सक्रिय राजनीति में नही आ पाए तथा बत्रा हॉस्पिटल में ही 09 अक्टूबर 2006 को उन्होंने अंतिम सांस ली । इन स्थितियों को देखकर जहन में एक प्रश्न कौंधता है कि मान्यवर साहेब की तबियत इतनी अधिक अस्वस्थ होने पर जहाँ बहिन जी को खाँसी, बुखार, ज़ुखाम हो जाने पर भी उन्होंने विदेश में इलाज करवाया है छोटे से छोटा नेता अलग-अलग डॉ0 को दिखवाता है सही इलाज न होने पर विदेश भी जाता है ऐसी स्थिति में मान्यवर कांशीराम साहेब को ऐसी कौन -सी बीमारी थी जिसका इलाज ही नही हो सकता था या उनके लिए विदेश से डॉक्टरों की टीम नही बुलाई जा सकती है ।
   हो सकता है कुछ साथियों को मेरा प्रश्न यह वाज़िब न लगे लेकिन आज नही तो कल कोई न कोई शोध कर्ता यह प्रश्न उठाएगा क्योंकि जिस महापुरुष ने एक वैचारिक भूमि तैयार करके एक महल खड़ा किया देश-विदेश में बहुजन राजनीति की आवाज बुलंद हुई । डॉ आंबेडकर एक व्यक्ति विशेष  न रहकर एक विचार के रूप में परिवर्तित हो गए । जिन्होंने बाबा साहेब के संविधान कि मूलभावना लोक तंत्र की वकालत की । उनके जाने के पश्चात लोकतंत्र पार्टी के अंदर मज़ाक बनकर रह गया । जिस ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरोध में पूरा का पूरा कारवाँ चला था 2007 के सत्ता में आने के पश्चात उसी का वर्चस्व पार्टी के अंदर कायम हो गया । सिद्धांत केवल थोथी कल्पना मात्र रह गयी । जिस चमचा युग की मान्यवर कांशीराम साहेब ने आलोचना की, वही घोर चमचा युग यहाँ प्रारम्भ हो गया . कार्यकर्ता की जगह अनजान पैसे वाले चेहरों को तबज्जो दी जाने लगी । मिशनरी कार्यकर्ताओं की जगह गुलाम मानसिकता के भक्त तैयार किए जाने लगे । देखते ही देखते एक बड़ा महल झोपड़ी में तब्दील हो गया । बुध्द के तर्कों की बात करने वाले पार्टी के लोगों से तर्क न करने की नसीहत देने लगे । ऐसा भयावह मंजर जिसमें अपनो के द्वारा अपने ही पीसे जाने लगे । बहुजन नाम केवल नाम तक ही सीमित रह गया । यह केवल चमार और ब्राह्मण जाति की संकुचित पार्टी बनकर रह गयी फिर भी लोग रोकते रहे कुछ मत लिखना भाई लोग नाराज हो जाएंगे आखिर नग्न नाच तुम करते रहो हम धूर्त बनकर देखते रहे । ऐसा न होगा जिसे तर्क यदि विरोधी लगे तो विरोधी समझे किन्तु इस विषय पर अब और नही रुक सकते हैं ।

यात्रा वृतांत- मेरी लखनऊ यात्रा:- कुछ खट्टा कुछ मीठा

मेरी लखनऊ यात्रा :-कुछ खट्टा कुछ मीठा
लेखक- प्रदीप कुमार गौतम

कई दिनों से इंतजार कर रहा था कि 6वें दलित साहित्यकार सम्मेलन में शामिल होना है हृदय में एक अलग तरह का कौतूहल बना हुआ था कितने लोग होंगे जिन्हें मैं लगातार पढ़ता हूँ वे सभी साहित्यकार आएंगे यह सोचकर भी मेरा मन गदगद हुआ जा रहा था । दलित साहित्य परिषद के अध्यक्ष प्रो0 टी0 पी0 राही जी ने एक माह पहले से ही दलित साहित्यकार सम्मेलन की सूचना फेसबुक, वाट्सअप इत्यादि माध्यमों से फैला दी थी । ऐसा नही है कि इससे पूर्व मैं सेमिनारों में नही गया हूँ लेकिन इस कार्यक्रम में शामिल होने कि दिली इच्छा थी । इसलिए सुबह ही तैयार होकर लखनऊ के लिए इंटर सिटी ट्रेन से रवाना हो गया । मानवेन्द्र सिंह का कॉल आया- "हेलो, प्रदीप भाई ! कहाँ पहुँचे ?
बस ! कानपुर पहुँच गया हूँ । मैंने जवाब दिया
अच्छा ! लखनऊ आ जाओ तो बता देना
हाँ ! ठीक है भाई
ट्रेन कानपुर तक तो अच्छे से चली इसके पश्चात उसमें निरन्तर रुकावटे अधिक आ रही थी वैसे ही मानवेन्द्र के कॉल लगातार आते जा रहे थे
मानवेन्द्र मेरा मित्र था जो डॉ अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ इंडिया(DASFI)  के माध्यम से तीन साल पहले से जुड़ा था जो लिंग्विस्टिक विषय में लखनऊ विश्वविद्यालय से शोधार्थी था । शोधमित्र होने की वजह से उसकी मुझसे बहुत अच्छी पटती थी । लखनऊ या उरई में हम लोगों की अक्सर मुलाकात होती ही रहती थी ।
लखनऊ पहुंचने के पश्चात सीधे लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंचा जहाँ मानवेन्द्र सुबह से इंतजार कर रहा था । उसके साथियों के साथ मैंने ढाबे में चाय की चुस्कियाँ ली । इसके बाद मैंने डॉ संगीता रावत जी कॉल करके कार्यक्रम प्रारम्भ होने की सूचना ली और हम सभी प्रेस क्लब के लिए रवाना हो गए । जहाँ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था बुद्ध वंदना के अवसर पर ही कार्यक्रम में शामिल हो गए जहाँ कार्यक्रम की अध्यक्षता महामहिम डॉ माताप्रसाद जी (पूर्व राज्यपाल, आंध्रप्रदेश) कर रहे थे । संचालन प्रो0 टी0 पी0 राही के हाथों में था
मैं अपने आँखों की प्यास को बुझाने के किए नामचीन दलित साहित्यकारों को देखने का प्रयास कर रहा था लेकिन उनके चेहरे इस कार्यक्रम से ओझल दिख रहे थे । मेरे चेहरे का रंग उड़ता जा रहा था और धीरे धीरे फीका पड़ता जा रहा था प्रेस क्लब की जगह देखकर मन पहले ही खिन्न हो चुका था अब दलित साहित्यकारों के नाम पर लखनऊ के ही कुछ नाम थे जो बहुत अधिक चर्चित भी नही थे और न ही उनकी दलित सहित्यिकी में कोई स्थापना थी । मेरे हृदय का गुबार ठंडा हो चुका था पूरे कार्यक्रम में केवल सत्तर से अस्सी लोग नज़र आ थे थे जबकि प्रो0 टी0 पी0 राही जी स्वयं लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है तब ऐसी स्थिति में शायद सभी शोधार्थी भी आ गए होते तो भी शायद संख्या अधिक होती । मैं लगातार इसी उधेड़ बुन में लगा थी कि अचानक मेरी नजऱ शोधमित्र धर्मवीर यादव गगन पर पड़ी । मन चहक उठा, चेहरे खिल गया मेरी दृष्टि फिर एक शोधमित्र को और खोजने लगी क्योंकि गगन जी अकेले हो ही नही सकते है और अचानक उनकी पीठ में मेरी नजरें टिक गई आखिर मेरी नजरों के सामने आशीष कुमार दीपांकर भी आ गए थे । दोनों ही उम्दा क़िस्म के इंसान साहित्य में शोध के लिए शायद इनके इतनी यात्राएँ किसी और ने की हो लगातार झोला उठाकर किसी भी समय किसी भी शहर में मुठभेड़ हो सकती है और अचानक हुआ भी । इन दोनों ही साथियों से फेसबुक के माध्यम से मित्रता हुई थी और पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैम्पस में मुलाकात हुई थी । जहाँ पर सुनील कुमार यादव के छात्रसंघ उपाध्यक्ष की कैम्पेनिंग हेतु गए हुए थे । अगस्त के माह था आशीष जी पसीने पसीने हुए जा रहे थे धर्मवीर जी लगातार युवा साथियों को समझाने में लगे हुए थे । इसके पश्चात हम लोग दो घंटे तक साथ मे रहे जिसमें देश दुनिया की तमाम मुद्दों को लेकर चर्चा हुई थी हम तीनों में खास बात यह थी कि तीनों के ही शोध विषय दलित आत्मकथाओं पर ही थे । इसके बाद मित्रता गहराती गई और यह दूसरी मुलाकात थी लखनऊ के प्रेस क्लब में हो गई थी । दलित लेखकों से न मिल पाने का मलाल कब हवा हो गया मालूम ही नही पड़ा किन्तु प्रो0 कालीचरण स्नेही सर से मुलाकात करने की इच्छा अधूरी रह गयी थी ।
मानवेन्द्र जा चुका था उसके स्थान पर अब साहित्यिक मित्रों का साथ मिलना लाज़मी थी । तभी आशीष जी ने दिनेश कुमार जी मुलाकात करवाई जो वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से शोधार्थी थे ।  कार्यक्रम के समापन पर हम लोगों ने सभी के साथ फोटो क्लिक करवाई और बाहर बैठकर एक घंटे तक विविध मुद्दों पर गहन चर्चा की ।
   आज 07 अक्टूबर को मेरे जन्मदिन पर सुबह से ही कई कॉल आ चुके थे । जिससे बातचीत में व्यवधान आ रहा था इसलिए मोबाइल को साइलेंट कर दिया था ।चार अलग-अलग विश्वविद्यालयों से चार मित्र एक साथ हुए थे । हम लोगों के रात्रि विश्राम के स्थान अलग-अलग थे ऐसे में एक साथ समय बिताने की दिली इच्छा थी इसलिए ई-रिक्शा करके हम लोग एक  होटल में भोजन करने के लिए पहुँचे । होटल की दशा और मीनू में बहुत अंतर था शायद यह राजधानी होने का प्रभाव था मैं इसी उधेड़बुन में लगा था कि अपने जन्मदिन के बारे में साथियों को अवगत कराऊँ कि नही  बाद में मैंने बता ही दिया जिस पर धर्मवीर भाई ने अपनी ओर से पार्टी दी । भोजन के लिए ऑर्डर कर दिया गया सामाजिक सहभाव कैसे जाग्रत हो,  समानता को कैसे स्थापित किया जाए ? सभी के विचार जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए अंतरजातीय विवाह पर आकर टिक गई जब अंतरजातीय विवाह होंगे तो रक्त कि शुद्धता की पोंगापंथी ढह जाएगी ।
लोगों में आपसी भाईचारे का भाव जागृत होगा ईर्ष्या द्वेष से निजात मिलेगी और बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर जी के विचारों का मूल भारत का निर्माण होगा जहाँ जाति गत धर्मगत लिंगगत भेदभाव बन्द होकर सामाजिक समरसता के राष्ट्र का निर्माण होगा । वेटर थालियाँ तैयार करके ले आया था शाही पनीर, आलू पालक, दाल फ्राई के साथ रोटियाँ सामने थी भोजन को देखकर मुँह में पानी आ गया था एक ओर विमर्श पर चर्चा दूसरी ओर भोजन दोनों को एक साथ चलाने की रजामंदी हुई  । आशीष दीपांकर जी की इंगेजमेंट हो चुकी थी तब वे अंतरजातीय विवाह की दौड़ से बाहर हो चुके थे लेकिन हम तीन लोग अंतरजातीय विवाह करने का एक दूसरे को संकल्प दिला रहे थे जिसमें दिनेश कुमार जी कुछ शांत नजऱ आ रहे थे उन्हें भोजन के बाद अस्पताल निकलना था जहाँ उनका अपना कोई खास भर्ती था उसकी दावा का का टाइम हो चुका था इसलिए वो उलझन में थे सबसे कम रोटियाँ भी उन्होंने ही खाई थी ।

लेकिन मैं तो आज वैसे भी बर्थडे बॉय था तब

Sunday, 8 October 2017

सोच (लघुकथा)

सोच(लघुकथा)
......प्रदीप कुमार गौतम
       रवि के ऊधम से परेशान होकर मैंने आज मीरा मैडम से मिलने का निश्चय किया, मीरा जी रवि की माँ थी  । कई दिनों से उसके कृत्य से मुहल्ले वालों को  परेशान हो गए थे । घर में पहुंचा तो बड़े आदर भाव से उन्होंने बैठने को कहा मैं शांत होकर बैठ गया । किस बात कैसे से शुरू करूँ इसी उलझन में था यदि बेटे की तुरन्त बुराई करता हूँ, तो शायद इन्हें अच्छा न लगे इसलिए तारीफ करते हुए बात करने का निश्चय किया ।
'रवि तो बहुत अच्छा लड़का है, वह आधुनिकता से लबालब है' मैंने कहा
'हाँ भाई साहेब ! वह लगातार पढ़ता रहता है, उसका व्यवहार अच्छे -अच्छे लोगों से है और तो और उसकी दस गर्ल फ्रेंड्स है ।' उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया
मैं सोचने लगा कि क्या ये अपनी लड़की लिए भी इसी तरह से गर्व से बखान करेगी ?

Friday, 6 October 2017

जरनल डिब्बा (लघुकथा)

जरनल डिब्बा(लघुकथा)
.........प्रदीप कुमार गौतम
        एक माह से लगातार प्रयास के बाद रिजर्वेशन नही हो पाया था । दिवाली में पूरा परिवार एकत्रित हो रहा था तो मुझे भी घर पहुंचना था । साल में एकमात्र यही त्योहार था जिसमें सभी से मुलाकात हो जाती थी । सुबह तैयार होकर स्टेशन पहुँचकर रेलगाड़ी का इंतजार करने लगा ।  रेलगाड़ी के आने पर जब जनरल डिब्बे में जैसे ही कदम रखा उसके हालात देखकर कदम ठहर से गए । बाथरूम से लेकर बालकनी तक आदमी औरतें ऐसे ठुंसे हुए थे जैसे मुर्गों को हलाल करने से पहल गाड़ियों में ठूँस कर ले जाया जाता है । किसी तरह अंदर  पहुंचा तो सिर में पोटली में झूलता आदमी टकरा गया फर्स में लेटे आदमी के ऊपर पैर पड़ गया तो उसने उसनीदें में अजीब सी भद्दी गाली दी और फिर सो गया दुर्गंध ऐसी की एक क्षण भी राही न आये । लगातार बाथरूम में जाते लोग बिना मल साफ़ किए हुए हाथों से सभी के ऊपर रखते अपनी सीट तक पहुंचने के लिए आतुर  । चार-चार दिन का सफ़र केवल खड़े होकर करने वाले नींद में ऐसे ढेर कि कोई भी लात मारे उड़ककर एक ओर टिक जाते । रेलगाड़ी का जरनल डिब्बे में हताशा, निराशा, गरीबी दुनिया का बेवस भारत चल रहा था ।

Monday, 2 October 2017

गरबा (लघुकथा)

गरबा(कहानी)
.......प्रदीप कुमार गौतम
   आज चारो ओर हलचल मची हुई थी ,धीरे-धीरे लोग एकजुट होकर बड़ी माता मंदिर के पास पहुंच रहे थे, वहाँ पर  गरबा के खेल का आयोजन किया गया था ।
जयेश मां से बोला -' अम्मा मैं गरबा का खेल देखने जा रहा हूँ '
बेटा ! उहाँ पर मत जाओ उस मुहल्ला के छत्रिन में हमाई जाति के लिए घृणा भरी हुई है' । मां ने रोका
"ये सब पुरानी बातें है,आजकल कोई जाति नही मानता है, यह देश भारतीय संविधान से चलता है माँ" ऐसा कहते हुए वह बाहर निकल गया ।
गरबे के खेल की पूरी तैयारियां हो गई थी । नई नवेली दुल्हनें, बूढ़ी औरतें एवं नौयुवतियों ने रंग विरंगे कपड़ो को पहनकर आई थी एक से एक सुघर नौयुवतियां थी जिन्हें देखकर छत्रिन के लरका जोर-जोर से सीठी मार रहे थे चारो ओर मोहक दृश्य था ।
जयेश बड़ी माता के मंदिर की सीढ़ियों में जाकर बैठ गया ।
खेल शुरू हो चुका था, सभी लोग खेल का लुफ्त उठा रहे थे । तभी एक अधेड़  उम्र का आदमी हाथ मे लाठी लिए भीड़ को चीरता हुआ मंदिर के पास आ धमका और जोर से बोला -' मादर...... भोस... के मंदिर अपवित्तर कर दीनो'
जयेश कुछ समय के लिए सहम गया इसके बाद बोला - 'काहे चाचा मोय बैठन से अपवित्तर कैसे हुआ मंदिर का हम इंसान नही है का'
उसकी बातें सुनकर अधेड़ जलभुजं गया और गरजकर बोला- ज्यादा मुँह चलाया तो गां... में डंडा घुसेड़ दूँगा ।तुम भला इंसान खुद को कबसे मानने लगे ।'
जोर-जोर की चीखें सुनकर आसपास के सभी पटेल , क्षत्रिय एकजुट हो गए ।
जयेश को मंदिर में बैठा देखकर भीड़ भेड़िया बनती जा रही थी जो उस बालक को खाने की चेष्टा कर रही थी ।
लंबी चोटीधारी लंपट पंडित बोला ई ससुरा चमरा- चुहड़ौ को शर्म नही है जब देखो संविधान और अम्बेडकर को ही बखानते रहते हैं हम नही मानत उस चुहड़े के संविधान को और गरबा देखन को अधिकार का तुम्हाए बाप ने दे दौ का ।
रामधन ठाकुर जलीकटी गालियां देते हुए चला आ रहा था उसने आकर जयेश के सिर पर जोरदार लाठी से प्रहार लिया वह सीढ़ियों से नीचे गिर गया खून की धारा बह निकली ऐसे में ही लंपट पंडित बोला ई हरामखोर चूहड़ा आज बचकर न निकले सदियों के लिए दोबारा ई मुहल्ला में झाखन को प्रयास न करे
चारो ओर से लाठियों डंडो लातो से प्रहार होने लगे वह हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता रहा लेकिन भीड़ बिना कुछ सुने हमला करती रही
खून से मंदिर का आँगन रम गया
खून से लथपथ लाश पड़ी हुई है
उसकी माँ दहाड़े मारकर रो रही है
पिता पछाड़ खा खाकर गिर रहा है ।
मनु जोर जोर से अट्टहास कर रहा है ।
आज 21वीं सदी में भी  जयेश प्रत्येक दिन जातिवाद के दानव के भेंट चढ़ रहा है ।

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...