मेरी लखनऊ यात्रा :-कुछ खट्टा कुछ मीठा
लेखक- प्रदीप कुमार गौतम
कई दिनों से इंतजार कर रहा था कि 6वें दलित साहित्यकार सम्मेलन में शामिल होना है हृदय में एक अलग तरह का कौतूहल बना हुआ था कितने लोग होंगे जिन्हें मैं लगातार पढ़ता हूँ वे सभी साहित्यकार आएंगे यह सोचकर भी मेरा मन गदगद हुआ जा रहा था । दलित साहित्य परिषद के अध्यक्ष प्रो0 टी0 पी0 राही जी ने एक माह पहले से ही दलित साहित्यकार सम्मेलन की सूचना फेसबुक, वाट्सअप इत्यादि माध्यमों से फैला दी थी । ऐसा नही है कि इससे पूर्व मैं सेमिनारों में नही गया हूँ लेकिन इस कार्यक्रम में शामिल होने कि दिली इच्छा थी । इसलिए सुबह ही तैयार होकर लखनऊ के लिए इंटर सिटी ट्रेन से रवाना हो गया । मानवेन्द्र सिंह का कॉल आया- "हेलो, प्रदीप भाई ! कहाँ पहुँचे ?
बस ! कानपुर पहुँच गया हूँ । मैंने जवाब दिया
अच्छा ! लखनऊ आ जाओ तो बता देना
हाँ ! ठीक है भाई
ट्रेन कानपुर तक तो अच्छे से चली इसके पश्चात उसमें निरन्तर रुकावटे अधिक आ रही थी वैसे ही मानवेन्द्र के कॉल लगातार आते जा रहे थे
मानवेन्द्र मेरा मित्र था जो डॉ अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ इंडिया(DASFI) के माध्यम से तीन साल पहले से जुड़ा था जो लिंग्विस्टिक विषय में लखनऊ विश्वविद्यालय से शोधार्थी था । शोधमित्र होने की वजह से उसकी मुझसे बहुत अच्छी पटती थी । लखनऊ या उरई में हम लोगों की अक्सर मुलाकात होती ही रहती थी ।
लखनऊ पहुंचने के पश्चात सीधे लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंचा जहाँ मानवेन्द्र सुबह से इंतजार कर रहा था । उसके साथियों के साथ मैंने ढाबे में चाय की चुस्कियाँ ली । इसके बाद मैंने डॉ संगीता रावत जी कॉल करके कार्यक्रम प्रारम्भ होने की सूचना ली और हम सभी प्रेस क्लब के लिए रवाना हो गए । जहाँ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था बुद्ध वंदना के अवसर पर ही कार्यक्रम में शामिल हो गए जहाँ कार्यक्रम की अध्यक्षता महामहिम डॉ माताप्रसाद जी (पूर्व राज्यपाल, आंध्रप्रदेश) कर रहे थे । संचालन प्रो0 टी0 पी0 राही के हाथों में था
मैं अपने आँखों की प्यास को बुझाने के किए नामचीन दलित साहित्यकारों को देखने का प्रयास कर रहा था लेकिन उनके चेहरे इस कार्यक्रम से ओझल दिख रहे थे । मेरे चेहरे का रंग उड़ता जा रहा था और धीरे धीरे फीका पड़ता जा रहा था प्रेस क्लब की जगह देखकर मन पहले ही खिन्न हो चुका था अब दलित साहित्यकारों के नाम पर लखनऊ के ही कुछ नाम थे जो बहुत अधिक चर्चित भी नही थे और न ही उनकी दलित सहित्यिकी में कोई स्थापना थी । मेरे हृदय का गुबार ठंडा हो चुका था पूरे कार्यक्रम में केवल सत्तर से अस्सी लोग नज़र आ थे थे जबकि प्रो0 टी0 पी0 राही जी स्वयं लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है तब ऐसी स्थिति में शायद सभी शोधार्थी भी आ गए होते तो भी शायद संख्या अधिक होती । मैं लगातार इसी उधेड़ बुन में लगा थी कि अचानक मेरी नजऱ शोधमित्र धर्मवीर यादव गगन पर पड़ी । मन चहक उठा, चेहरे खिल गया मेरी दृष्टि फिर एक शोधमित्र को और खोजने लगी क्योंकि गगन जी अकेले हो ही नही सकते है और अचानक उनकी पीठ में मेरी नजरें टिक गई आखिर मेरी नजरों के सामने आशीष कुमार दीपांकर भी आ गए थे । दोनों ही उम्दा क़िस्म के इंसान साहित्य में शोध के लिए शायद इनके इतनी यात्राएँ किसी और ने की हो लगातार झोला उठाकर किसी भी समय किसी भी शहर में मुठभेड़ हो सकती है और अचानक हुआ भी । इन दोनों ही साथियों से फेसबुक के माध्यम से मित्रता हुई थी और पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैम्पस में मुलाकात हुई थी । जहाँ पर सुनील कुमार यादव के छात्रसंघ उपाध्यक्ष की कैम्पेनिंग हेतु गए हुए थे । अगस्त के माह था आशीष जी पसीने पसीने हुए जा रहे थे धर्मवीर जी लगातार युवा साथियों को समझाने में लगे हुए थे । इसके पश्चात हम लोग दो घंटे तक साथ मे रहे जिसमें देश दुनिया की तमाम मुद्दों को लेकर चर्चा हुई थी हम तीनों में खास बात यह थी कि तीनों के ही शोध विषय दलित आत्मकथाओं पर ही थे । इसके बाद मित्रता गहराती गई और यह दूसरी मुलाकात थी लखनऊ के प्रेस क्लब में हो गई थी । दलित लेखकों से न मिल पाने का मलाल कब हवा हो गया मालूम ही नही पड़ा किन्तु प्रो0 कालीचरण स्नेही सर से मुलाकात करने की इच्छा अधूरी रह गयी थी ।
मानवेन्द्र जा चुका था उसके स्थान पर अब साहित्यिक मित्रों का साथ मिलना लाज़मी थी । तभी आशीष जी ने दिनेश कुमार जी मुलाकात करवाई जो वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से शोधार्थी थे । कार्यक्रम के समापन पर हम लोगों ने सभी के साथ फोटो क्लिक करवाई और बाहर बैठकर एक घंटे तक विविध मुद्दों पर गहन चर्चा की ।
आज 07 अक्टूबर को मेरे जन्मदिन पर सुबह से ही कई कॉल आ चुके थे । जिससे बातचीत में व्यवधान आ रहा था इसलिए मोबाइल को साइलेंट कर दिया था ।चार अलग-अलग विश्वविद्यालयों से चार मित्र एक साथ हुए थे । हम लोगों के रात्रि विश्राम के स्थान अलग-अलग थे ऐसे में एक साथ समय बिताने की दिली इच्छा थी इसलिए ई-रिक्शा करके हम लोग एक होटल में भोजन करने के लिए पहुँचे । होटल की दशा और मीनू में बहुत अंतर था शायद यह राजधानी होने का प्रभाव था मैं इसी उधेड़बुन में लगा था कि अपने जन्मदिन के बारे में साथियों को अवगत कराऊँ कि नही बाद में मैंने बता ही दिया जिस पर धर्मवीर भाई ने अपनी ओर से पार्टी दी । भोजन के लिए ऑर्डर कर दिया गया सामाजिक सहभाव कैसे जाग्रत हो, समानता को कैसे स्थापित किया जाए ? सभी के विचार जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए अंतरजातीय विवाह पर आकर टिक गई जब अंतरजातीय विवाह होंगे तो रक्त कि शुद्धता की पोंगापंथी ढह जाएगी ।
लोगों में आपसी भाईचारे का भाव जागृत होगा ईर्ष्या द्वेष से निजात मिलेगी और बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर जी के विचारों का मूल भारत का निर्माण होगा जहाँ जाति गत धर्मगत लिंगगत भेदभाव बन्द होकर सामाजिक समरसता के राष्ट्र का निर्माण होगा । वेटर थालियाँ तैयार करके ले आया था शाही पनीर, आलू पालक, दाल फ्राई के साथ रोटियाँ सामने थी भोजन को देखकर मुँह में पानी आ गया था एक ओर विमर्श पर चर्चा दूसरी ओर भोजन दोनों को एक साथ चलाने की रजामंदी हुई । आशीष दीपांकर जी की इंगेजमेंट हो चुकी थी तब वे अंतरजातीय विवाह की दौड़ से बाहर हो चुके थे लेकिन हम तीन लोग अंतरजातीय विवाह करने का एक दूसरे को संकल्प दिला रहे थे जिसमें दिनेश कुमार जी कुछ शांत नजऱ आ रहे थे उन्हें भोजन के बाद अस्पताल निकलना था जहाँ उनका अपना कोई खास भर्ती था उसकी दावा का का टाइम हो चुका था इसलिए वो उलझन में थे सबसे कम रोटियाँ भी उन्होंने ही खाई थी ।
लेकिन मैं तो आज वैसे भी बर्थडे बॉय था तब