Sunday, 8 October 2017

सोच (लघुकथा)

सोच(लघुकथा)
......प्रदीप कुमार गौतम
       रवि के ऊधम से परेशान होकर मैंने आज मीरा मैडम से मिलने का निश्चय किया, मीरा जी रवि की माँ थी  । कई दिनों से उसके कृत्य से मुहल्ले वालों को  परेशान हो गए थे । घर में पहुंचा तो बड़े आदर भाव से उन्होंने बैठने को कहा मैं शांत होकर बैठ गया । किस बात कैसे से शुरू करूँ इसी उलझन में था यदि बेटे की तुरन्त बुराई करता हूँ, तो शायद इन्हें अच्छा न लगे इसलिए तारीफ करते हुए बात करने का निश्चय किया ।
'रवि तो बहुत अच्छा लड़का है, वह आधुनिकता से लबालब है' मैंने कहा
'हाँ भाई साहेब ! वह लगातार पढ़ता रहता है, उसका व्यवहार अच्छे -अच्छे लोगों से है और तो और उसकी दस गर्ल फ्रेंड्स है ।' उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया
मैं सोचने लगा कि क्या ये अपनी लड़की लिए भी इसी तरह से गर्व से बखान करेगी ?

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