मजदूरी(लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम
चार दिनों से भगीरथ बहुत परेशान हो गया था , रोजी रोटी की जुगाड़ में दिन दिन भर राठ रोड में खड़ा रहता, लेकिन कोई औने पौने दाम में भी उसे मजदूरी नही देता था । वह थक हारकर घर पहुंचा उसकी हालत देखकर पत्नी समझ गई कि आज भी मजदूरी नही मिल पाई है । वह दिलासा देती फिर भी उससे रहा न जाता तो वह कहती ऐसे कब तक चलेगा तीन माह से रोहित की फीस जमा नही की है वह हरेक दिन विद्यालय न जाने की जिद करता है । कहता है मुझे रोज कक्षा से बाहर खड़ा कर दिया जाता है फिर फीस के लिए मैडम कहती है । वह सबकुछ सुनते हुए मौन धारण किए रहा, उसे कोई उपाय नही सूझ रहा था ।
भगीरथ दो साल पहले ही अपने गाँव कानाखेड़ा से उरई पूरे परिवार सहित आ गया था । वह अनपढ़ था लेकिन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से रात दिन पति पत्नी मिलकर मजदूरी करते थे । सुबह राठ रोड पर पहुंच जाते जहाँ से कोई न कोई उन्हें ईट काम मे 350 रुपये मजदूरी पर ले जाते थे । बच्चों की पढ़ाई के साथ परिवार का भरण पोषण अच्छे से हो रहा था किंतु अचानक हुई नोटबन्दी से लोगों ने काम करवाना बन्द करवा दिया कभी कोई साहूकार काम करवाने के लिए मजदूर लेने आता तो कई मजदूर उसके पीछे पड़ जाते, जिससे औने पौने रुपये देकर जी भर काम लिया जाता, लेकिन नोटबन्दी के साथ बालू बंदी ने ईट गारे वाले मजदूरों की कमर तोड़ दी थी, जिससे उनके बच्चों की शिक्षा दीक्षा तो दूर खाने के लाले पड़ गए थे, उसी समस्या में आज भगीरथ का पूरा परिवार अभाव में जीने को मजबूर था ।
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