मान्यवर कांशीराम साहेब को 13 सितम्बर 2003 को जब ब्रेन स्ट्रोक हुआ तो उन्हें बत्रा हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया और 2003 के बाद वे सक्रिय राजनीति में नही आ पाए तथा बत्रा हॉस्पिटल में ही 09 अक्टूबर 2006 को उन्होंने अंतिम सांस ली । इन स्थितियों को देखकर जहन में एक प्रश्न कौंधता है कि मान्यवर साहेब की तबियत इतनी अधिक अस्वस्थ होने पर जहाँ बहिन जी को खाँसी, बुखार, ज़ुखाम हो जाने पर भी उन्होंने विदेश में इलाज करवाया है छोटे से छोटा नेता अलग-अलग डॉ0 को दिखवाता है सही इलाज न होने पर विदेश भी जाता है ऐसी स्थिति में मान्यवर कांशीराम साहेब को ऐसी कौन -सी बीमारी थी जिसका इलाज ही नही हो सकता था या उनके लिए विदेश से डॉक्टरों की टीम नही बुलाई जा सकती है ।
हो सकता है कुछ साथियों को मेरा प्रश्न यह वाज़िब न लगे लेकिन आज नही तो कल कोई न कोई शोध कर्ता यह प्रश्न उठाएगा क्योंकि जिस महापुरुष ने एक वैचारिक भूमि तैयार करके एक महल खड़ा किया देश-विदेश में बहुजन राजनीति की आवाज बुलंद हुई । डॉ आंबेडकर एक व्यक्ति विशेष न रहकर एक विचार के रूप में परिवर्तित हो गए । जिन्होंने बाबा साहेब के संविधान कि मूलभावना लोक तंत्र की वकालत की । उनके जाने के पश्चात लोकतंत्र पार्टी के अंदर मज़ाक बनकर रह गया । जिस ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरोध में पूरा का पूरा कारवाँ चला था 2007 के सत्ता में आने के पश्चात उसी का वर्चस्व पार्टी के अंदर कायम हो गया । सिद्धांत केवल थोथी कल्पना मात्र रह गयी । जिस चमचा युग की मान्यवर कांशीराम साहेब ने आलोचना की, वही घोर चमचा युग यहाँ प्रारम्भ हो गया . कार्यकर्ता की जगह अनजान पैसे वाले चेहरों को तबज्जो दी जाने लगी । मिशनरी कार्यकर्ताओं की जगह गुलाम मानसिकता के भक्त तैयार किए जाने लगे । देखते ही देखते एक बड़ा महल झोपड़ी में तब्दील हो गया । बुध्द के तर्कों की बात करने वाले पार्टी के लोगों से तर्क न करने की नसीहत देने लगे । ऐसा भयावह मंजर जिसमें अपनो के द्वारा अपने ही पीसे जाने लगे । बहुजन नाम केवल नाम तक ही सीमित रह गया । यह केवल चमार और ब्राह्मण जाति की संकुचित पार्टी बनकर रह गयी फिर भी लोग रोकते रहे कुछ मत लिखना भाई लोग नाराज हो जाएंगे आखिर नग्न नाच तुम करते रहो हम धूर्त बनकर देखते रहे । ऐसा न होगा जिसे तर्क यदि विरोधी लगे तो विरोधी समझे किन्तु इस विषय पर अब और नही रुक सकते हैं ।
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Monday, 9 October 2017
मान्यवर साहेब
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