.....प्रदीप कुमार गौतम
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Wednesday, 27 September 2017
बैंक का कर्ज (लघुकथा)
.....प्रदीप कुमार गौतम
Tuesday, 26 September 2017
नशाखोरी (लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम
सुकून (लघुकथा)
Monday, 25 September 2017
विद्रोह (लघुकथा)
.......प्रदीप कुमार गौतम
वह मन ही मन आग बबूला हुआ जा रहा था उसकी हालत खराब हो गयी थी आठ साल का बालक तीस साल के द्रोणाचार्य की गिरफ्त में था वह विद्रोह की मुद्रा में उससे छूटना चाहे रहा था जैसे ही मास्साब ने उसे छोड़ा उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गयी उसने सोच लिया था या तो पढ़ाई छूटेगी या इस मास्साब का सिर फूटेगा । छूटते ही वह स्कूल से बाहर की दौड़ा उसे एक अधुवा गुम्बा मिल गया आव देखा न ताव राजेन्द्र ने मास्साब के सिर पर गुम्बा दे मारा ।
Friday, 22 September 2017
स्थाई जॉब (लघुकथा)
स्थाई जॉब
(प्रदीप कुमार गौतम)
अब तो उसके दोस्त भी उसे निठल्ला समझने लगे थे, उसने कितने संघर्ष से पीएचडी में एडमिशन पाया था कितने लोग नाराज थे उसके पीएचडी करने के फैसले थे सब कहते का करोगे पीएचडी करके जब नौकरी ही नही है उसके साथ के सभी लड़के प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल में जॉब पा लिए थे लेकिन उसने उच्च शिक्षा में जाने का जो रास्ता चुन लिया था । इसीलिए उसके पिता भी अब रूठे से रहने लगे थे वह प्राइवेट जॉब भी करता किंतु स्थाई जॉब की तलाश में दर-दर भटकता था उसके जैसे पीएचडी धारी हजारो युवा पाँच-आठ हजार रुपये की नौकरी करने के लिए मजबूर थे ।
अन्ना प्रथा (लघुकथा)
अन्ना प्रथा
(प्रदीप कुमार गौतम)
इस साल गाड़ी मेहनत करके उसने खेतों में रबी की फसल बो दी । वह प्रत्येक साल की तरह विचार करता फसल अच्छी होगी तो पिछले साल की उधारी पट जाएगी, बीज भात के लिए कुछ दाना पानी रख लिया जाएगा ,घर में बैठी सयानी बिटिया कि शादी कर दी जाएगी । खेतों में चना के बुटो में गुलाबी रंग के फूल ऐसे लहलहा रहे थे जैसे कोई नवयुवती खिलखिला के हँस रही हो । इस बार की खेती में फसल अपने यौवन को धारण किए किसानों के हृदय में आकांक्षाओं को बड़ा रही थी । जानवरों के अन्ना होने की वजह से वह हर दिन घने अंधेरे में खेत की रखवारी करता वहीं लेटता और चाँदनी रात के चाँद को देखकर ख्यालों में डूब जाता कि बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई, पत्नी की धोती खरीदने के अनचाहे ख्वाब दौड़ने लगते थे, उसने न कभी गर्मी देखी न सर्दी बस खेतों की रात-दिन रखवाली की । एक दिन उसे साहड़ू की बिटिया की शादी में खेतों को छोड़कर जाना पड़ा । खेत को खाली पाकर दो सौ गायों के झुंड ने खेत को रात भर में खलिहान बना दिया, जब वह सुबह शादी से लौटकर खेतों पर गया तो सिर पकड़कर बैठ गया उसकी उम्मीदे धरी की धरी रह गई वह सोचने लगा कि मैं किसके नाम पर FIR करूँ आखिर कौन इन अन्ना जानवरों के लिए दोषी है ?
कुंडली (लघुकथा)
कुंडली
(प्रदीप कुमार गौतम)
लम्बी चोटी, बड़ा टीका, हाथ में कलावा बांधकर अपनी जाति को छुपकर वह मैडम का खास बनने का प्रयास करता रहता था । कुछ दिनों बाद RDC की तिथि घोषित हो गयी जिसके लिए वह सभी मूल कागज लेकर मैडम के घर पहुँचा । उन्होंने उसे बड़े आदर से सोफे पर बैठाया, चाय पिलाई तथा लड़की की कुंडली लेकर हरेन्द्र के सामने रख दी और बोली पंडित जी मेरी बिटिया की कुंडली देखकर बताओ इसका भविष्य कैसा होगा? वह चकरा गया मौन धारण करके मन में सोचने लगा ये मुझे ब्राह्मण समझ रही है । हलक से आवाज नही निकली गला रुंध गया । कुंडली सामने पड़ी थी मैडम जी बार-बार उसे देख रही थी । वह पसीना पसीना हुए जा रहा था वह पछता रहा था कि मैंने जाति क्यो छुपाई ।
वह शूद्र है (लघुकथा)
(प्रदीप कुमार गौतम)
वह शूद्र है
उसने मिश्रा जी से कहा सर आपको रामराज सर भोजन के लिए बुला रहे है । वे अचानक उखड़ गए एवं चीखते हुए बोले रामराज शूद्र हैं और मैं शूद्रों के साथ भोजन नही करता । यह सुनकर वह आवाक रह गया वह सोचने लगा कि रामराज सर तो ओबीसी है फिर इनसे इतनी जब इनसे इतनी घृणा तो मैं तो sc चमार हूँ मुझसे कितनी घृणा होगी इन्हें यह सोचते हुए वह करुणा में डूब गया ।
Wednesday, 20 September 2017
बड़े बाबू(लघुकथा)
लघुकथा
बड़े बाबू
(प्रदीप कुमार गौतम)
वह सुबह से ही तैयार होकर प्रसन्नचित्त मन से झाँसी के निकला रवाना हुआ, क्योंकि उसकी फाइल में अब कोई कमी नही थी । इसलिए उसे आज काम पूरा होने की उम्मीद थी, एक माह की भागदौड़ से राहत मिलने वाली थी । वह सोच रहा था कि आज काम पूरा हो जाएगा, तो पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करके होने वाली परीक्षाओं को पास किया जाए । वह झगड़े के मूड से हटकर सामंजस्य की स्थिति में नजर आ रहा है उससे घुस माँगी गई थी किंतु उसने कमियों को पूरा किया घुस बिल्कुल नही दी । उसकी बस जैसे ही विश्वविद्यालय के सामने रुकी वह उतरकर तुरन्त यूजीसी सेल पहुंचा तथा अपनी फाइल के संबंधित कागज तुरन्त बाबू को सौंप दिए । बाबू ने काम को टालना चाहा तो वह उसी की चेम्बर में डट कर बैठ गया । बाबू भी संबंधित कागजों की ड्राफ्टिंग करने लगा, पूरी फाइल तैयार होते-होते चार बज गए । इसके पश्चात बड़े बाबू के चेम्बर में फाइल पहुँची, किंतु बड़े बाबू गायब मिले । विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों में उसे खोजा गया, किंतु वह कहीं दिखाई नही दिया, छोटा बाबू भी खोजने लगा, लेकिन उसके दूर-दूर तक कहीं दर्शन नही हुए । फाइल को ज़बरन बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित कुलसचिव के ऑफिस भिजवाया गया, किंतु उन्होंने भी बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित फाइल में अपने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया । एक माह से भटकने के बाद भी आज फिर से उसकी फाइल डंप हो गयी । वह सोचने लगा कि योगी द्वारा सुबह 10 बजे से शाम 05 बजे के कार्यालयी आदेश के लतीफे केवल कागजी ही है, क्योंकि आज बड़े बाबू के समय से एक घंटे पहले चले जाने की वजह से फाइल फिर लटक गई । उसका धैर्य बेकाबू होकर कि अंगारा बनता जा रहा था पता नही किस दिन विस्फ़ोट हो जाए ?
धम्म-पथ
बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...
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प्रदीप कुमार,शोधार्थी, बी0 यू0, झाँसी ...
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भारतीय समाज मे आज केवल स्त्री ही नही बल्कि पुरुष भी प्रताड़ित है, इसका दायरा हो सकता है स्त्री से कम हो लेकिन पुरुष का भी मानसिक रूप से जमकर ...
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मेढ़क-मेढ़की(लघुकथा) ......प्रदीप कुमार गौतम जून का माह, भीषण गर्मी से लोग बेहाल, पसीने से लथपथ, अंगौछे से बार-बार मुँह पोछते लोगों के चे...