Wednesday, 27 September 2017

बैंक का कर्ज (लघुकथा)

बैंक का कर्ज(लघुकथा)
.....प्रदीप कुमार गौतम
एक समय उसका पूरे क्षेत्र में नाम था बीस कोस तक आसपास के सभी गाँव वाले जानते थे ससम्मान बुलाते , पंचायत निपटवाते थे तब उसकी पचास बीघे खेती में दो-दो सौ मन अनाज होता था, तीन-तीन गोई से खेती होती थी । खेतो में दस-बीस मजदूर सदैव काम करते रहते थे, लेकिन दस साल से पूरा बुंदेलखंड सूखे की चपेट में था आखिर जालौन जिले की उत्तर दिशा में मुख्यालय से पचपन कि0 मी0 दूर विकास के नाम पर बिजली पानी की सुविधा से वंचित बेतवा नदी के मुहाने में बसा कानाखेड़ा गाँव जहाँ आज भी अख़बार नसीब नही होता है सूखे से बुरी तरह प्रभावित था जहाँ से अधिकतर लोग भरण-पोषण हेतु नगरों की ओर पलायन कर गए है । ऐसी स्थिति में सूखे ने राजेन्द्र को बुरी तरह हताहत कर दिया उसका राजसी ठाटबाट खत्म हो गया था । बैलों से खेती बंद होने के कारण बैल अदर गए । बछड़ो का नस्ल से मतलब बन्द करने की वजह से गाय पालना भी लोगों ने बन्द कर दिया । जब राजेन्द्र के खेतों में घर के बैलों से खेतों की बखराई होती तो आसपास के खेतों वाले लोग गोईं को निहारने के लिए एकजुट हो जाते थे , लेकिन सूखे पड़ने की वजह से बैंक के कर्ज में वह डूब गया था खेतों में सालभर खाने के लिए गेंहूँ नही हो पाता था । ट्रैक्टर की बखराई बुवाई में पूरी फसल चली जाती, जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी ढेला भर की बचत नही हो पाती थी, जिसकी वजह से बैंक का कर्ज बढ़ता जा रहा था , बैंक से लगातार नोटिस आते थे, लेकिन वह असहाय होकर एक कोने में गुमसुम- सा बैठ जाता , उसके शरीर में मांस की जगह हड्डियों का ढांचा बचा था । दो-तीन बार कर्ज की वजह से पुलिस बीच गाँव से उठा के गई जीवन भर की जमा पूंजी सम्मान भी जाता रहा । हमेशा हँसने वाला राजेन्द्र आज दुनियादारी मतलब खत्म करके एकांत रहने लगा था । एकाध बार मैंने उसका हालचाल जानने का प्रयास किया तो उसने गर्दन हिलाकर ही प्रतिक्रिया दे दी , आखिर बैंक के कर्ज ने उसके स्वाभिमान को धूमिल कर दिया था ।

Tuesday, 26 September 2017

नशाखोरी (लघुकथा)

नशाखोरी( लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम
मैं मित्र मनीष के साथ स्टेशन पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे तभी मेरी नजर पाँच छः किशोरों पर पड़ी मटमैले कपड़े, चिपके गाल सूखे होंठ ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके शरीर से खून का प्रत्येक कतरा निकाल लिया हो आपस में लड़ते झगड़ते मैं उनकी प्रत्येक हरकत पर नज़र रखे हुए थे उनमें से एक लड़के ने एक बोतल निकाली दूसरे ने टायर को चिपकाने वाला सॉल्यूशन निकाला जिसे बोतल में डालकर पानी के साथ मथने लगे इसके बाद सभी ने छोटे से मटमैले कपड़े को उस पानी को भिगोकर सभी नाक में लगा लगाकर सूंघने लगे धीरे-धीरे वे सभी मदहोश हो गए मदहोशी में ही बड़े बच्चे छोटों को छेड़ने लगे कामुकता को जाग्रत करने लगे वे लेटे-लेटे मां-बहिन की गाली बके जा रहे थे मैंने मनीष से पूछा यह क्या है उसने बताया कि यह सॉल्यूशन का नशा है जो सबसे अधिक गंदा एवं बालकों में विकृति उतपन्न करने वाला है नशे एवं कामुकता से भरे वे युवा बेहाल थे  अभाव से भरा बचपन व्यक्ति को अपराध की ओर अग्रसर कर देता है और यही स्थिति इन बच्चों की थी । थोड़ी देर बाद जैसे ही ट्रेन आई, वे सभी ट्रेनों के अलग-अलग डिब्बो में अपनी अपनी झाड़ू लेजाकर झाड़ू लगाने लगे एवं नशे की जुगाड़ हेतु हाथ फैलाने लगे ।

सुकून (लघुकथा)

एक माह से भागदौड़ की वजह से पुस्तकालय के दर्शन नही किए थे पढ़ने का अभ्यास खत्म-सा हो गया, घर में कभी पुस्तकों को उठाकर पढ़ने का प्रयास करता, तो दो-चार पन्ने पढ़ने के बाद उसे नींद आ जाती थी जिससे वह तनाव में रहने लगा क्योंकि एग्जाम जितने पास में आ रहे थे उतना उसका दिमाग उलझनों में फंसता जा रहा था आज वह कॉलेज पढ़ाकर सीधे लाइब्रेरी पहुंच गया और कोई रोचक उपन्यास की तलाश करने लगा जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रेम की अभिव्यंजना हो पुस्तक खोजते-खोजते उसकी निगाह नागफनी के  आत्मकथाकार रूपनारायण सोनकर के उपन्यास दंश में पड़ी उसे दंश की भूमिका मालूम नही थी, लेकिन नागफनी में दिए विद्रोह के स्वर उसे दीवाना बना गए थे उसकी निगाहों में नागफनी विशिष्ट आत्मकथा थी , जो दलित समाज को संघर्ष करने की प्रेरणा प्रदान करती है ईट का जवाब पत्थर से देने के लिए उत्प्रेरित करती है । रूपनारायण सोनकर की जैसी आत्मकथा है वैसा ही रोचक उनका उपन्यास है वह पढ़ने बैठ गया लेकिन नींद की वजह से वह बार-बार आँखों मे पानी का छीटा मरता जैसे जैसे उपन्यास को पढ़ता गया उसका ध्यान एकाग्रचित्त होता चला गया उसे मालूम भी नही पड़ा कि कब लाइब्रेरी का समय पूरा हो गया उपन्यास उसके एग्जाम में सहायक नही था लेकिन उसे आत्म संतुष्टि थी कि उसने कुछ पढ़ाई की । लाइब्रेरी में उसे जितना सुकून मिलता था अन्य कहीं पर नही वहाँ वह अनचाहे भी विभिन्न पेपरों के आर्टिकल पढ़ जाता था , विविध जानकारियों के साथ सतत अध्ययन का अभ्यास उसके हृदय को सुकून देता था उत्साह से उसमें चेतना का संचार होता था , आज उसे बहुत ही सुकून प्राप्त हुआ

Monday, 25 September 2017

विद्रोह (लघुकथा)

विद्रोह(लघुकथा)
.......प्रदीप कुमार गौतम
मास्साब की आदतों में कोई सुधार नही आ रहा था वो रोज झाड़ू हाथ मे पकड़वा कर स्कूल साफ करवाते थे भला उन्हें मना कौन करे जो भी मना कर देता उसे बेरहमी से पीटते थे । हरिदास सिंह की पोस्टिंग चतेला के पास अपने गांव कानाखेड़ा में ही हो गयी थी घर में राजसी ठाटबाट ऊपर से ठाकुरैसी गांव में दम से चलती थी  । सुबह स्कूल में राजेंद्र को झाड़ू लगाने का आदेश दिया लेकिन उसने मना कर दिया जिससे उसने पास बुलाकर पेट की खाल तानते हुए बोला अबे चमरे ! तुम लोग पढ़ाई करोगे तो हमारी गाय कौन चरायेगा बक्खर कौन हकेगा ? जैसे जैसे वह खाल तानता था राजेंद्र ऊपर की ओर खड़ा हो जाता था
वह मन ही मन आग बबूला हुआ जा रहा था उसकी हालत खराब हो गयी थी आठ साल का बालक तीस साल के द्रोणाचार्य की गिरफ्त में था वह विद्रोह की मुद्रा में उससे छूटना चाहे रहा था  जैसे ही मास्साब ने उसे छोड़ा  उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गयी उसने सोच लिया था या तो पढ़ाई छूटेगी या इस मास्साब का सिर फूटेगा । छूटते ही वह स्कूल से बाहर की दौड़ा उसे एक अधुवा गुम्बा मिल गया आव देखा न ताव राजेन्द्र ने मास्साब के सिर पर गुम्बा दे मारा ।

Friday, 22 September 2017

स्थाई जॉब (लघुकथा)

लघुकथा
स्थाई जॉब
(प्रदीप कुमार गौतम)
  नौकरी  की चाहे में वह सब कुछ भूल  सा गया था , रिश्तेदार, मित्र, घर के लोग टोकते अम्मा  पूछती कब तक हिल्ला हो जैहै लला, तुम्हाई नौकरी कब लगहै , बऊ कहती  अब तो हमाई अँखियाँ तरस गई नातिन बहू खों देखन के लाने कित्ते नौनी लड़कियन के रिश्ता आत तुम हो तो हाँ नही करत । वह चुपचाप सुनता रहता बिना जवाब दिए घर से बाहर निकल जाता ।  वह पाँच साल से नौकरी के लिए प्रयासरत था किन्तु उच्च शिक्षा में कभी कभार वैकेंसी निकलती थी विश्वविद्यालयों में तो कई जगह फॉर्म भरे थे लेकिन कहीं से साक्षात्कार के लिए ही नही बुलाया गया प्राइवेट महाविद्यालय में पढ़ाते हुए उसे आठ हजार रुपये मिलते वे सभी फॉर्म खर्चे पर ही खर्च हो जाते थे उसे कहीं ठौर नही दिख रहा था हर फॉर्म के साथ उम्मीद बांधता कि इसमें कोई स्थायी जॉब मिल जाएगी ।
अब तो उसके दोस्त भी उसे निठल्ला समझने लगे थे, उसने कितने संघर्ष से पीएचडी में एडमिशन पाया था कितने लोग नाराज थे उसके पीएचडी करने के फैसले थे सब कहते का करोगे पीएचडी करके जब नौकरी ही नही है उसके साथ के सभी लड़के प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल में जॉब पा लिए थे  लेकिन उसने उच्च शिक्षा में जाने का जो रास्ता चुन लिया था । इसीलिए उसके पिता भी अब रूठे से रहने लगे थे वह प्राइवेट जॉब भी करता किंतु स्थाई जॉब की तलाश में दर-दर भटकता था उसके जैसे पीएचडी धारी हजारो युवा पाँच-आठ हजार रुपये की नौकरी करने के लिए मजबूर थे ।

अन्ना प्रथा (लघुकथा)

लघुकथा
  अन्ना प्रथा
(प्रदीप कुमार गौतम)
इस साल गाड़ी मेहनत करके उसने  खेतों में रबी की फसल बो दी । वह प्रत्येक साल की तरह विचार करता फसल अच्छी होगी तो पिछले साल की उधारी पट जाएगी, बीज भात के लिए कुछ दाना पानी रख लिया जाएगा ,घर में बैठी सयानी बिटिया कि शादी कर दी जाएगी । खेतों में चना के बुटो में गुलाबी रंग के फूल ऐसे लहलहा रहे थे जैसे कोई नवयुवती खिलखिला के हँस रही हो । इस बार की खेती में फसल अपने यौवन को धारण किए किसानों के हृदय में आकांक्षाओं को बड़ा रही थी । जानवरों के अन्ना होने की वजह से वह हर दिन घने अंधेरे में खेत की रखवारी करता वहीं लेटता और चाँदनी रात के चाँद को देखकर ख्यालों में डूब जाता कि बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई, पत्नी की धोती खरीदने के अनचाहे ख्वाब दौड़ने लगते थे, उसने न कभी गर्मी देखी न सर्दी बस खेतों की रात-दिन रखवाली की । एक दिन उसे साहड़ू की बिटिया की शादी में खेतों को छोड़कर जाना पड़ा । खेत को खाली पाकर दो सौ गायों के झुंड ने खेत को रात भर में खलिहान बना दिया, जब वह सुबह शादी से लौटकर खेतों पर गया तो सिर पकड़कर बैठ गया उसकी उम्मीदे धरी की धरी रह गई वह सोचने लगा कि मैं किसके नाम पर FIR करूँ आखिर कौन इन अन्ना जानवरों के लिए दोषी है ?

कुंडली (लघुकथा)

लघुकथा
       कुंडली
(प्रदीप कुमार गौतम)
लम्बी चोटी, बड़ा टीका, हाथ में कलावा बांधकर अपनी जाति को छुपकर वह मैडम का खास बनने का प्रयास करता रहता था । कुछ दिनों बाद RDC की तिथि घोषित हो गयी जिसके लिए वह सभी मूल कागज लेकर मैडम के घर पहुँचा । उन्होंने उसे बड़े आदर से  सोफे पर बैठाया, चाय पिलाई तथा लड़की की कुंडली लेकर हरेन्द्र के सामने रख दी और बोली पंडित जी मेरी बिटिया की कुंडली देखकर बताओ इसका भविष्य कैसा होगा?  वह चकरा गया  मौन धारण करके मन में सोचने लगा ये मुझे ब्राह्मण समझ रही है । हलक से आवाज नही निकली गला रुंध गया । कुंडली सामने पड़ी थी मैडम जी बार-बार उसे देख रही थी । वह पसीना पसीना हुए जा रहा था वह पछता रहा था कि मैंने जाति क्यो छुपाई ।

वह शूद्र है (लघुकथा)

लघुकथा
      (प्रदीप कुमार गौतम)
              वह शूद्र है
सभी प्राध्यापकों का प्रिय होने की वजह से आज एम0 ए0 की मौखिकी में परीक्षा सहयोग हेतु उसे भी बुला लिया गया । परीक्षा सम्पन्न होने के बाद रामराज सर ने उससे बोला कि जाओ भोजन हेतु मिश्रा सर को भी बुला लो ।
उसने मिश्रा जी से कहा सर आपको रामराज सर भोजन के लिए बुला रहे है । वे अचानक उखड़ गए एवं चीखते हुए बोले रामराज शूद्र हैं और मैं शूद्रों के साथ भोजन नही करता ।  यह सुनकर वह आवाक रह गया वह सोचने लगा कि रामराज सर तो ओबीसी है फिर इनसे इतनी जब इनसे इतनी घृणा तो मैं तो sc चमार हूँ मुझसे कितनी घृणा होगी इन्हें यह सोचते हुए वह करुणा में डूब गया ।

Wednesday, 20 September 2017

बड़े बाबू(लघुकथा)

लघुकथा
बड़े बाबू
(प्रदीप कुमार गौतम)
वह सुबह से ही तैयार होकर प्रसन्नचित्त मन से झाँसी के निकला रवाना हुआ, क्योंकि उसकी फाइल में अब कोई कमी नही थी । इसलिए उसे आज काम पूरा होने की उम्मीद थी, एक माह की भागदौड़ से राहत मिलने वाली थी । वह सोच रहा था कि आज काम पूरा हो जाएगा, तो पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करके होने वाली परीक्षाओं को पास किया जाए । वह झगड़े के मूड से हटकर सामंजस्य की स्थिति में नजर आ रहा है उससे घुस माँगी गई थी किंतु उसने कमियों को पूरा किया घुस बिल्कुल नही दी । उसकी बस जैसे ही विश्वविद्यालय के सामने रुकी वह उतरकर तुरन्त यूजीसी सेल पहुंचा तथा अपनी फाइल के संबंधित कागज तुरन्त बाबू को सौंप दिए । बाबू ने काम को टालना चाहा तो वह उसी की चेम्बर में डट कर बैठ गया । बाबू भी संबंधित कागजों की ड्राफ्टिंग करने लगा, पूरी फाइल तैयार होते-होते चार बज गए । इसके पश्चात बड़े बाबू के चेम्बर में फाइल पहुँची, किंतु बड़े बाबू गायब मिले । विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों में उसे खोजा गया, किंतु वह कहीं दिखाई नही दिया, छोटा बाबू भी खोजने लगा, लेकिन उसके दूर-दूर तक कहीं दर्शन नही हुए । फाइल को ज़बरन बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित कुलसचिव के ऑफिस भिजवाया गया, किंतु उन्होंने भी बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित फाइल में अपने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया । एक माह से भटकने के बाद भी आज फिर से उसकी फाइल डंप हो गयी । वह सोचने लगा कि योगी द्वारा सुबह 10  बजे से शाम 05 बजे के कार्यालयी आदेश के लतीफे केवल कागजी ही है, क्योंकि आज बड़े बाबू के समय से एक घंटे पहले चले जाने की वजह से फाइल  फिर लटक गई  ।  उसका धैर्य बेकाबू होकर कि अंगारा बनता जा रहा था पता नही किस दिन विस्फ़ोट हो जाए ?

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...