Tuesday, 26 September 2017

नशाखोरी (लघुकथा)

नशाखोरी( लघुकथा)
....प्रदीप कुमार गौतम
मैं मित्र मनीष के साथ स्टेशन पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे तभी मेरी नजर पाँच छः किशोरों पर पड़ी मटमैले कपड़े, चिपके गाल सूखे होंठ ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके शरीर से खून का प्रत्येक कतरा निकाल लिया हो आपस में लड़ते झगड़ते मैं उनकी प्रत्येक हरकत पर नज़र रखे हुए थे उनमें से एक लड़के ने एक बोतल निकाली दूसरे ने टायर को चिपकाने वाला सॉल्यूशन निकाला जिसे बोतल में डालकर पानी के साथ मथने लगे इसके बाद सभी ने छोटे से मटमैले कपड़े को उस पानी को भिगोकर सभी नाक में लगा लगाकर सूंघने लगे धीरे-धीरे वे सभी मदहोश हो गए मदहोशी में ही बड़े बच्चे छोटों को छेड़ने लगे कामुकता को जाग्रत करने लगे वे लेटे-लेटे मां-बहिन की गाली बके जा रहे थे मैंने मनीष से पूछा यह क्या है उसने बताया कि यह सॉल्यूशन का नशा है जो सबसे अधिक गंदा एवं बालकों में विकृति उतपन्न करने वाला है नशे एवं कामुकता से भरे वे युवा बेहाल थे  अभाव से भरा बचपन व्यक्ति को अपराध की ओर अग्रसर कर देता है और यही स्थिति इन बच्चों की थी । थोड़ी देर बाद जैसे ही ट्रेन आई, वे सभी ट्रेनों के अलग-अलग डिब्बो में अपनी अपनी झाड़ू लेजाकर झाड़ू लगाने लगे एवं नशे की जुगाड़ हेतु हाथ फैलाने लगे ।

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