Monday, 25 September 2017

विद्रोह (लघुकथा)

विद्रोह(लघुकथा)
.......प्रदीप कुमार गौतम
मास्साब की आदतों में कोई सुधार नही आ रहा था वो रोज झाड़ू हाथ मे पकड़वा कर स्कूल साफ करवाते थे भला उन्हें मना कौन करे जो भी मना कर देता उसे बेरहमी से पीटते थे । हरिदास सिंह की पोस्टिंग चतेला के पास अपने गांव कानाखेड़ा में ही हो गयी थी घर में राजसी ठाटबाट ऊपर से ठाकुरैसी गांव में दम से चलती थी  । सुबह स्कूल में राजेंद्र को झाड़ू लगाने का आदेश दिया लेकिन उसने मना कर दिया जिससे उसने पास बुलाकर पेट की खाल तानते हुए बोला अबे चमरे ! तुम लोग पढ़ाई करोगे तो हमारी गाय कौन चरायेगा बक्खर कौन हकेगा ? जैसे जैसे वह खाल तानता था राजेंद्र ऊपर की ओर खड़ा हो जाता था
वह मन ही मन आग बबूला हुआ जा रहा था उसकी हालत खराब हो गयी थी आठ साल का बालक तीस साल के द्रोणाचार्य की गिरफ्त में था वह विद्रोह की मुद्रा में उससे छूटना चाहे रहा था  जैसे ही मास्साब ने उसे छोड़ा  उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गयी उसने सोच लिया था या तो पढ़ाई छूटेगी या इस मास्साब का सिर फूटेगा । छूटते ही वह स्कूल से बाहर की दौड़ा उसे एक अधुवा गुम्बा मिल गया आव देखा न ताव राजेन्द्र ने मास्साब के सिर पर गुम्बा दे मारा ।

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