एक माह से भागदौड़ की वजह से पुस्तकालय के दर्शन नही किए थे पढ़ने का अभ्यास खत्म-सा हो गया, घर में कभी पुस्तकों को उठाकर पढ़ने का प्रयास करता, तो दो-चार पन्ने पढ़ने के बाद उसे नींद आ जाती थी जिससे वह तनाव में रहने लगा क्योंकि एग्जाम जितने पास में आ रहे थे उतना उसका दिमाग उलझनों में फंसता जा रहा था आज वह कॉलेज पढ़ाकर सीधे लाइब्रेरी पहुंच गया और कोई रोचक उपन्यास की तलाश करने लगा जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रेम की अभिव्यंजना हो पुस्तक खोजते-खोजते उसकी निगाह नागफनी के आत्मकथाकार रूपनारायण सोनकर के उपन्यास दंश में पड़ी उसे दंश की भूमिका मालूम नही थी, लेकिन नागफनी में दिए विद्रोह के स्वर उसे दीवाना बना गए थे उसकी निगाहों में नागफनी विशिष्ट आत्मकथा थी , जो दलित समाज को संघर्ष करने की प्रेरणा प्रदान करती है ईट का जवाब पत्थर से देने के लिए उत्प्रेरित करती है । रूपनारायण सोनकर की जैसी आत्मकथा है वैसा ही रोचक उनका उपन्यास है वह पढ़ने बैठ गया लेकिन नींद की वजह से वह बार-बार आँखों मे पानी का छीटा मरता जैसे जैसे उपन्यास को पढ़ता गया उसका ध्यान एकाग्रचित्त होता चला गया उसे मालूम भी नही पड़ा कि कब लाइब्रेरी का समय पूरा हो गया उपन्यास उसके एग्जाम में सहायक नही था लेकिन उसे आत्म संतुष्टि थी कि उसने कुछ पढ़ाई की । लाइब्रेरी में उसे जितना सुकून मिलता था अन्य कहीं पर नही वहाँ वह अनचाहे भी विभिन्न पेपरों के आर्टिकल पढ़ जाता था , विविध जानकारियों के साथ सतत अध्ययन का अभ्यास उसके हृदय को सुकून देता था उत्साह से उसमें चेतना का संचार होता था , आज उसे बहुत ही सुकून प्राप्त हुआ
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Tuesday, 26 September 2017
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
धम्म-पथ
बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...
-
प्रदीप कुमार,शोधार्थी, बी0 यू0, झाँसी ...
-
भारतीय समाज मे आज केवल स्त्री ही नही बल्कि पुरुष भी प्रताड़ित है, इसका दायरा हो सकता है स्त्री से कम हो लेकिन पुरुष का भी मानसिक रूप से जमकर ...
-
मेढ़क-मेढ़की(लघुकथा) ......प्रदीप कुमार गौतम जून का माह, भीषण गर्मी से लोग बेहाल, पसीने से लथपथ, अंगौछे से बार-बार मुँह पोछते लोगों के चे...
No comments:
Post a Comment