बैंक का कर्ज(लघुकथा)
.....प्रदीप कुमार गौतम
.....प्रदीप कुमार गौतम
एक समय उसका पूरे क्षेत्र में नाम था बीस कोस तक आसपास के सभी गाँव वाले जानते थे ससम्मान बुलाते , पंचायत निपटवाते थे तब उसकी पचास बीघे खेती में दो-दो सौ मन अनाज होता था, तीन-तीन गोई से खेती होती थी । खेतो में दस-बीस मजदूर सदैव काम करते रहते थे, लेकिन दस साल से पूरा बुंदेलखंड सूखे की चपेट में था आखिर जालौन जिले की उत्तर दिशा में मुख्यालय से पचपन कि0 मी0 दूर विकास के नाम पर बिजली पानी की सुविधा से वंचित बेतवा नदी के मुहाने में बसा कानाखेड़ा गाँव जहाँ आज भी अख़बार नसीब नही होता है सूखे से बुरी तरह प्रभावित था जहाँ से अधिकतर लोग भरण-पोषण हेतु नगरों की ओर पलायन कर गए है । ऐसी स्थिति में सूखे ने राजेन्द्र को बुरी तरह हताहत कर दिया उसका राजसी ठाटबाट खत्म हो गया था । बैलों से खेती बंद होने के कारण बैल अदर गए । बछड़ो का नस्ल से मतलब बन्द करने की वजह से गाय पालना भी लोगों ने बन्द कर दिया । जब राजेन्द्र के खेतों में घर के बैलों से खेतों की बखराई होती तो आसपास के खेतों वाले लोग गोईं को निहारने के लिए एकजुट हो जाते थे , लेकिन सूखे पड़ने की वजह से बैंक के कर्ज में वह डूब गया था खेतों में सालभर खाने के लिए गेंहूँ नही हो पाता था । ट्रैक्टर की बखराई बुवाई में पूरी फसल चली जाती, जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी ढेला भर की बचत नही हो पाती थी, जिसकी वजह से बैंक का कर्ज बढ़ता जा रहा था , बैंक से लगातार नोटिस आते थे, लेकिन वह असहाय होकर एक कोने में गुमसुम- सा बैठ जाता , उसके शरीर में मांस की जगह हड्डियों का ढांचा बचा था । दो-तीन बार कर्ज की वजह से पुलिस बीच गाँव से उठा के गई जीवन भर की जमा पूंजी सम्मान भी जाता रहा । हमेशा हँसने वाला राजेन्द्र आज दुनियादारी मतलब खत्म करके एकांत रहने लगा था । एकाध बार मैंने उसका हालचाल जानने का प्रयास किया तो उसने गर्दन हिलाकर ही प्रतिक्रिया दे दी , आखिर बैंक के कर्ज ने उसके स्वाभिमान को धूमिल कर दिया था ।
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