Friday, 22 September 2017

कुंडली (लघुकथा)

लघुकथा
       कुंडली
(प्रदीप कुमार गौतम)
लम्बी चोटी, बड़ा टीका, हाथ में कलावा बांधकर अपनी जाति को छुपकर वह मैडम का खास बनने का प्रयास करता रहता था । कुछ दिनों बाद RDC की तिथि घोषित हो गयी जिसके लिए वह सभी मूल कागज लेकर मैडम के घर पहुँचा । उन्होंने उसे बड़े आदर से  सोफे पर बैठाया, चाय पिलाई तथा लड़की की कुंडली लेकर हरेन्द्र के सामने रख दी और बोली पंडित जी मेरी बिटिया की कुंडली देखकर बताओ इसका भविष्य कैसा होगा?  वह चकरा गया  मौन धारण करके मन में सोचने लगा ये मुझे ब्राह्मण समझ रही है । हलक से आवाज नही निकली गला रुंध गया । कुंडली सामने पड़ी थी मैडम जी बार-बार उसे देख रही थी । वह पसीना पसीना हुए जा रहा था वह पछता रहा था कि मैंने जाति क्यो छुपाई ।

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