Sunday, 28 December 2025

धम्म-पथ


बुद्ध ने कहा—
जीवन दुःख है,
पर यह अंतिम सत्य नहीं,
क्योंकि दुःख-निरोध भी है।
तृष्णा से बँधा मन
बार-बार जन्म लेता है,
और सम्यक दृष्टि
उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।
न हिंसा में धम्म है,
न लोभ में शांति,
करुणा और मैत्री
ही आर्य जीवन की पहचान हैं।
जो शील को आधार बनाए,
समाधि में मन को स्थिर करे,
और प्रज्ञा से सत्य देखे—
वही अष्टांगिक मार्ग का यात्री है।
बुद्ध ने ईश्वर नहीं दिया,
उन्होंने स्वावलंबन दिया,
कहा—
“अप्प दीपो भव”
अपने दीपक स्वयं बनो।
जब अविद्या क्षीण होती है,
और चेतना निर्मल होती है,
तब मन
निर्वाण की शीतल छाया में
विश्राम करता है।

बुद्ध की राह


उन्होंने कहा—
दुःख है,
पर उससे भागो मत,
उसे समझो।
उन्होंने कहा—
ईश्वर बाहर नहीं,
मन के भीतर है,
जहाँ लालच शांत हो
और करुणा जागे।
न उन्होंने तलवार उठाई,
न सिंहासन चाहा,
उन्होंने मनुष्य को
मनुष्य होना सिखाया।
जहाँ क्रोध था,
वहाँ मौन रखा,
जहाँ अंधविश्वास था,
वहाँ प्रश्न खड़ा किया।
बुद्ध ने कहा—
न किसी से घृणा करो,
न किसी पर अधिकार,
क्योंकि बंधन
दूसरों से नहीं,
अपनी इच्छाओं से बनते हैं।
आज भी जब
हिंसा थक जाती है,
और संसार
शांति ढूँढता है,
तो बुद्ध की दृष्टि
मनुष्य को
स्वयं से मिलने का
रास्ता दिखाती है।
©डॉ प्रदीप कुमार 

आज का दिन

आज का दिन
कल से बेहतर होगा—
बस यही विश्वास
कदमों को आगे बढ़ाता है।
थकान है तो क्या,
सपने अब भी जागे हैं,
जो हार से सीख लेता है,
वही सबसे आगे है।
अंधेरा चाहे जितना गहरा हो,
एक दीपक काफी होता है,
खुद पर भरोसा रखने वाला
कभी अकेला नहीं होता है।
चलो, आज फिर
खुद से वादा करें—
रुकेंगे नहीं,
हारेंगे नहीं,
मुस्कान के साथ
आगे बढ़ेंगे।

मान्यवर कांशीराम


एक व्यक्ति नहीं,
एक विचार चले थे वे—
जो चुप्पी को
राजनीति की सबसे बड़ी बीमारी मानते थे।
सरकारी नौकरी छोड़कर
उन्होंने आराम नहीं चुना,
उन्होंने चुना
बहुजन की पीड़ा का रास्ता—
कठिन, पर ज़रूरी।
न मंच की चमक चाहिए थी,
न तात्कालिक जयकार,
वे जानते थे—
चेतना बोई जाती है,
फसल समय लेती है।
उन्होंने कहा—
“जिसकी जितनी संख्या भारी,
उसकी उतनी हिस्सेदारी”—
यह नारा नहीं था,
यह सदियों का हिसाब था।
कांशीराम ने
नेता नहीं गढ़े पहले,
उन्होंने समाज को
खुद का नेता बनाया।
वे जानते थे—
भीख से नहीं,
सत्ता से बदलाव आता है,
इसलिए उन्होंने
वोट को हथियार बनाया,
और संगठन को ढाल।
अकेले रहे,
पर अकेले नहीं थे—
उनके साथ
एक जागता हुआ बहुजन समाज था।
आज भी जब
कोई दबा हुआ
सीधे खड़ा होता है,
तो समझो—
कांशीराम
अब भी चल रहे हैं।
©डॉ प्रदीप कुमार 

बेरोज़गारी


उपाधियों से अलंकृत
युवक आज
अवसर-विहीन पथ पर
निःशब्द खड़ा है।
हस्ताक्षरित प्रमाण-पत्र
उसके हाथों में हैं,
पर श्रम के लिए
कोई द्वार उद्घाटित नहीं।
ज्ञान है,
कौशल है,
संभावनाएँ हैं—
किन्तु व्यवस्था
संवेदनाहीन है।
प्रतिस्पर्धा की इस भीषण
अरण्य-यात्रा में
योग्यता
जाति, वर्ग और सिफ़ारिश
के नीचे दबी पड़ी है।
नियुक्ति के स्वप्न
प्रतिदिन
विलुप्त होते जाते हैं,
और आत्मसम्मान
धीरे-धीरे
अवसाद में परिवर्तित हो जाता है।
माता-पिता की
आकांक्षाएँ
मौन हो जाती हैं,
और युवा
स्वयं से प्रश्न करता है—
क्या शिक्षित होना
अपराध है?
यह केवल
रोज़गार का संकट नहीं,
यह एक
पीढ़ी के स्वाभिमान का
क्षरण है।
जब तक श्रम को
गरिमा नहीं मिलेगी,
और नीति में
न्याय नहीं आएगा,
तब तक
बेरोज़गारी
राष्ट्र का
मौन विद्रोह बनी रहेगी।
©डॉ प्रदीप कुमार 

बाबा साहब ने कहा

बाबा ने कहा था—
शिक्षित बनो,
क्योंकि अज्ञान
सबसे गहरी गुलामी है।
उन्होंने कहा—
संगठित रहो,
क्योंकि बिखरी हुई भीड़
इतिहास नहीं रचती।
और फिर उन्होंने जोड़ा—
संघर्ष करो,
क्योंकि अधिकार
माँगे नहीं जाते,
जीते जाते हैं।
बाबा साहेब ने
भगवान से पहले
संविधान दिया,
और आस्था से पहले
विवेक।
उन्होंने सिखाया—
मनुष्य बड़ा
जन्म से नहीं,
कर्म और चेतना से होता है।
जहाँ बराबरी नहीं,
वहाँ धर्म नहीं—
यह उनका
सबसे क्रांतिकारी विचार था।
आज भी जब
कोई झुकी गर्दन उठती है,
कोई दबा हुआ
बोलने लगता है,
तो समझो—
बाबा साहेब
ज़िंदा हैं।
©डॉ प्रदीप कुमार 

आक्रोश

यह चुप्पी अब सहमति नहीं,
यह धैर्य नहीं—
सदियों से जमा किया गया
गुस्सा है।
हमसे कहा गया—
सब्र रखो,
समय बदलेगा।
पर समय बदला,
हमारी जगह नहीं।
हमारे पसीने से
महल खड़े हुए,
और हमें बताया गया—
यह व्यवस्था है।
जब सवाल उठाया
तो कहा गया—
शोर मत करो।
पर इतिहास बताता है,
हर बदलाव
शोर से ही जन्मा है।
यह आक्रोश
हिंसा नहीं माँगता,
यह सम्मान चाहता है।
यह तो बस इतना कहता है—
अब और नहीं।
अब आवाज़ दबेगी नहीं,
अब सच झुकेगा नहीं,
क्योंकि
जब चेतना जागती है,
तो व्यवस्था काँपती है।
© डॉ प्रदीप कुमार 

सुबह


सूरज ने फिर से
हौसले को आवाज़ दी है,
अंधेरे की आदतों पर
आज सुबह भारी है।
कल की थकान
ओस बनकर उतर गई,
नई उम्मीद की धूप
मन के आँगन में फैल गई।
चलो, आज फिर
खुद पर विश्वास रखें,
क्योंकि हर सुबह
एक नया अवसर लेकर आती है।
मुस्कान पहन लो,
सोच को उजला करो,
आज का दिन कह रहा है—
तुम कर सकते हो।
©डॉ प्रदीप कुमार 

भगवान बुद्ध

राजमहल छोड़कर
जो वन पथ पर चला,
वह त्याग नहीं था—
वह मानवता की खोज थी।
न तलवार उठाई,
न सिंहासन माँगा,
उसने बस कहा—
दुःख है, और दुःख का मार्ग भी है।
जहाँ क्रोध बोला,
वहाँ करुणा उतरी,
जहाँ अंधविश्वास था,
वहाँ विवेक जगा।
उसकी चुप्पी
सबसे ऊँचा उपदेश बनी,
और करुणा
सबसे बड़ा विद्रोह।
बुद्ध ने ईश्वर नहीं दिया,
उसने मनुष्य दिया—
सोचता हुआ,
जिम्मेदार
और मुक्त।
आज भी जब दुनिया
हिंसा से थक जाती है,
तो बुद्ध की आँखों में
शांति आज भी साँस लेती है।
©डॉ प्रदीप कुमार 

दलित की वर्तमान दशा


दलित आज भी
कतार में खड़ा है,
पर कतार आगे नहीं बढ़ती—
सिर्फ़ चेहरे बदल जाते हैं।
संविधान हाथ में है,
पर हक़ अब भी जेब में नहीं,
काग़ज़ों में बराबरी है,
ज़मीन पर अब भी दूरी है।
स्कूल तक तो पहुँच गया वह,
पर किताबें अब भी
उससे पूछती हैं—
तुम्हारी जाति क्या है?
मेहनत उसकी योग्यता नहीं बनती,
योग्यता उसकी जाति में अटक जाती है,
और हर सफलता के बाद
उससे पूछा जाता है—
कोटा था या क़ाबिलियत?
शहर में नाम बदल लेता है वह,
गाँव में पहचान छुपा लेता है,
क्योंकि आज भी
कुछ दरवाज़े
नाम पढ़कर बंद होते हैं।
फिर भी वह चलता है—
जलते पाँव, झुकी पीठ
और सीधी सोच के साथ,
क्योंकि उसने सीख लिया है
कि रुकना
सबसे बड़ा अपराध है।
दलित की यह सिर्फ़ दशा नहीं,
यह एक संघर्षशील यात्रा है—
जो दया नहीं,
सम्मान चाहती है।
©डॉ प्रदीप कुमार 

वैचारिक कविता


हमने सवाल पूछना
असभ्यता मान लिया,
और जवाब न देने वालों को
महान कह दिया।
जहाँ सोचने से पहले
डर सिखाया जाता है,
वहीं आज्ञाकारिता को
चरित्र का नाम दिया जाता है।
किताबें खोलने से ज़्यादा
कई लोग आँखें बंद रखना चाहते हैं,
क्योंकि जागी हुई चेतना
सबसे बड़ा खतरा होती है।
सच बोलना अब शोर कहलाता है,
और चुप्पी को समझदारी कहा जाता है,
पर इतिहास गवाह है—
हर बदलाव
किसी एक की आवाज़ से ही शुरू होता है।
इसलिए मत पूछो
तुम अकेले क्या कर लोगे,
पूछो—अगर तुम भी चुप रहे
तो कल कौन बोलेगा?
©डॉ प्रदीप कुमार 

उजाला अभी बांकी है ।

थक कर बैठ जाना मंज़िल नहीं होती,
रुक जाना ज़िंदगी की तर्ज़ नहीं होती।
हर रात के बाद सवेरा आता है,
बस यही उम्मीद हर सुबह जगाता है।
जो टूटा है, वही मजबूत बनेगा,
जो गिरा है, वही आगे बढ़ेगा।
काँटों से डर कर जो मुड़ गया,
वह फूलों की खुशबू क्या जानेगा?
अपने भीतर के डर से बात करो,
उसे समझाओ—मैं हार नहीं मानूँगा।
कदम भले छोटे हों आज मगर,
कल यही रास्ता इतिहास बनेगा।
अंधेरे से लड़ने की ज़िद रखो,
एक दीपक भी सूरज बन जाता है।
विश्वास रखो अपने सपनों पर,
क्योंकि सोच से ही भविष्य रच जाता है।
©डॉ प्रदीप कुमार 

किताबें

किताबें 
चेतना हैं
चिंतन हैं 
मन के उलझनों का 
सुलझन हैं । 
© प्रदीप कुमार 

अब भी समय है


मत कहो कि उम्र ढल गई,
मत कहो कि मौका निकल गया,
जो साँस अभी चल रही है भीतर,
समझो—जीवन ने फिर पुकारा है।
हर हार एक सबक लिख गई,
हर आँसू कुछ सिखा गया,
जो टूटा था, वह कमजोर नहीं,
वह बस अगली उड़ान की तैयारी में था।
भीड़ बहुत है इस दुनिया में,
पर दिशा बहुत कम के पास है,
जो खुद से लड़ना सीख गया,
वही असली इतिहास रचता है।
मत ढूँढो ताली हर कदम पर,
खामोशी भी इंकलाब है,
जो चुपचाप रोज़ बेहतर बने,
वही सबसे बड़ा जवाब है।
अगर डर रास्ता रोक ले आज,
तो उससे आँख मिला कर कहना—
मैं गिरा हूँ, हारा नहीं,
और अब भी समय है…
खुद को जीतने का।
© डॉ प्रदीप कुमार

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...