Sunday, 28 December 2025

उजाला अभी बांकी है ।

थक कर बैठ जाना मंज़िल नहीं होती,
रुक जाना ज़िंदगी की तर्ज़ नहीं होती।
हर रात के बाद सवेरा आता है,
बस यही उम्मीद हर सुबह जगाता है।
जो टूटा है, वही मजबूत बनेगा,
जो गिरा है, वही आगे बढ़ेगा।
काँटों से डर कर जो मुड़ गया,
वह फूलों की खुशबू क्या जानेगा?
अपने भीतर के डर से बात करो,
उसे समझाओ—मैं हार नहीं मानूँगा।
कदम भले छोटे हों आज मगर,
कल यही रास्ता इतिहास बनेगा।
अंधेरे से लड़ने की ज़िद रखो,
एक दीपक भी सूरज बन जाता है।
विश्वास रखो अपने सपनों पर,
क्योंकि सोच से ही भविष्य रच जाता है।
©डॉ प्रदीप कुमार 

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