Sunday, 28 December 2025

बेरोज़गारी


उपाधियों से अलंकृत
युवक आज
अवसर-विहीन पथ पर
निःशब्द खड़ा है।
हस्ताक्षरित प्रमाण-पत्र
उसके हाथों में हैं,
पर श्रम के लिए
कोई द्वार उद्घाटित नहीं।
ज्ञान है,
कौशल है,
संभावनाएँ हैं—
किन्तु व्यवस्था
संवेदनाहीन है।
प्रतिस्पर्धा की इस भीषण
अरण्य-यात्रा में
योग्यता
जाति, वर्ग और सिफ़ारिश
के नीचे दबी पड़ी है।
नियुक्ति के स्वप्न
प्रतिदिन
विलुप्त होते जाते हैं,
और आत्मसम्मान
धीरे-धीरे
अवसाद में परिवर्तित हो जाता है।
माता-पिता की
आकांक्षाएँ
मौन हो जाती हैं,
और युवा
स्वयं से प्रश्न करता है—
क्या शिक्षित होना
अपराध है?
यह केवल
रोज़गार का संकट नहीं,
यह एक
पीढ़ी के स्वाभिमान का
क्षरण है।
जब तक श्रम को
गरिमा नहीं मिलेगी,
और नीति में
न्याय नहीं आएगा,
तब तक
बेरोज़गारी
राष्ट्र का
मौन विद्रोह बनी रहेगी।
©डॉ प्रदीप कुमार 

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