Sunday, 28 December 2025

मान्यवर कांशीराम


एक व्यक्ति नहीं,
एक विचार चले थे वे—
जो चुप्पी को
राजनीति की सबसे बड़ी बीमारी मानते थे।
सरकारी नौकरी छोड़कर
उन्होंने आराम नहीं चुना,
उन्होंने चुना
बहुजन की पीड़ा का रास्ता—
कठिन, पर ज़रूरी।
न मंच की चमक चाहिए थी,
न तात्कालिक जयकार,
वे जानते थे—
चेतना बोई जाती है,
फसल समय लेती है।
उन्होंने कहा—
“जिसकी जितनी संख्या भारी,
उसकी उतनी हिस्सेदारी”—
यह नारा नहीं था,
यह सदियों का हिसाब था।
कांशीराम ने
नेता नहीं गढ़े पहले,
उन्होंने समाज को
खुद का नेता बनाया।
वे जानते थे—
भीख से नहीं,
सत्ता से बदलाव आता है,
इसलिए उन्होंने
वोट को हथियार बनाया,
और संगठन को ढाल।
अकेले रहे,
पर अकेले नहीं थे—
उनके साथ
एक जागता हुआ बहुजन समाज था।
आज भी जब
कोई दबा हुआ
सीधे खड़ा होता है,
तो समझो—
कांशीराम
अब भी चल रहे हैं।
©डॉ प्रदीप कुमार 

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