दलित आज भी
कतार में खड़ा है,
पर कतार आगे नहीं बढ़ती—
सिर्फ़ चेहरे बदल जाते हैं।
संविधान हाथ में है,
पर हक़ अब भी जेब में नहीं,
काग़ज़ों में बराबरी है,
ज़मीन पर अब भी दूरी है।
स्कूल तक तो पहुँच गया वह,
पर किताबें अब भी
उससे पूछती हैं—
तुम्हारी जाति क्या है?
मेहनत उसकी योग्यता नहीं बनती,
योग्यता उसकी जाति में अटक जाती है,
और हर सफलता के बाद
उससे पूछा जाता है—
कोटा था या क़ाबिलियत?
शहर में नाम बदल लेता है वह,
गाँव में पहचान छुपा लेता है,
क्योंकि आज भी
कुछ दरवाज़े
नाम पढ़कर बंद होते हैं।
फिर भी वह चलता है—
जलते पाँव, झुकी पीठ
और सीधी सोच के साथ,
क्योंकि उसने सीख लिया है
कि रुकना
सबसे बड़ा अपराध है।
दलित की यह सिर्फ़ दशा नहीं,
यह एक संघर्षशील यात्रा है—
जो दया नहीं,
सम्मान चाहती है।
©डॉ प्रदीप कुमार
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