Sunday, 28 December 2025

वैचारिक कविता


हमने सवाल पूछना
असभ्यता मान लिया,
और जवाब न देने वालों को
महान कह दिया।
जहाँ सोचने से पहले
डर सिखाया जाता है,
वहीं आज्ञाकारिता को
चरित्र का नाम दिया जाता है।
किताबें खोलने से ज़्यादा
कई लोग आँखें बंद रखना चाहते हैं,
क्योंकि जागी हुई चेतना
सबसे बड़ा खतरा होती है।
सच बोलना अब शोर कहलाता है,
और चुप्पी को समझदारी कहा जाता है,
पर इतिहास गवाह है—
हर बदलाव
किसी एक की आवाज़ से ही शुरू होता है।
इसलिए मत पूछो
तुम अकेले क्या कर लोगे,
पूछो—अगर तुम भी चुप रहे
तो कल कौन बोलेगा?
©डॉ प्रदीप कुमार 

No comments:

Post a Comment

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...