Friday, 27 January 2017

मैत्रेयी पुष्पा कृत इदन्नमम उपन्यास के सामाजिक सरोकार


                                                                                         प्रदीप कुमार,शोधार्थी, बी0 यू0, झाँसी

                इदन्नमम मूलतः स्त्री की समस्याओं को चलने वाला प्रमुख उपन्यास है, जिसमें मैत्रेयी पुष्पा जी ने बुन्दली धरती का चयन किया है और यहाँ की समस्याओं से सम्पूर्ण भारतीय जनमानस को परिचित कराया है। बुन्देली संस्कृति सभ्यता को लेकर चलने वाला यह उपन्यास समाजिक पहेलुओं शिक्षा, परिवार, विवाह, दहेज आदि को केन्द्र में रखकर जहाँ प्याप्त बुराइयों को उजागर कर चेतना को झकझोरता है, तो वहीं मान सम्मान की रक्षा करने वाले पात्रों का सृजन कर ह्नदय में स्थिरता प्रदान करता है। यह उपन्यास मूलतः तीन स्त्रियों के जीवन को लेकर केन्द्रित है, जिसमें मन्दा (पुत्री) प्रेम (माँ) बऊ (दादी) प्रमुख है। इस सन्दर्भ में इदन्नमम की भूमिका में राजेन्द्र यादव जी कहते है-ष्ष् बऊ (दादी) प्रेम (माँ) और मन्दा,,, तीन पीडि़तों की बेहद सहज कहानी तीनों को समान्तर भी रखती है और एक एक दूसरे के विरूद्व भी।श् 1
वर्तमान समय में भारतीय समाज के परिवार पूरी तरह से बिखर रहे हैं। संयुक्त परिवारों का स्थान अब एकाकी परिवारों ने ले लिया है। इदन्नमम उपन्यास में एकाकी परिवार की झलक अधिक देखाई देती है, केवल पंचम सिंह (दादा) का परिवार एक संयुक्तता की प्रतिमूर्ति है, लेकिन जैसे-जैसे उपन्यास की कथा आगे बढती है,  वैसे ही उनके परिवार में भी द्वेष, ईर्ष्या, स्पष्ट दिखाई देती है। सोनपुरा की रहने वाली बऊ और मन्दाकनी जब श्यामली गाँव के दादा (पंचम सिंह) के घर रहने लगती हैं, तो कका जू (गोविन्द सिंह) दादा का प्रत्यक्ष विरोध करते हुए कहते है-ष्ष् जे डुकरो अपने घर की व्यथा इस गांव मे ले आई। कहीं होता है ऐसा कि किसी के हक के लिये कोई दूसरा अपना मूड़ चिराएं।
अभी कुछ नही बिगड़ा दादा, तुम समझा-बुझाकर लौटा सकते हो इन्हे सोनपुरा।श् 2
गोविन्द सिंह (कका जू) धन के बहुत लालची हैं, वे हर काम को दाम पर तौलते है। जबकि पंचम सिंह (दादा) जी पूरी तरह से ईमानदार समाजिक व्यक्ति है। गोविन्द सिह बऊ की सारी सम्पत्ति बेचकर सारा धन स्वयं के पास रख लेता है। इसी अनैतिकता के पनपने दादा जू और काका जू के मध्य विचार भिन्नता के कारण कटुता बढ़ जाती है और उनके परिवार मे विघरन पैदा हो जाता है।
मिठू बऊ को दादा की तकलीफ उन्ही के शब्दों में बताता है-ष्ष् कि मिठू, हमारे सगे भाई ने हमें बेईमान सिद्व कर दिया। छली, कपटी और ढोंगी बनाकर छोड़ा। गांव ही नहीं असपेर भर में। एरच से कालपी तक। श्यामली से झाँसी तक। नहीं-नहीं, मिठू, दसों दिशाओं में आकाश से पाताल तक, रूख-पेड़ो और नदी-सागर तक, पहाड़-पर्वत तक हमे तो लगता है कि धरती के हर कोने मे पिट रही है हमारी बेइमानी की डुग्डुगी कि पंचम सिंह आदमी इंसान नहीं, डकैत है, ठग है, चोर-भेडि़या है।श्3
आगे मिठू बऊ को कका जू के उन शब्दो को बयाँ करता है जिससे दादा का परिवार खण्ड-खण्ड होकर एकल में तब्दील हो गया-ष्ष् दादा से कह रहे थे कि तुम्हे तो धरम-पुत्र जुधिष्टर बननें का सांेख है तो हम हतिनापुर कब तक हारते रहेगें। और आखरी बात यह कि अब हमें न्यारे कर दों। बहौत रह लिए तुम्हारे माँझे।ष्ष्4
मैत्रेयी जी ने इदन्नमम मे वर्तमान परिस्थितियों को सन्दर्भित कर जीवन्सता प्रदान की है। सत्यता को अपनी लेखनी से उदघाटित किया है, संयुक्त परिवारो क स्थान पर एकाकी परिवारों की अधिकता है। अतः मैत्रेयी जी ने एकाकी परिवार का चित्रण किया है, लेकिन साथ ही मैत्रीय जी ने संयुक्त परिवारों की ओर ध्यान आकृष्ट करवाया है। जो निश्चित की मैत्रेयी जी का सुनहरा स्वप्न रहा होगा।
मैत्रेयी पुष्पा ने शिक्षा पर अधिक जोर दिया है उनके उपन्यास के प्रमुख पात्र मन्दाकनी और मकरन्द साक्षर है। मकरन्द उच्च शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर बनता है, वहीं मन्दाकनी अधिक पढ़ी लिखी नहीं है, लेकिन जिज्ञासु है, उसके अन्तःकरण में पढने की ललक है। वह अपनी अल्प शिक्षा पर भी गर्व करती है तभी तो मकरन्द के पूछनेे पर वह गर्व से उत्तर देती है-ष्ष् तुम पढ़ी हो ?े
कक्षा पाँच तक उसने तुरन्त सगर्व उत्तर दिया।
बस ?
मकरन्द की ष्बसष् उसे बड़ी बुरी लगी। बड़ी तुच्छ। गम्भीर स्वर में बोली, कक्षा पाँच तो सबसे ऊँची कक्षा है हमारे स्कूल की।
होगी ! हमारे श्यामली मे आठ तक का स्कूल है। जूनियर हाईस्कूल श्यामली, जिला, झाँसी। देखा है सड़क पर ?ष्ष्5
मन्दा के पूछने पर मकरन्द बताता है-
ष्ष्हाँ बाहरवी में आ गया। साइंस ले ली थी। बायलॉजी डाक्टरी पढने के लिये बायलॉजी लेनी होती है।ष्ष्6
मन्दा के ह्नदय मे पढने की ललक बहुत थी जिस पर वह अपनी बऊ से कहती है-ष्ष्
बऊ हम पढ़ने जाया करेगें, उसने उत्साह में भरकर कह डाला।
पढबे !
हाँ बऊ! यही स्कूल में। छः मे दाखिल हो जाएँगे।
बऊ दो क्षण मौन हुई देखती रही।
कल से ही जाएँगें बऊ। मकरन्द किताबें ला देगें मोठ से पइसा दे देना।ष्ष्
      मैत्रेयी पुष्पा जी ने शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया है, उनके उपन्यास के कम पढे-लिखे पात्र भी गर्व से शिक्षित होने का प्रमाण देते हैं, उन्होने शिक्षा के उच्च एवं निम्न दोनो स्तरों का अंकन किया है। इस उपन्यास के अन्य पात्रों में दादा, मोदी, चीफ को भी कक्षा छः तक मोठ के जूनियर हाईस्कूल से शिक्षा प्राप्त किया हुआ बताया है। इस प्रकार इदन्नमम के मुख्यतः पात्र पढ़े-लिखे है।
मैत्रेयी पुष्पा जी ने इदन्नमम के माध्यम से विवाह को अनिवार्य रूप से स्पष्ट किया है, उनकी दृष्टि मे विवाह बिना जीवन एक तपसी के समान हो जाता है जिससे न कोई रस होता है और न ही कोई हास्य, विलास होता है। इदन्नमम में जब मकरन्द एवं मन्दाकनी की सगाई होती है तो मैत्रेयी जी ने उसका सजीव चित्र उकेर दिया है-
ष्ष्मन्दाकनी की पक्यात है
मकरन्द की सगाई है आज।
रमतूला बन्जा, टूऊँऽऽ, टूऊँऽऽ
बुलउआ दिए गए।
कुसुमा का स्वर मंगली गीतों से सबसे ऊपर उभर रहा है:
सिया बारी बनरी रघुनन्दन बनरे,
को को बरातै जाँय मोरे लाल।श्8
सगाई होने के बाद जब मकरन्द से मन्दाकनी की सगाई टूट जाती है, तो मन्दाकनी अन्य किसी से शादी करने के लिए तैयार नहीं होती, परन्तु उसकी बऊ निरन्तर ही उसके विवाह के लिए चिन्तित रहती है तथा बार-बार उसके समक्ष विवाह प्रसंग छेड़ती है। उसका पड़ोसी सुगमा का पिता जगेसर भी मन्दा की शादी के सन्दर्भ में कहता है-ष्ष् जगेसर उठे और बोले, महाराज मन्दा ब्याह नहीं करती सो इसे समझायेे जाओ।ष्ष्9
केवल इतना ही नहीं मैत्रेयी जी ने बाल विवाह का भी चित्रण किया है अवधा की पुत्री सिरा देवी सात वर्षीय और उसका दामाद बलदेव भी छोटी ही उम्र के हैं।
मैत्रेयी जी ने विवाह के दोनो सन्दर्भो को बड़ी बारीकी ढं़ग से प्रस्तुत किया है। जब कोई रिश्ता जु़ड़ता तो खुशी का ठिकाना नही रहता है और जब जुड़ा रिश्ता टूटता है तो मानो भविष्य की उम्मीद ही खत्म हो जाती है। ऐसी ही पात्रा के रूप में मन्दाकनी को यहाँ प्रस्तुत किया गया है।
विवाह और दहेज एक खुशी तो दूसरा गमगीत करने वाले शब्द है स्त्री विमर्श में मूल समस्या दहेज ही है। मैत्रीय पुष्पा ने इदन्नमम में दहेज प्रथा पर अत्याधिक प्रहार किया है। इदन्नमम में दहेज पीडि़त कुसमा का कारूणिक चित्रण है। दहेज की पूर्ण राशि न मिलने पर उसका पति यशपाल उसे हेथ दृष्टि से देखता है। उसे पत्नी जैसा स्नेह और अधिकार प्राप्त नहीं है। दहेज के अभाव में वह उपेक्षित है- ष्ष् खोट तो हमारे मतारी बाप का है। वे गरीब काहे को थे ? गरीब थे तो अपनी बिटिया के लिए सुख के सपने काहे देखे ? सपने देखे ही थे तो मान परतिष्ठा वाले घर के लिए उतना दहेज काहे नही जुटा पाये ? काहे नहीं कर पाये पर-वर की इच्छा पूरन ?ष्ष्10
दादा और कक्कों (देवगढ़वाली) आपस मे चर्चा करते हुए धन लोभी यशपाल के सन्दर्भ में कहते है-ष्ष् तुम कहती हो विरूप के कारन नहीं, धन माया के लोभ में त्यागा है। कोई कमी थी हमारे यहाँ खाने पीने की ? ठीक है, गरीब की बिटिया थी, तो क्या ठुकरा देते है ?ष्ष्11
मैत्रेयी जी ने अपने उपन्यास इदन्नमम मे दहेज और दहेज विरोधी दोनो वर्गो के व्यक्तियों का वर्णन किया है। दहेज विरोधी वर्ग के माध्यम से दहेज लाभियों को शिक्षा प्रदान करने का सफल प्रयास किया है। वर्तमान समय में सजग लोग धीरे-धीरे इस कुप्रथा का त्याग कर रहे हैं और आज दहेज जैसी बीमारी से निपटने के लिए युवा वर्ग को आगे आना चाहिए, तभी इसका समूल नाश हो सकता है।
इस प्रकार पूर्णतः देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि मैत्रेयी पुष्पा जी का यह उपन्यास समाज में व्याप्त कुरीतियों, अन्ध विश्वासों  धोखाधड़ी, छल कपट पर करारा प्रहार करता है तो वहीं समाज में असमानता, रोग, अस्वच्छता, भष्टाचार से मुक्त होने के लिए निरन्तर संघर्ष की कहानी बयाँ करता है और समता बन्धुत्व, एकता की स्थपना करने में पूर्णतः सफल होता है।

सन्दर्भ-सूची-
1. इदन्नमम- मैत्रेयी पुष्पा, पृष्ठ संख्या- 09, राजकमल (पेपरबैक्स) प्रकाशन, नेताजी सुभाष चन्द्र मार्ग, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष- 2009।
2. वही, पृष्ठ संख्या- 22
3. वही, पृष्ठ संख्या- 196
4. वही, पृष्ठ संख्या- 196
5. वही, पृष्ठ संख्या- 52
6. वही, पृष्ठ संख्या- 111
7. वही, पृष्ठ संख्या- 57
8. वही, पृष्ठ संख्या- 120
9. वही, पृष्ठ संख्या- 204
10. वही, पृष्ठ संख्या- 100
11. वही, पृष्ठ संख्या- 78

नोट- यह शोध आलेख (बुंदेलखंड मे  साहित्य की  परंपरा: खड़ीबोली एवं बुन्देली के विशेष संदर्भ मे ) मे प्रकाशित हो चुका है ।

 

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