Monday, 2 October 2017

गरबा (लघुकथा)

गरबा(कहानी)
.......प्रदीप कुमार गौतम
   आज चारो ओर हलचल मची हुई थी ,धीरे-धीरे लोग एकजुट होकर बड़ी माता मंदिर के पास पहुंच रहे थे, वहाँ पर  गरबा के खेल का आयोजन किया गया था ।
जयेश मां से बोला -' अम्मा मैं गरबा का खेल देखने जा रहा हूँ '
बेटा ! उहाँ पर मत जाओ उस मुहल्ला के छत्रिन में हमाई जाति के लिए घृणा भरी हुई है' । मां ने रोका
"ये सब पुरानी बातें है,आजकल कोई जाति नही मानता है, यह देश भारतीय संविधान से चलता है माँ" ऐसा कहते हुए वह बाहर निकल गया ।
गरबे के खेल की पूरी तैयारियां हो गई थी । नई नवेली दुल्हनें, बूढ़ी औरतें एवं नौयुवतियों ने रंग विरंगे कपड़ो को पहनकर आई थी एक से एक सुघर नौयुवतियां थी जिन्हें देखकर छत्रिन के लरका जोर-जोर से सीठी मार रहे थे चारो ओर मोहक दृश्य था ।
जयेश बड़ी माता के मंदिर की सीढ़ियों में जाकर बैठ गया ।
खेल शुरू हो चुका था, सभी लोग खेल का लुफ्त उठा रहे थे । तभी एक अधेड़  उम्र का आदमी हाथ मे लाठी लिए भीड़ को चीरता हुआ मंदिर के पास आ धमका और जोर से बोला -' मादर...... भोस... के मंदिर अपवित्तर कर दीनो'
जयेश कुछ समय के लिए सहम गया इसके बाद बोला - 'काहे चाचा मोय बैठन से अपवित्तर कैसे हुआ मंदिर का हम इंसान नही है का'
उसकी बातें सुनकर अधेड़ जलभुजं गया और गरजकर बोला- ज्यादा मुँह चलाया तो गां... में डंडा घुसेड़ दूँगा ।तुम भला इंसान खुद को कबसे मानने लगे ।'
जोर-जोर की चीखें सुनकर आसपास के सभी पटेल , क्षत्रिय एकजुट हो गए ।
जयेश को मंदिर में बैठा देखकर भीड़ भेड़िया बनती जा रही थी जो उस बालक को खाने की चेष्टा कर रही थी ।
लंबी चोटीधारी लंपट पंडित बोला ई ससुरा चमरा- चुहड़ौ को शर्म नही है जब देखो संविधान और अम्बेडकर को ही बखानते रहते हैं हम नही मानत उस चुहड़े के संविधान को और गरबा देखन को अधिकार का तुम्हाए बाप ने दे दौ का ।
रामधन ठाकुर जलीकटी गालियां देते हुए चला आ रहा था उसने आकर जयेश के सिर पर जोरदार लाठी से प्रहार लिया वह सीढ़ियों से नीचे गिर गया खून की धारा बह निकली ऐसे में ही लंपट पंडित बोला ई हरामखोर चूहड़ा आज बचकर न निकले सदियों के लिए दोबारा ई मुहल्ला में झाखन को प्रयास न करे
चारो ओर से लाठियों डंडो लातो से प्रहार होने लगे वह हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता रहा लेकिन भीड़ बिना कुछ सुने हमला करती रही
खून से मंदिर का आँगन रम गया
खून से लथपथ लाश पड़ी हुई है
उसकी माँ दहाड़े मारकर रो रही है
पिता पछाड़ खा खाकर गिर रहा है ।
मनु जोर जोर से अट्टहास कर रहा है ।
आज 21वीं सदी में भी  जयेश प्रत्येक दिन जातिवाद के दानव के भेंट चढ़ रहा है ।

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