जरनल डिब्बा(लघुकथा)
.........प्रदीप कुमार गौतम
.........प्रदीप कुमार गौतम
एक माह से लगातार प्रयास के बाद रिजर्वेशन नही हो पाया था । दिवाली में पूरा परिवार एकत्रित हो रहा था तो मुझे भी घर पहुंचना था । साल में एकमात्र यही त्योहार था जिसमें सभी से मुलाकात हो जाती थी । सुबह तैयार होकर स्टेशन पहुँचकर रेलगाड़ी का इंतजार करने लगा । रेलगाड़ी के आने पर जब जनरल डिब्बे में जैसे ही कदम रखा उसके हालात देखकर कदम ठहर से गए । बाथरूम से लेकर बालकनी तक आदमी औरतें ऐसे ठुंसे हुए थे जैसे मुर्गों को हलाल करने से पहल गाड़ियों में ठूँस कर ले जाया जाता है । किसी तरह अंदर पहुंचा तो सिर में पोटली में झूलता आदमी टकरा गया फर्स में लेटे आदमी के ऊपर पैर पड़ गया तो उसने उसनीदें में अजीब सी भद्दी गाली दी और फिर सो गया दुर्गंध ऐसी की एक क्षण भी राही न आये । लगातार बाथरूम में जाते लोग बिना मल साफ़ किए हुए हाथों से सभी के ऊपर रखते अपनी सीट तक पहुंचने के लिए आतुर । चार-चार दिन का सफ़र केवल खड़े होकर करने वाले नींद में ऐसे ढेर कि कोई भी लात मारे उड़ककर एक ओर टिक जाते । रेलगाड़ी का जरनल डिब्बे में हताशा, निराशा, गरीबी दुनिया का बेवस भारत चल रहा था ।
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