सूखा(लघुकथा)
.... प्रदीप कुमार गौतम
इस वर्ष राजीव ने खेतों में ज्वार, एवं अलग-अलग दलहन की बुवाई कर दी थी, जानवरों के लिए अलग से हरियाली बो दी, जिससे गाय भैंसों को चारा मिलता रहे पूरे क्षेत्र की खेती बरसात के पानी पर टिकी थी । वर्षा समय पर हो जाती, तो खेत लहलहा जाते किसानों के चेहरे खिल उठते थे, लेकिन लगातार तीन वर्षों से खेती बाड़ी में कुछ खास पैदा नही हो पा रहा था । उल्टे प्रत्येक वर्ष पांच-दस हजार की उधारी बढ़ती जा रही थी ।
बुवाई होने के पश्चात पूरे बुन्देलखण्ड में सूखा पड़ गया । जानवरों के साथ लोग भी परेशान हो गए गुजारा कैसे करें ? दूर-दूर तक कोई रास्ता नही सूझ रहा था, उसने गाय एवं भैंस को बेचने का प्रण किया, लेकिन बाजार में उचित दाम प्राप्त नही हुए । अकाल की स्थिति में राजीव खुद के परिवार का भरण पोषण में करने में असमर्थ हो गया । जिससे वह पूरे परिवार के साथ शहर में रोजगार की तलाश हेतु चला गया ।
उसकी भैंस तो रिश्तेदारों ने ले ली किन्तु गाय को अन्ना छोड़ दिया । आजकल गाँव की सभी गायें खड़ी फसलों को खा रही थी । आखिर करते भी क्या ? क्योंकि पूरा का पूरा क्षेत्र सूखा से ग्रसित था ।
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Tuesday, 10 October 2017
सूखा
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