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Wednesday, 21 March 2018

मान्यवर कांशीराम का जीवन संघर्ष

फुले शाहू अम्बेडकर की विचारधारा को पूरे देश मे प्रचारित प्रसारित करने वाले बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम साहेब का जन्म पंजाब के रोपड़ जिले के पिथरीपुर बुंगा(बंगा साहब) गाँव  में  15 मार्च 1934 ई0 में माता बिशन कौर की कोख से हुआ था, यह माता बिशन कौर जी का मायका था । पूर्व में यह परंपरा थी कि बच्चे का जन्म ननिहाल में ही होता था । मान्यवर कांशीराम का मूल गाँव खवासपुर,रोपड़  था । आपके पिता का नाम सरदार हरि सिंह था .  आप बहुत ही लगनशील और मेहनती थे .सन 1956 में जिला रोपड़ के पब्लिक कॉलेज से बी0 एस0 सी0 पास करने के बाद प्रतिभाशाली कांशीराम साहेब ने 1957 ई0 में सर्वे ऑफ़ इण्डिया की परीक्षा पास की जिससे उन्हें ट्रेनिंग हेतु देहरादून बुलाया गया और नौकरी बाध्यता हेतु बांड भरने की बात कही गई जिसकी वजह से उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया क्योंकि वे किसी नौकरी के बंधुवा नहीं रहना चाहते थे .

Sunday, 18 March 2018

बी0 डी0 पराग का साक्षात्कार

साहित्य समाज का दर्पण होता है केवल इतना कह देना कारगर साबित नही होगा जब तक साहित्य का समाज के प्रति और समाज का साहित्य के प्रति सही आकलन न कर लें । बहुजन वैचारिकी का समय तो बहुत पुराना है लेकिन प्रत्येक देशकाल परिस्थिति में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है । आधुनिक भारत मे यदि हम बहुजन वैचारिकी की बात करते हैं तो उसमें मुख्य रूप से फुले दंपत्ति से ही इसकी शुरुवात होती है या यों कहें कि महाराष्ट्र की धरती ही बहुजन क्रांति की जन्मदात्री है देश में कई लेखक, कवि हुए कुछ तो आकाश की ऊंचाई तक उठ गए लेकिन कुछ को उनकी जाति, वर्ण, समाज, इत्यादि में जमीजोद कर दिया तब युवा साहित्यकारों एवं शोधार्थियों की यह जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है कि जमीन पर दफ़न कर दिए गए साहित्यकारों को उजागर करें तथा उनकी साहित्यिक विरासत को सभी के समक्ष लाने का प्रयास करें । इसी क्रम में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से शोध कर रहे प्रदीप कुमार गौतम ने वयोवृद्ध साहित्यकार श्री बी0 डी0 पराग से खास मुलाकात करके साक्षात्कार लिया ।
प्रदीप कुमार- सर ! आपकी नौकरी कब और किस विभाग में लगी ?
पराग जी- गौतम जी ! सबसे पहले मुझे सन 1958 ई0 में आशावादी शिक्षक के रूप में तैनाती प्राप्त हुई, इसके बाद सन 1965 ई0 में फतेहपुर में स्थाई नियुक्ति हेतु ट्रेंनिग दी गई और वहीं से हम स्थाई शिक्षक के रूप में तैनात हुए ।
प्रदीप कुमार - आपको अम्बेडकरवादी साहित्य को लिखने की प्रेरणा कब मिली ?
पराग जी - शिक्षा विभाग में नौकरी लगने के बाद 1965 ई0 में ही हमने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली तथा वरिष्ठ समाजसेवी बाबू ज्वाला प्रसाद जी से अम्बेडकरवादी साहित्य अध्ययन के लिए प्राप्त हुआ । भोपाल में प्राइवेट रेलवे विभाग में नौकरी के दौरान बाबा साहेब का वहाँ पर जो तेजस्वी भाषण सुना उसने अंतस चेतना के समाज के प्रति काम करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ कर दिया और वहीं से महात्मा बुद्ध, संत रविदास, बाबा साहेब इत्यादि सामाजिक मुद्दों पर कलम के माध्यम से आवाज़ बुलंद की हालांकि उस दौरान गाँव-गाँव मे बाबा साहेब की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का सरल माध्यम गायन परम्परा एवं नौटंकी थी इसलिए मेरी अत्यधिक रचनाएँ काव्य एवं सांगीत विधा में है ।
प्रदीप कुमार-ऊपर आपने धम्म दीक्षा लेने की बात स्वीकार की है, तो यह बताइये कि धम्म दीक्षा देने वाले गुरु कौन थे ?
पराग- गौतम जी ! धम्म दीक्षा देने वाले पहले गुरु कुकरगांव के भिक्खु आनन्द देव है और उन्होंने नागपुर में पुनः धम्म दीक्षा लेने की सलाह दी थी तब सन 1965 के बाद मैं नागपुर गया और वहाँ का दृश्य देखकर ह्रदय गदगद हो उठा था । नागपुर से अम्बेडकरवादी साहित्य प्रचुर मात्रा में खरीदा और वहीं पर पुनः धम्म दीक्षा ली ।
प्रदीप कुमार- मैं आपकी रचनाओं पर चर्चा करने से पूर्व जानना चाहता हूँ कि आपने काव्य लेखन को ही क्यों चुना ? क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण है ?
पराग-मेरा परिवार शुरुवात से काव्य कला प्रेमी रहा है, गांव में मेरे परिवार के लोग भजन गायन एवं नौटंकी खेलने के बहुत शौकीन थे और दोनों में ही काव्य का प्रयोग किया जाता था तथा हम लोग भी आल्हा गाने का काम बहुत करते थे, जिसका प्रभाव यह हुआ कि मेरा पूरा लेखन काव्य की ओर मुड़ गया ।
प्रदीप कुमार- आपकी रचनाओं में भीम ज्योति और भीम गर्जना एक से नाम प्राप्त होते है, इन दोनों में मूल भिन्नता क्या है ?
पराग जी - भीम ज्योति में काव्य के माध्यम से बाबा साहेब अंबेडकर की वैचारिकी की बात की है और भीम गर्जना में बाबा साहेब द्वारा दिए गए भाषणों में जो वे आह्वाहन करते है तथा ब्राह्मणवादी ताकतों से समाज को सावधान करते है और मनुवादियों को ललकारते है उनको काव्य रूप में परिणित किया है ।
प्रदीप कुमार- सांगीत विधा में लिखी गई कृति 'रविदास दर्शन' में आपने किस तथ्य पर जोर दिया है ?
पराग जी - सांगीत विधा मूल रूप से नौटंकी है, जिसे लोक परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, बदलते परिवेश में इस विधा का महत्व भी कम हुआ है ।  बनारस की यात्रा दौरान जब मैं रविदास मंदिर के आसपास रहने वाले वयोवृद्ध लोगों से मिला और सन्त रविदास जी के काम के बारे में जानने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि संत रविदास एक विद्वान थे उनके बारे में जूते बनाने की बात पूरी तरह से शास्त्रार्थ में पराजित ब्राह्मणों द्वारा झूठा प्रचार है और भी विभिन्न तथ्यों को जानकर सन्त रविदास दर्शन नामक पुस्तक को लिखी ।
प्रदीप कुमार- आपकी अन्य रचनाओं में पराग पुंज एवं पराग पद्यांजलि में किन चीजों का वर्णन है ?
पराग-इन दोनों रचनाओं में नैतिक कर्तव्यों का वर्णन किया गया है, जिसमें माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहिन,  इत्यादि के एक दूसरे के प्रति जो कर्तव्य हैं उन्हें काव्य के रूप में ढाला है ।

Wednesday, 14 March 2018

भीम संगीत(कविता)

भीम संगीत(कविता)
कविरत्न बी0डी0 पराग,
राजेन्द्र नगर, उरई(जालौन)
सुनो सुनावें तुम्हें कहानी भीमराव महान की ।
इंदौर जिला में प्रकटे आकर लाज बचाने शान की ।।
दलितों का संकट हरने को धार मानुष तन आये थे ।
अंधकार भव दूर यहाँ पर गम के बादल छाए थे ।।
पिता रामजी माता भीमाबाई ने अति आनन्द मनाए थे ।
छोटा था स्कूल जो पढ़ने दोनों लड़के बिठलाए थे ।।
देख आनन्द अरु भीम को जल गई छाती मास्टर बेईमान की ।
सुनो सुनावे तुम्हें कहानी.......
छुआछूत मास्टर करते थे पहले के अन्यायी
अलग दियो बैठार बालक को दिल मे दया न आई
जैसे तैसे भीमराव ने एम0 ए0 की शिक्षा पाई ।
सन 1912 में फिर अमरीका पहुँचे जाई ।।
उल्टी-सीधी चाल वीर ने देखी हिंदुस्तान की ।
सुनो सुनावें तुम्हें कहानी..........
अमरीका में रहे खुशी से कभी न दिल में दहलाए थे
पीएचडी की डिग्री पाकर बाबा मन मे हरषाए थे ।।
विद्या पढ़ने की कोशिश में अम्बेडकर लंदन धाए थे ।
बैरिस्टरी कर पास लौटकर फिर भारत में आए थे ।।
श्री गायकवाड़ बड़ौदा नरेश ने कसर न राखी दान की ।
सुनो सुनावें तुम्हें काहानी...........
चीन रूस जापान जर्मनी देश-विदेशों डोले थे ।
अंधकार में पड़े हुए बाबा ने दलित टटोले थे ।।
मुद्दत से सोते हुओं के जाग्रत कर नैना खोले थे ।
अरे ज़ालिमों जुलुम न ढाओ, ऐसे बाबा बोले थे ।।
करूँ प्रसंशा कहाँ तक मुख से ऐसे वीर महान की ।
सुनो सुनावें तुम्हें कहानी........
अति दुख मन में मान दुखी देखे लाखों नर नारी है ।
दलित जाति की बागडोर तब अपने हाथ संभारी है ।।
ज़ुल्म अछूतों पर भारी , नाहि माने अत्याचारी हैं ।
भारी ज़ुल्म सहे दुश्मन के पर हटे न कभी पिछारी हैं ।।
इंसानियत के आगे फिर चली नहीं शैतान की ।
सुनो सुनावे तुम्हें कहानी......
अति निशंक दलितों के नेता फिर लंदन को धाए थे ।
राउंडटेबल कांफ्रेंस में वीर ने वचन सुनाए थे ।।
हिस्सा अलग अछूतों का बाबा लंदन से लाए थे ।
अछुतिस्तान बने भारत में, गाँधी न सुन पाए थे ।।
लिया लूट हमें गाँधी ने धमकी देकर प्राण की ।
सुनो सुनावे तुम्हें कहानी ...........
गाँधी कहे लाज रख मेरी तेरा ही हुकुम बजाऊँगा ।
अछुटिस्तान बनने से पहले अपने प्राण गवाऊंगा ।।
जब तक दस्तख़त नही करोगे अन्न नही मैं खाऊंगा ।
करूँ भूख हड़ताल आज से तड़प-तड़प मर जाऊँगा ।।
परे पिछारी चालू गाँधी बाबा कि मति हैरान थी ।
सुनो सुनावें तुम्हें कहानी........
अगर न बाबा दस्तख़त करते, कभी स्वराज न होता था ।
इसी आजादी से पहले, दलित न सुख से सोता था ।।
अत्याचार दलितों पर होते , बच्चा-बच्चा रोटा था ।
श्री बाबू स्वाभिमानी बाबा ने, कसर न राखी आन की ।
सुनो सुनावें तुम्हें कहानी.........

मान्यवर साहेब-चंद्रशेखर सेठ

मान्यवर साहब के 60 वे जनदिवस पर निम्नपक्तिया।
पद दलित रहे वे मूक सदा ।
इंसान न समझे जाते थे । ।
भूखे रख कर भी सेवा करना ।
मिल जाये तो जूठन खाते थे ।।
परछाई से छूत लगे गर्दन में हांडी लटकते थे ।
पद चिन्ह रहे न भूतल पर झाँकर भी बंधे जाते थे ।।
मेटन को घोर विषमता कोई देवो नही दिखलाते थे ।
भारत मे देवा बहुत हुए शुद्रो के काम न आते थे ।।
पग पग पर कांटे चुभते थे ।
दिन रात सताए जाते थे । ।
कुत्ते बिल्ली का हक ज्यादा ।
शेखर नहक हिदू कहलाते थे ।।
हे बाबा ऋणी रहेगा भारत तुमने कलंक मिटाया है।
सदियों से रोती मानवता को तुमने गले लगाया है । ।
शेखर सत्त सत्त नमस्कार उपकार न भुला जाएगा ।
भूल गया जो भूलेगा ही माँ का दूध लजाये गा ।
मान्यवर साहब
धन्य धन्य श्री कांशीराम जी सारे बन्धन तोड़ दिए ।
मुर्दो में डाली जान फूंक मुँह के ताले तोड़ दिए ।।
दलित पीड़ित जाग उठे शेखर जो संघर्ष किये ।
बहुजन समाज की उम्र लगे जो आपने उपकार किये ।।
दिशा छोड़ दुदर्शा  करा दी जब से चुप्पी साधी है ।
बहुजन की आशा के दीपक कैसी आयी बर्बादी है ।।
कहाँ गया परिवर्तन नारा कहाँ गयी समता की धारा ?
धन वाला धनवान हो गया डाल गए माया को हार ।
टिकट बेच रहे लाखो में लगा रहे धन को भंडार ।।
डॉन माफिया हावी हो रहे बहुजन भैया करो विचार।।
जिनके कारण बनी बीएसपी अब वे ही हमारे नेता हैं ।
शान-मान सम्मान छीन लाओ चिरित्र हीन अभिनेता हैं ।।
निर्धन तो निर्धन बन बैठा देकर अपनी शान और आन ।
सत्ता का सुख भोगेगे और पाएगे हम सम्मान ।।
जिनको चुनकर भेज रहे वे धन वालों के रखवाले हैं।
वोट दे रहे खुटा पे फिर भी दिल के है काले ।।
कैसे परिवर्तन होगा, अब बहुजन जरा बताओ तुम।
शोषक ही अपने मालिक है, जरा होश में आओ तुम ।।
पहचान करो असली- नकली की
अपने कौन पराये है ।
बहुजन की नइयां में बैठ छेद करन को आये हैं ।।
इतिहास गवाही देता है नही बने दिल से समर्थन ।
जब जब मौका मिला ताज का शेखर निकले वो घाटी ।।
एक बार फिर बोल उठो ,ओ बहुजन के दाता।
जगा जगा कर सो गए क्यों बहुजन भाग्य विधाता ।।
तुम भी जगो हम भी जागे जागो मूलनिवासी ।

बहुजन वाणी -कवि चंद्रशेखर सेठ

1.
हमने भी बहुत नजारे देखे हैं ।
चमकते हुए चांद सितारे देखे हैं ।।
जो कल थे उरूज पर शेखर -
आज वो बेचारे देखे हैं ।।
2.
कागज की नाव कब तक चलाओगे ।
गल जाएगी जिस वक्त गोता बहुत खाओगे ।।
संभल के चलो कुछ बिगड़ा नही शेखर -
ठोकरों की नसीहत से बहुत ऊंचे जाओगे ।।
3.
लक्ष्य नही जिसका पास क्या करेगा ।
पथ विहीन जंगल अभ्यास क्या करेगा ।।
पग-पग पर भंवर गहरे समुद्र में-
होश नही जिसको एहसास क्या करेगा ।।
4.
खोजा है जिसने पथ लक्ष्य तक जाने का ।
गुंजाइश नही रहती बहाना बनाने का ।।
तन मन से समर्पित इरादा नेक हो शेखर -
मंजिल कदम चूमती प्रतिफल जमाने का ।।
5.
काबिलियत की कीमत होती जहां में ।
वास्तविकता हो शेखर तेरे ज्ञान में ।।
यो तो आये हजारों चले गए गर्त में -
सर झुकाते है लाखों कदर दान शान में ।।

1.
कविता मेरीे दिल के उद्गार है ।
नकल न किसी की मन विचार है ।।
अलंकार न सही शब्दों का ताल मिल -
किसी को क्या मिले मेरा सुखसार है ।।

2.
समुद्र की लहरें आती और जाती है ।
पैदा हुए विचार मन को हिलाती है ।।
मन से बुद्धि का होता है टकराव -
विचारों की उच्चता जीवन की थाती है ।।
3.
स्वप्न आते है सोते और जागते ।
ठहराव नही जिनका चले जाते भागते ।।
जागते हुए ख्वाब चाहते कुर्बानी-
शेखर लगन सच्ची सदैव रहते आंकते ।।
4.
अनुभव ही कवित्त की अभिव्यक्ति है ।
अंतस की ऊर्जा मानव की शक्ति है ।।
मानुष के विचार पटल पर उतरिए-
श्रद्धा समर्पण करुणा, दया, भक्ति है ।।
5.
शेखर ने विचारों की माला बनाई है ।
छंद बद्ध कर लड़ियाँ पहनाई हैं ।।
भावों के आंगन में घूम-घूम छंद लिखे-
लोक कवियों की भरपाई है ।।
6.
हमारा दिल दरिया है उसे नाली न समझना ।
शेखर सच कहें तो उसे गाली न समझना ।।
आपसे मुहब्बत है विचारा नही शेखर-
मैं इंसान हूँ , मुझे बवाली न समझना ।।
7.
सोचो जरा सोचकर साथ क्या जाएगा ।
बोया बीज बबूल का आम कहाँ से खायेगा ।
सब जानते अपने कर्मों की कमाई शेखर-
फिर भी न संभला ताउम्र पछतायेगा ।।
8.
पैसे के अभाव में जी रहे शेखर ।
न कुछ लेकर आये न जायेंगे लेकर ।।
धन की चकाचौंध में खो गया आदमी-
जिंदगी के संघर्ष में गम पी रहे शेखर ।।
9.
पचास पार कर गए उम्र-ए दराज को ।
सीख न पाया जीने के अंदाज को ।।
जिया हूँ पर कला न आई जीने की -
कैसे करें शेखर बुलन्द आवाज़ को ।।
10.
आज के दौर में काम न ईमान का ।
लच्छेदार भाषण काम हो बेईमान का ।।
चालाकी चतुराई चंचलता लबा-लब-
मौका लगे चूके न हीरा जहां का ।।
11.
नेता कहकर आप मुझे गाली न दो ।
देना ही है प्याली भर खाली थाली न दो ।।
तुम्हारी मुहब्बत ही काफी है शेखर -
नोट दस का देना सौ का जाली न दो ।।
12.
धन नही धर्म नही आदमी न काम का ।
लक्ष्मी से पूजा जाए भाल हो हराम का ।।
चरित्र और ईमान बेकार का झमेला है-
शेखर ये नजरिया बन गया आवाम का ।।
13.
खुद का परिवर्तन हो तो परिवर्तन नही होता ।
वर्तनों में टूट जाये वो वर्तन नही होता ।।
वैश्याओं की कीमत नही समाज मे शेखर-
इंसानियत से महरूम वो नर्तन नही होता ।।
14.
खून-खून से अब इतराने लगा है ।
इस खून को बनाने में जमाना लगा है ।।
कितने हसीन सपने थे उस कलाकार के-
समर्थ होकर वो ठुकराने लगा है ।।
15.
जरा क्या उठ गए बदलने लगे लोग ।
दुश्मनों की चालें चलने लगे लोग ।।
जिनकी मेहनत से ऊंचाई मिली है-
उसी को शेखर कुचलने लगे लोग ।।
16.
अपना अजीज जब कोई ऊंचाई पाता है ।
दिल झूम के इस कदर मचल जाता है ।।
मानो जमाने की खुशियाँ मिली हो शेखर
उसकी मुफ़लिसी पर वो क्यों इतराता है ।।
17.
मन को सुख वहाँ मिलता है शेखर ।
मुरझाया फूल जहाँ खिलता है शेखर ।।
प्रीत जहाँ अपमानित हो प्यारे-
मुस्काता पुष्प वहाँ ढलता हो शेखर ।।
18.
हम जहाँ से चले थे फिर वहीं आ गए ।
पैसा क्या हो गया कि वो हमें भा गए ।।
ज्ञान मान धन धान छीना था आपसे -
खिसकी थी थोड़ी जमीन फिर वो छा गए ।।
19.
सौदा जमीर का न कर सके आज तक ।
आभाव के भाव दिल मे रहे समाज तक ।।
हर दर्द का रिश्ता दर्द से जोड़ता शेखर-
बेहया को क्या हया गिर जाती गाज तक ।।

Sunday, 11 March 2018

बहुजन नायिकाएँ- सावित्रीबाई फुले से रजनी तिलक तक

हमारे देश की ज्ञात और अज्ञात तमाम बहुजन वीरांगनाओं पर मैं प्रदीप कुमार गौतम 'बहुजन वीरांगना- शिक्षिका सावित्रीबाई फुले से लेकर गौरी लंकेश तक' विषय पर पुस्तक संपादित कर रहा हूँ। जिसमें कुछ वीरांगनाएँ एवं लेखकीय परिचय प्रस्तुत कर रहा हूँ । आपके द्वारा दिए नाम को कन्फर्म कर ले
1.शिक्षिका सावित्रीबाई फुले- आशीष कुमार दीपांकर, कानपुर
2. शिक्षिका फ़ातिमा शेख-
3.वीरांगना झलकारीबाई-रामवचन यादव 'सृजन' वाराणसी
4.उदादेवी पासी- डॉ संगीता रावत, लखनऊ, आलेख पूर्ण
5.वीरांगना फूलनदेवी- धर्मवीर यादव 'गगन' नई दिल्ली
6.रानी अवंतीबाई लोधी-डॉ ज्योतिमा मौर्या, लखनऊ, आलेख पूर्ण
7.वीरांगना महावीरी देवी- डॉ प्रवीण कुमार, गाजियाबाद, आलेख पूर्ण
8. माता रमाबाई अम्बेडकर-अमित कुमार चौधरी, लखनऊ
9. डॉ. सविता आम्बेडकर- पूजा कुमारी, वाराणसी, आलेख पूर्ण
10. आशादेवी गुर्जर- कामिनी, कानपुर
11. बाग़ी पुतलीबाई-डॉ जीतेन्द्र विसारिया
12. राजमाता जीजाबाई-रविन्द्र सिंह, लखनऊ
14. महारानी दुर्गाबाई- रजनीश कुमार अम्बेडकर, वर्धा
15. गौरी लंकेश-सोनम मौर्या, नई दिल्ली
16.जीजन बाई - दीपक राजा, झाँसी
17.रणवीरी वाल्मीकि- नरेंद्र वाल्मीकि, मेरठ, आलेख पूर्ण
18.लाली देवी- डॉ शिवशंकर वर्मा, आगरा
19.भंवरी देवी-डी0 के0 भास्कर, मथुरा
20.लाजो देवी-शकुन्तला दीपांजलि, कानपुर, आलेख पूर्णज़
21.कौसल्या बैसंत्री-
22.रानी गैदिलनयु-प्रदीप कुमार गौतम, आलेख पूर्ण
23.रजनी तिलक-प्रदीप कुमार गौतम, आलेख पूर्ण
24.शांताबाई दानी -रजनी तिलक

इनके अतिरिक्त यदि आपके गाँव, जवार, जनपद में कोई ऐसी बहुजन वीरांगना रही हो, जिसने पितृसत्ता, सामन्तवाद, जातिवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई हो, तथा जिसने जल, जंगल, ज़मीन, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सुधार में कोई अग्रणी का निर्वहन किया हो, तो उन दादी, माँ, बहन या बेटी किसी अन्य पुरखे का भी जीवन परिचय एवं संघर्ष लिखकर भेज सकते हैं।
संपादक
प्रदीप कुमार गौतम
मोबाइल-8115393117
ईमेल-pradeepkumargautam72@gmail.com

कांशीराम चल पड़े हैं

भीम का संदेश देने, कांशीराम चल पड़े है ।
काम अधूरा भीम का , पूरा करने चल पड़े है
कायर बुजदिलों का दूर भरम करेंगे
जो सत्ता की शक्ति होती बहुजनों वह भरेंगे ।।
पिछड़े अल्पजनों की रक्षा को लड़ रहे है ।
भीम का संदेश.......
एकता का शंख फूंका, बहुजन जग गया है ।
पंद्रह फीसदी अब दिल में डर गया है
बुद्ध सत्ता से इनके दिमाग सड़ रहे हैं ।।
भीम का संदेश.........
शोषक का क्या भरोसा बर्बाद कर दे भारत ।
आये पुनः गुलामी दिल में मेरे शाश्वत ।।
भारत की रक्षा करने , बहुजन निकल पड़े हैं ।
भीम का संदेश..........
भारत है दिल का टुकड़ा बर्बाद न होने देंगे ।
रिपु को खदेड़ देंगे नाहिं मौत से डरेंगे ।।
गद्दार विरोधियों को नष्ट करने हम अड़े हैं ।
भीम का संदेश.......
भारत के वीर बहुजन समशीर पकड़ो कर में ।
भारत है अपना छीनों, बांधों कफ़न को सिर में ।।
शोषित बना-बना दल, आपस मे लड़ रहे हैं ।
भीम का संदेश.........
प्यारा नीला झंडा, नीले गगन में फहरे ।
संदेश भीम का ये हर दिल मे ठीक ठहरे ।।
'पराग' प्यारा भारत अखंड करने हम खड़े हैं ।
भीम का संदेश देने, कांशीराम चल पड़े हैं ।।

कांशीराम का काम

कांशीराम का काम
कविरत्न बी0 डी0 पराग
उरई, जालौन(उ0प्र0)

भीम बाबा जो कह कर गए थे ।
कांशीराम जी वह कर गए है ।।
आगे बढ़ते रहो नित्य बहुजन ।
प्यारा संदेश वह देकर गए हैं ।।
जब तक जुल्म दलितों तुम सहते रहोगे ।
तब तक दद्दा,दाऊ, मालिक कहते रहोगे ।।
जब तक गुलामी का बोझा सिर पर रखे रहोगे ।
तब तक न उठने पाओ, नीचे दबे रहोगे ।।
जो जुल्म सह रहे है
घुट घुट के मर रहे है ।
भीम बाबा जो .......
पाखण्ड धूर्तता में जब तक फंसे रहोगे  ।
मेहनत का सारा धनयों भैया खोते रहोगे ।।
शिक्षा, एकता से जो दूर तुम रहोगे ।
बढ़ पाओगे न आगे दासता के बस रहोगे ।।
जो संघर्ष कर रहे हैं
वह आगे बढ़ रहे हैं ।।
भीम बाबा जो.......
पंद्रह फीसदी जो, शासक बने हमारे ।
पचासी फीसदी ने, होश यों बिसारे ।।
शासक यहाँ के तुम थे, क्यों ख्याल तुम बिसारे।
तुमने ही शत्रु हरदम समशीर से हैं मारे ।।
फिर कैसे डर रहे हो,
बल अपना खो रहे हो ।
भीम बाबा जो......
बाबा ने शक्ति तुमको दीन्ही है बहुत प्यारी ।
धोखे में अपनी शक्ति गैरों को क्यों पवारी ।।
अदभुत है शक्ति मन की पचड़े में क्यों बिगाड़ी ।

...  .......  

Saturday, 10 March 2018

चमचा युग

  राष्ट्रीय राजनीति में धाक जमाने वाली बहुजन समाज पार्टी आज घुटनों के बल चल रही है क्या आपने कभी विचार किया ? इसका कारण क्या है  ?  मुझे जो समझ आया वह यह कि चमचों को चलाने वाले रिमोड हाथों ने बहिन अंदर की बड़ी खामी को पकड़ लिया था कि धन के माध्यम से बहुत कुछ परिवर्तन किया जा सकता है और उन्होंने वही किया लालची हाथों को नोटो के अटैचिया दी जाने लगी और वैचारिक लोगों की जगह चमचों की सेंधमारी करवा दी जिसका परिणाम यह हुआ कि एक-एक करके चमचों से रक्षा करने वाले बाहर हो गए और चमचा युग आपके अंदर ही शुरू हो गया यदि किसी ने हुकुम के विरोध में चमचों से सावधान करने की बात की उसे बाहर कर दिया गया और धीरे-धीरे एक चमचों का अधिपत्य स्थापित हो गया । बाहर के चमचों की तो पहचान हो रही थी जिसके लिए मान्यवर साहेब ने थ्योरी दे दी थी जिससे हम लोग चार बार राजसत्ता को भी हासिल कर लिए थे, चमचों को चलाने वाले हाथों मुख्य मंशा यही थी कि किसी तरह इसको फंसाया जाए और उनके द्वारा डाले गए जाल में हम फंस गए जिसकी वजह से सीबीआई पीछे पड़ गई। जेल भेजने की सीधी धमकी दी गई इसलिए खामोश बैठ गए क्योंकि हम भी तो चमचों के सरदार थे तो स्वभाविक है कि हमें बैठना पड़ेगा । रिमोड को बहुजन समाज पर अत्याचार की हद पार करनी थी इसलिए उसनेे टेस्टिंग शुरू की गुजरात में मरी गाय के उठाने पर गाड़ियों में बांधकर लोहे की रॉडों से पीटा गया समाज आपका और उसी का वोट बैंक के बल पर राज्यसभा में थे तो नही बोलते तो समाज प्रश्न करेगा तब मुद्दा उठाया गया खूब जोरशोर से पूरे देश मे हाहाकार मच गया रिमोड परेशान हो गया उसने सहारनपुर अपनाया वहाँ पर उल्टा बयान आया चंद्रशेखर रिमोड का आदमी घोषित किया गया तब समाज मे दोहरी मानसिकता उत्पन्न हो गई राज्यसभा में बार-बार मुद्दा उठाने पर सीबीआई की धमकी दी गई इसीलिए न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी की तर्ज पर सीधे-सीधे राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और हमेशा के लिए समाज के प्रश्नों से बचने का मौका मिल गया और अंदरूनी चमचों द्वारा इसे ऐतिहासिक कदम बताकर बाबा साहेब द्वारा हिन्दू कोड बिल के संदर्भ में दिए गए इस्तीफे से तुलना कर डाली । आखिर ठहरे जो चमचे इससे अधिक कर भी क्या सकते है ? मान्यवर साहेब ने जिस चमचा युग को 10 वर्ष में खत्म करने की बात की थी उसे सबसे ज्यादा खाद बीच उनके ही उत्तराधिकारी  ने ही दी है और सर्वाधिक चमचों की संख्या आज उनके के साथ है ।

Thursday, 8 March 2018

महिला सशक्तिकरण के वर्तमान हालात

                                          महिला सशक्तिकरण के वर्तमान हालात
        
                                                                                             प्रदीप कुमार, शोधार्थी, हिंदी विभाग
                                                                                          बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी(उ0प्र0)
                                                                                          मोबाइल-8115393117
                                                                                         ईमेल-pradeepkumargautam72@gmail.com
     
    स्त्री सशक्तिकरण के दावे केवल कागज़ी शिगूफा साबित हो रहे हैं, सरकारी तंत्र अपने स्तर पर महिला सशक्तिकरण की बात करता है . उसे कागज़ो में ढालता है, लेकिन उसे जमीन में नहीं उतारता है, क्योंकि उसे यह खतरा दिखाई देता है कि ऐसा न हो कि सामाजिक धुरी पर टिका वोटर उससे खिसक जाये । इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इसका साहस नही कर पाता है, सबसे पहले तो देश में व्याप्त पितृसत्ता बेटों की चाहे में ऐसा डूब हुआ है कि जब तक पुत्र प्राप्ति नही होती है, अनचाही बेटियों को जन्म देते रहते है । पुत्र ही परिवार और समाज को बढ़ा सकता है, ऐसी धारणाएं पूरी तरह से धार्मिक ग्रंथों में रची बसी सोच का परिणाम है कि घर का मालिक केवल पुरुष हो सकता है, यदि कोई स्त्री घर की जिम्मेदारियों को निर्वाहन करना चाहती है तो उसे कुलटा, परिवारनाशनी इत्यादि उपाधियों से विभूषित कर दिया जाता है . जब कोई महिला प्रतिरोध करके  सामाजिक दायरों को तोड़कर आगे आती है, तो घृणित मानसिकता के लोग उसकी हत्या भी कर देते हैं . इस तरह की दूषित मानसिकता को जिम्मेदार पद प्रतिष्ठित लोग हवा देते है .  अभी तत्काल की घटना का जिक्र करें, तो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्त्री पुरुष के बीच हुई शादी को समझौता करार दिया है वे कहते है कि पुरुष स्त्री के खाने पीने रहने की व्यवस्था करता है, इसके बदले स्त्री उसके घर का काम करती है और अन्य जरूरतें पूरी करती है इसका प्यार स्नेह से कोई मतलब नही है जब भी ये एक दूसरे की जरूरतें बन्द कर देते है तभी वे अलग-अलग हो जाते है ऐसी बयानबाजियों को देखें, तो इस देश मे ढेरों लोग है जो स्त्रियों को संभोग की वस्तु मात्र समझकर मतलब रखते है बाँकी चीजों से उनका कोई सरोकार नही है । पहले तो धार्मिक रूप से स्त्रियों को इतना निकृष्ट और घृणित जीव करार दिया है कि वह बच्चे पैदा करने की मशीन मात्र रह गयी है । मनीषा सिंह अनचाही स्त्रियों के पैदा होने के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहती है कि - " वर्ष 2017-18 के आर्थिक सर्वे ने इस अंतर को बाकायदा दर्ज करते हुए बताया है कि देश मे 2.1 करोड़ बेटियाँ ऐसी हैं, जिनके पैदा होने की उम्मीद उनके परिवारों ने नही की थी ।"1 इस आंकड़े को देखकर आप हैरान हो जाएंगे कि बेटे की ऐसी चाहे कि पांच-पांच पुत्रियाँ हो गई, जो दकियानूसी मानसिकता को परिलक्षित करता है । 20वीं सदी तक तो हालात ऐसे थे कि अनचाहे ही लेकिन बेटियाँ हो जाती थी जिसकी वजह से स्त्री-पुरुष का अनुपात ठीक था किंतु 21वीं सदी में प्रवेश करते ही ऐसी टेक्नोलॉजी का जन्म हुआ कि गर्भ में ही भ्रूण को जाँच-परख लिया जाता है और भ्रूण हत्या कर दी जाती है इसके आंकड़े और भी भयानक है मनीषा सिंह कहती है -"गर्भ में बेटी की सूचना मिलने पर देश में अब तक 6.3 करोड़ भ्रूण हत्याएँ कराई गई है ।"2
     मनीषा सिंह द्वारा दिए गए आंकड़ो में हो सकता है किसी संस्था ने ये आंकड़ें सरकारी तंत्र से निकाले हो या सामाजिक संगठन द्वारा जुटाए गए हो । यह भ्रूण हत्या तो शादी होने के बाद कि परिगणना है, लेकिन इस देश में शादी से पहले ही नौजवानों में सम्बन्ध स्थापित हो रहे है जिनमें भ्रूण पैदा होना स्वाभाविक है जिनकी कभी गणना ही नही की जाती है यदि ऐसे भी आंकड़ों को जोड़े तो मनीषा सिंह द्वारा दिए आंकड़ों से कई गुना अधिक हो जाएंगे । डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित भारतीय संविधान में दिए गए अधिकार के बल पर वर्तमान समय मे स्त्रियाँ बड़े-बड़े पदों पर पहुंच गई है इसके बाद भारतीय संविधान में महिला को मातृत्व हेतु 26 माह का अवकाश अनिवार्य किया गया है लेकिन समाज अपना रुख अभी भी नही बदल पा रहा है वह चाहे राजनीति के क्षेत्र में हो या आर्थिक क्षेत्र में पुरुष का वर्चस्व सभी जगह कायम है ।
   महिला आरक्षण के बाद स्त्रियाँ विभिन्न जगहों पर पहुंच रही है, लेकिन वे पुरुष रूपी बैसाखी जरूर थामें हुए है । जबसे शिक्षा का प्रभाव तेजी से फैला है, तो पढ़ी लिखी लड़कियों की डिमांड बढ़ गयी है, ऐसे में लड़कियों की शादी न होने का खतरा मंडराने लगा है । यह स्थिति देखकर माता पिता लड़कियों को पढ़ा लिखा रहे हैं किंतु उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए नही बल्कि अच्छे वर की तलाश हेतु  पढ़ा रहे हैं । सामाजिक जागरूकता से लोगों को कोई सरोकार नही रह गया है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । महिलाओं के लिए 33℅ आरक्षण की वकालत निरंतर चलती रही है । कांग्रेस के शासन काल मे महिला आरक्षण विधेयक संसद के उच्च सदन से पास हो गया था, लेकिन लोकसभा में पास नही हो पाया था, जबकि बीजेपी साथ थी . मूलतः उस समय कांग्रेस की मंशा इस विधेयक को लेकर स्पष्ट नही थी इसलिए थोड़े से विरोध में महिला आरक्षण विधेयक लोक सभा से पास नही हो पाया जबकि ऐसे कई विधेयक है, जिनमें कांग्रेस ने सख्त रुख अपनाकर विपक्षियों को वॉक आउट करवकार विधेयक पास करवाये हैं लेकिन फिलहाल यह गेंद अब बीजेपी के पाले में है और उसके पास यह सुनहरा मौका है कि देश की आधी आबादी को इस विधेयक के पास करवाते ही खुश कर सकती है । इस संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार श्री दिलीप मंडल जी कहते हैं -"अब राजग और भाजपा को साबित करना है कि महिला आरक्षण के सवाल पर वे गंभीर और ईमानदार है । अगर भाजपा और राजग वर्तमान लोकसभा में महिला आरक्षण बिल लाते हैं तो पूरी संभावना है कि कांग्रेस का समर्थन उसे मिल जाएगा । यदि कांग्रेस ऐसा नही करती है तो महिला समर्थक होने का उसका दावा खत्म हो जाएगा ।"3
 
   वर्तमान समय में देश के हालातों में नजर दौड़ाए तो दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमान प्रताड़ित हो रहे हैं तो दूसरी ओर बौद्धिक वर्ग के लोगों की हत्याएँ जारी है जिससे बौद्धिक वर्ग भी डरा हुआ है महिलाओं के साथ दिन प्रतिदिन बलात्कार फाबियाँ कसी जा रही है । यदि आंकड़ों पर नज़र डालें तो तो बलात्कार की घटना स्व पीड़ित होने वाली महिलाओं में दलित स्त्रियों की संख्या बहुत अधिक है । दलित स्त्री एक ओर जाति के कारण पीड़ित होती है तो दूसरी ओर घर-परिवार एवं पितृसत्ता से पीड़ित रहती है तब महिला आरक्षण विधेयक में शहरी और देहाती स्त्रियों तथा दलित स्त्रियों को विशेष प्रावधान किए जाएं, तभी समानता एवं सामाजिक न्याय की बात हो सकती है अन्यथा कि स्थिति में बाबा साहेब द्वारा भारतीय संविधान में आरक्षण के माध्यम से किए गए  प्रावधानों को वर्तमान सरकार खोखला करने की फिराक में है ।
संदर्भ-1.अमर उजाला,संपादकीय(अवांछित होने का दर्द) शुक्रवार,09 मार्च 2018, कानपुर संस्करण
2.वही
3. वही (महिला आरक्षण और कब)

Tuesday, 6 March 2018

क्या आपने बाबा के सम्बोधन को सुना है

क्या आपने बाबा साहेब के सम्बोधन को सुना है ?
आज सुबह मेरी मुलाकात ऐसे शख्स से हुई, जिन्होंने बाबा साहेब के संबोधन को केवल एक बार नही बल्कि 13 मई 1954 से अक्टूबर 1954 तक नागपुर से मद्रास तक छेड़े गए सामाजिक परिवर्तन के अभियान में जब बाबा साहेब मध्यप्रदेश आये तो इन्होंने भोपाल, इंदौर, कटनी, भुसावल में सुना । 80 वर्षीय कविरत्न की उपाधि से विभूषित श्री बी0 डी0 पराग (बालादीन पराग)  का जन्म 01 जुलाई 1937 ई0 को जनपद जालौन के मालवी नगर(हरदौल मुहल्ला) , कोंच में हुआ था । आपके पिता का नाम श्री मंटोलाल है । बातचीत के दौरान आपने बताया कि बचपन में मेरा नाम बलराम(वर्तमान घरेलु नाम) था लेकिन मुहल्ले के ही एक ब्राह्मण शिक्षक के भाई का नाम बलराम था इसलिए उन्होंने बलराम की जगह बालादिन रख दिया तबसे बालादीन ही चल रहा है । आपने बताया कि जब बाबा साहेब भोपाल आये हुए थे तब मैं रेलवे विभाग के मालगोदाम में अस्थाई रूप से कार्यरत था उस कार्यक्रम का संचालन श्री पी0 एल0 पिप्पल (प्यारेलाल पिप्पल) कर रहे थे ।हम सभी युवाओं को लाठियों और बंदूकें देकर बाबा साहेब की सुरक्षा में लगाया गया था,  शाम 04 बजे लेकर रात्रि में 09 बजे तक कार्यक्रम चला था जिसमें बाबा साहेब ने अकेले लगातार 03 घंटे सम्बोधित किया था । बाबा साहेब के प्रभाव में आकर आप साहित्य लेखन में उतर आए और जमीन पर अपनी कविताओं, लोकगीतों के माध्यम से समाज को जागरूक करने लगे बाद में आपकी ज्वानिंग बबीना केंट झाँसी में प्रवक्ता पद पर हो गई । शुरुवात में आपका पूरा परिवार कबीरपंथी था जो आपकी रचनाओं को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है लेकिन सन 1965 में आपने बौद्ध धम्म दीक्षा ग्रहण कर ली जिसके बाद आपकी रचनाओं में धम्म का प्रभाव आ गया । आपने कुल सोलह पुस्तकें लिखी, लेकिन एक क्षेत्रीय लेखक होने के नाते भारी उपेक्षा के शिकार हुए, जबकि आपकी रचनाओं में समाज का वेदना , समाज के उत्थान के मार्ग आदि स्पष्ट दिखाई देता है । वेतन इतनी प्राप्त होती थी कि स्वयं का परिवार पालना मुश्किल था ऐसी परिस्थिति में सामाजिक कार्य हेतु कई यात्राएँ लगातार करते रहते थे जिससे साहित्य छपवाने हेतु धन का अभाव था । बाबा साहेब के परिनिर्वाण के पश्चात मान्यवर साहेब के मिशन मूवमेंट में लगातार काम किया किन्तु शासन सत्ता हासिल होने के पश्चात आपने कई नेताओं से साहित्य को प्रकाशित करवाने हेतु आर्थिक सहयोग की माँग की लेकिन किसी ने सहयोग नही किया उलटे साहित्य से क्या होता है ? ऐसे प्रश्नों को खड़ा करके उल्टे पैर वापिस लौटा दिया । आज आपकी उम्र 80 वर्ष हो गई है और आँखों से दिखना भी बंद हो गया है उसका मुख्य कारण आंखों में मोतियाबिंद होना है आपके पास जो चश्मा था वह भी टूटा हुआ है । एक क्षेत्र विशेष से सम्बन्ध रखने के कारण उम्दा रचनाओं के रचनाकार की इतनी भारी उपेक्षा देखकर हृदय हिल गया । सुबह भ्रमण से वापिस आने के दौरान आपसे मुलाकात हुई तो चाय हेतु घर ले आया जिसमें रचनाओं को प्रकाशित करवाने का मैंने आश्वासन दिया, तो आप अपने घर से अप्रकाशित रचनाओं की पांडुलिपि मेरे यहाँ ले आये । जिसमें मुख्य रूप से निम्न है -
प्रकाशित रचनाएँ
1.साक्षरता की ओर (सांगीत/नौटंकी विधा)
2.पोलियो दमन (सांगीत/नौटंकी विधा)
अप्रकाशित रचनाएँ-
1.भीम ज्योति(काव्य)
2.पराग-पुष्पांजलि(काव्य)
3.गुरु भक्त अंगुलिमाल (सांगीत/नौटंकी विधा)
4.भीम गर्जना(काव्य)
5.बुद्ध दर्पण(काव्य)
6.लोकगीत(बुंदेलीगीत) दो खंडों में
7.आल्हखंड(तर्ज आल्हा)
8.रविदास दर्शन(सांगीत/नौटंकी विधा) दो खंडों में
9.वन संपदा
10.वर्ण व्यवस्था: अमनासिक(आलोचना
11.हिन्दू धर्म में अछूतों की स्थिति (आलोचना)
  इन रचनाओं में तीन रचनाएँ भीम ज्योति(काव्य), पराग-पुष्पांजलि(काव्य), गुरु भक्त अंगुलिमाल (सांगीत/नौटंकी विधा) गौतम प्रिंटर्स, नई दिल्ली द्वारा सन 2000 द्वारा टाइपिंग की गई है और भारतीय बौद्ध महासभा( रजि0) नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित करवाई जा रही थी किन्तु उसी समय आपका एक्सीडेंट हो गया और आप पहुंच नही पाए और धन का अभाव हो गया और पुस्तकें प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित नही की गई , जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । इन रचनाओं की पांडुलिपि देखने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि बाजार में आई कई रचनाओं से ये बहुत उम्दा है लेकिन धनाभाव में एक लोक भाषा से पूरित साहित्यकार को हाशिए में डाल दिया गया है ।
लेकिन आप और हम मिलकर ऐसे साहित्यकारों की रचनाओं को केवल प्रकाशित ही नही करवा सकते है बल्कि रचनाओं में व्याप्त सारगर्भित ,समाज द्रष्टा वस्तुओं को प्रचारित करके उनके साथ हुई साहित्यिक क्षति की भी पूर्ति कर सकते है ।

Sunday, 4 March 2018

चमचा युग का पुनरावलोकन

                                          चमचा युग का पुनरावलोकन

जब हम मान्यवर कांशीराम साहेब द्वारा लिखित 'The chamcha age' (an era of the stooges) चमचा युग की बात करते है तो उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानने से पूर्व यह जानना अत्यावश्यक हो जाता है कि आखिर चमचा युग क्या है ? जब हम बाबा साहेब के वैचारिकी पर अपना ध्यान आकृष्ट करते हैं तो जो दलित, पिछड़े वर्ग का व्यक्ति  हिंदुओं की गुलामी में प्रवृत्त रहता है, उसे हम गुलाम कहते है . इसी तरह महात्मा गाँधी एवं बाबा साहेब के बीच यदावरा जेल, पूना में जो समझौता हुआ, जिसमें दलितों को पृथक निर्वाचन मंडल को खोने के बाद आरक्षित सीटें प्राप्त हुई । आरक्षित सीटों से चुनाव जीतकर दलितों के हक, हकूक की लड़ाई लड़े बिना हिंदुओं की चापलूसी करते हुए अपने ही वर्ग के अधिकारों का हनन करने का काम करता है ऐसे प्रतिनिधियों को चमचा, दलाल, पिट्ठू, औजार आदि कहा गया है । इस संदर्भ में बाबा साहेब अंबेडकर कहते हैं -"एक जाने पहचाने मुहावरे का प्रयोग करें तो हिंदुओं के नजरिए से संयुक्त निर्वाचन मंडल एक रॉटन बरो(जीर्ण शीर्ण उपनगर) है जिसमें हिंदुओं को एक अछूत के नामांकन का अधिकार मिलता है, जो नाम मात्र को अछूतों का प्रतिनिधि होता है किंतु वास्तव में वह हिंदुओं का औजार होता है ।"1
      चमचा युग मान्यवर साहेब द्वारा लिखित एक ऐसा दस्तावेज है, जिसमें बाबा साहेब की विचारधारा का संकलन है . 1930 से शुरू हुए गोलमेज सम्मेलन में  डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा जो भी तथ्य अंग्रेजी शासन के समक्ष प्रस्तुत किए गए, उन सभी का दस्तावेजीकरण है तथा इसमें मुख्य रूप से महात्मा गाँधी द्वारा अपनाए गए रवैयों से समाज को चेताया गया है क्योंकि गाँधी स्वयं को दलितों का बहुत बड़ा हितैषी बताता है और इसके उलट पूरे अधिकार छीनने में तुला हुआ है । गोलमेज सम्मेलन में वह स्वयं को दलितों का प्रतिनिधि बताता है, किंतु बाबा साहेब के नाम देश के सभी कोनों से पत्र आते है और उन्हें ही दलितों का प्रतिनिधि घोषित किया जाता है . इसके बाद गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहेब द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों को आधार मानकर 17 अगस्त 1932 को प्रधानमंत्री के साम्प्रदायिक पंचाट(कम्युनल अवार्ड)  की घोषणा करते  हुए प्रथक निर्वाचन मंडल की सिफारिश को स्वीकृत प्रदान कर दी जाती है जिसकी वजह से पहली बार कांग्रेस एवं गांधी को चमचों की आवश्यकता महसूस होती है . इस विषय मे मान्यवर  कांशीराम कहते है -"गाँधी और कांग्रेस के तमाम विरोध के बावजूद 17 अगस्त 1932 को घोषित प्रधानमंत्री के पंचाट में दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन मंडल की स्वीकृति दे दी गई । 1930 से 1932 तक कि इस अवधि में गाँधी जी एवं कांग्रेस को पहली बार चमचों की जरूरत महसूस हुई ।"2
  कम्युनल अवार्ड के घोषित होने के बाद महात्मा गाँधी खफा होकर बड़ी चालाकी से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री  को लगातार तार लिखते है, लेकिन वे गांधी के दोगले रवैये को समझ जाते है तथा प्रथक निर्वाचन मंडल दलितों को अधिकार के रूप में प्रदान करते है तथा इस सन्दर्भ में बाबा साहेब से बात करने के लिए बोल देते है । इसके बाद महात्मा गांधी अनशन में बैठ जाता है तथा बाबा साहेब पर दबाव बनाया जाता है उनके पीछे ण हटने पर देश के कोनों से दलितों की हत्याओं की खबरे आने लगती है . जिसकी वजह से बाबा साहेब मज़बूरी में पूना समझौता करते है, जो आगे चलकर पूना पैक्ट के रूप में प्रचलित होता है  और उसी दिन से देश मे चमचा युग की शुरुवात होती है . इस संदर्भ में मान्यवर कांशीराम साहेब कहते है - "24 सितम्बर 1932 के दिन चमचा युग की शुरुवात हुई ।"3
       इसी चमचा युग को मान्यवर कांशीराम साहेब दस वर्षों में खत्म करने का बीड़ा उठाते है और  इस उद्देश्य को लेकर वे नियम बद्ध कार्यक्रमों की योजना तैयार करते है  तथा जब कांशीराम जी जमीन में काम करना शुरू करते है, तो 1978 के दौर से चमचों में खलभली मच जाती है तथा चमचे किश्म के इंसान अपनी जमीन खोजने लगते है, वे बहुत समय तक परेशान भी रहते है । बीच-बीच में वे कांशीराम जी के समर्थकों को गीदड़ भभकी भी देते है जब कार्यकर्ता साहेब से इस तरह की धमकियों की सुचना देते है तो वे   इस संदर्भ में कहते है  -" चमचा अपने बूते कुछ नही कर सकता है इसीलिए करने वाला आप पर चमचा से वार कर सकता है । इसीलिए हमें चमचा प्रहार के लिए तैयार रहना चाहिए ।"4
       सच तो यह है कि चमचा कठपुतली होते है उनमें बहुत दम नही होती है, पहले वे आपको धमकाने का काम करेंगे यदि आप वैचारिक रूप से परिपक्व है और उनका डटकर सामना करते हैं तो दुम दबाकर भाग खड़े होंगे क्योंकि चमचा स्वयं कुछ नही करता है बल्कि वह रिमोड से चलने वाले खिलौनों की तरह होते है इस संदर्भ में मान्यवर कांशीराम साहेब कहते है -"बहरहाल, चमचा प्रहार से हमें नहीं डरना चाहिए, क्योंकि चमचा कोई शक्तिशाली अथवा घातक हथियार नही है । इसके अतिरिक्त हमें उस हाथ पर निशाना साधना होगा जो चमचे का इस्तेमाल करता है । अगर हम जोर से मारेंगे, तो चमचा गिर जाएगा । गिरा हुआ चमचा निरापद होता है  इसीतरह, हम लगभग 10 वर्ष की छोटी-सी अवधि में चमचा युग समाप्त करने को आशा करते हैं ।"5
         मान्यवर कांशीराम साहेब दस वर्षों में चमचा युग समाप्त करने के लिए एक योजना तैयार करते है तथा तीन योजनाओं में काम करने का निर्णय लेते है 1.सामाजिक परिवर्तन( अल्पावधि समाधान) 2. राजनैतिक परिवर्तन(दीर्घकालीन समाधान) सांस्कृतिक परिवर्तन(स्थाई समाधान) । सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने  ०6 दिसम्बर 1978 को बामसेफ तथा 06 दिसम्बर 1981 को  DS4 की स्थापना की, जिससे सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई शुरू की । DS4 की कई विंग्स तैयार की गई, गाँव-गाँव सामाजिक जागरूकता के कार्यो में लोग लग गए, बामसेफ आर्थिक एवं बौद्धिक सहायता करने लगा, जिससे लोगों में सामाजिक चेतना के साथ जागरूकता आई तथा  लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने लगे । तब मान्यवर कांशीराम साहेब को महसूस हुआ कि  अब मनुवादी पार्टियों से मुकाबला करने के लिए राजनैतिक दल का गठन किया जाए तब उन्होंने बाबा साहेब के जन्मदिन के अवसर पर 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी का गठन किया तथा दीर्घकालीन परिवर्तन हेतु 'वोट हमारा राज तुम्हारा, नही चलेगा नही चलेगा' 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के नारे को बुलन्द करके अल्पजन बनाम बहुजन का बिगुल फूँक दिया । जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया और धीरे धीरे बसपा भारत देश की तृतीय सबसे मजबूत राजनैतिक दल के रूप में उभरा । दीर्घकालीन परिवर्तन के नारों के साथ वे लगातार अपने भाषणों से स्थाई समाधान हेतु 2006 से सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में कार्यक्रम करने की योजना के बारे में बात करते थे क्योंकि बौद्ध धम्म के स्थापना के बिना राजनीति में लगातार सफलता हासिल करना बस की बात नही है यह उन्हें भलीभांति मालूम था, जिसके लिए वे 2003-2004 के दौर से निरन्तर धम्म के लिए अधिक प्रेरित कर रहे थे, लेकिन अचानक उनके स्वास्थ्य में गिरावट आती है और वे 09 अक्टूबर 2006 को रात 12:30 बजे हम सभी के बीच से चले जाते हैं अर्थात परिनिर्वाण को प्राप्त करते है और स्थाई परिवर्तन का उद्देश्य उनका अधूरा रह जाता है ।
           मान्यवर कांशीराम ने सामाजिक परिवर्तन करने के लिए DS4 का गठन जितनी जल्दी किया था सामाजिक क्रांति के पश्चात उन्होंने इसे उतनी जल्दी समाप्त करके पूरा ध्यान राजनैतिक दल बसपा को मजबूत करने लगा दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि बसपा उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने में सफल रही । लोकतंत्र के रक्षक व प्रेमी होने की वजह से पूरे देश से लोग साथ आये और मान्यवर साहेब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जमीन पर काम किया, किन्तु मान्यवर साहेब के परिनिर्वाण के पश्चात बसपा के संगठन में लोकतंत्र खत्म कर दिया  तथा बहुजन हिताय के नारे की जगह सर्वजन का नारा दिया गया । सर्वजन हिताय में ब्राह्मण तथा बहुजन हिताय में केवल चमार जाति को वरीयता प्रदान करने की वजह से अन्य पिछड़ा, दलित, सवर्ण वोट नाराज होकर खिसक गया और पार्टी हाशिए में चली गई बसपा के अंदर जिसने प्रतिनिधियों की चमचागिरी की उनको वरीयता दी जाने लगी । मायावती जी ने कैडरयुक्त सेकेंड लेवल के नेताओं को एक तरफा कार्यवाही करके निष्कासित कर दिया तथा चमचा प्रवृत्ति के लोगों को महत्व दिया जाने लगा । जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2012 , लोकसभा चुनाव 2014, पुनः उत्तर प्रदेश विधानसभा 2017 के चुनाव परिणामों में बुरी तरह परास्त हुए । मान्यवर साहेब द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी में भी चमचा युग का दौर शुरू हो गया तथा  मान्यवर साहेब की सैद्धांतिकी को ताक में रखकर धन बल का प्रयोग किया जाने लगा । समाज से अपरिचित व्यक्ति को धन के बल पर टिकट दिया जाने लगा जबकि मान्यवर साहेब न बिकने वाले समाज के निर्माण की बात बार बार कहते है । बसपा में चमचा युग आने के साथ ही अन्य दलों में चमचों की भरमार हो गई । जिसकी वजह से दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के अधिकार खत्म किए जा रहे है और सभी दलों के चमचे मुखिया की जी-हुजूरी में लिप्त है इतना ही नही बल्कि अपने वर्गों के हितों के खिलाफ जाकर मुखिया को खुश करने में लगे हुए हैं ।
 
   अनुसूचित जाति, जनजाति के प्रमोशन में आरक्षण के विधेयक को राज्यसभा में पास हो जाने के पश्चात जब 19 दिसम्बर 2012 को लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी0 नारायण सामी ने बिल पेश किया तो समाजवादी पार्टी से दलित सांसद यशवीर सिंह ने  सपा प्रमुख मुलायम सिंह के इशारे पर नारायण सामी के हाथ से बिल छीनकर फाड़ दिया और दलितों, आदिवासियों को एक चमचे सांसद की वजह से अधिकार मिलते-मिलते रह गया । प्रमोशन में आरक्षण का बिल राज्यसभा से पास होने के बाद आज भी सुरक्षित है लेकिन दलितों के हितों को कौन दल सुरक्षित करना चाहता है ? क्योंकि वर्तमान समय मे संसद में केवल चमचों की फौज है । सांसद बनने से पहले उदितराज, रामदास अठावले समाज के बीच मे जाकर दलितों के अधिकारों के लिए लंबे लंबे भाषण देते थे किंतु आज बीजेपी की शरण मे जाकर नतमस्तक हो गए है अर्थात चमचागीरी में लिप्त हो गए है इसीलिए दलितों पिछड़ों के अधिकारों के लिए दो दाँत भी संसद में नही बोलते है ।
  
प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

Saturday, 3 March 2018

03 मार्च इतिहास के पन्नों में

03 मार्च इतिहास के पन्नों में -प्रदीप कुमार गौतम
इतिहास हमेशा प्रेरणा देने का काम करता है इतिहास के अभाव में पीढ़ियाँ गुलाम और दास बन जाती है, इसलिए इतिहास को जरूर खंगालते रहो 03 मार्च 1930 को राष्ट्रनिर्माता, विश्वविभूति डॉ भीमराव अंबेडकर ने नासिक(महाराष्ट्र) के कालामन्दिर में सत्याग्रह किया था जिसमें पूरे देश से एक हजार से अधिक प्रतिनिधि नासिक में उपस्थिति हुए थे और वहाँ से काला मंदिर में प्रवेश करने हेतु आंदोलन शुरू किया गया था ।शांतिमय वातावरण के साथ हजारों की संख्या में लोग कालामन्दिर की ओर बढ़ रहे थे ढ़ोल नगाड़ो के साथ लोग नाच रहे थे क्योंकि अपढ़, अशिक्षित बहुजनों को यह लग रहा था कि अब तो छुआछूत खत्म हो जाएगी हम अछूत से सछूत हो जाएंगे लेकिन नेतृत्व कर्ता बाबा साहेब को अच्छी तरह से मालूम था कि क्या होने वाला है । सत्याग्रह करने वाले क्रांतिकारी चार पंक्तियों में विभाजित थे जिसमें ढोल नगाड़ों के बाद बहुजन वीरांगनाएँ आगे थी इसके बाद सभी पुरुष लगे हुए थे चूंकि श्रमण संस्कृति में स्त्री प्रधान होती है तो बाबा साहेब इसका बहुत अच्छी तरह से ख्याल रखते थे  । सत्याग्रही जैसे ही मंदिर के पास पहुंचते है ब्राह्मण मंदिरों में ताला जड़कर वहाँ से भाग जाते है बाबा साहेब सभी को आदेश देते है कि जब तक ताले नही खुलेंगे तब तक हम लोग सत्याग्रह करेंगे । एक माह तक सभी लोग मंदिरों के कपाट खुलने का इंतजार करते है ब्राह्मणों का भगवान भी कितना डरपोक है कि उसे सभी का भाग्य विधाता कहा जाता है किंतु अछूत कही जाने वाली जनता से साक्षात करने की उसमें हिम्मत नही रहती है चूंकि बाबा साहेब का सत्याग्रह आंदोलन अपने पूरे चरम स्थिति पर पहुंचकर अंग्रेजों को आइना दिखाने का काम कर रहा था तभी सुंनियोजित ढंग से महात्मा गांधी नमक का आंदोलन(दांडी यात्रा) 12 मार्च 1930 में शुरू करते है जिनके साथ कुल 78 लोग शामिल थे, लेकिन उस समय की प्रिंट मीडिया दांडी यात्रा को ऐतिहासिक करार देने में बजी हुई थी और बाबा साहेब के साथ हजारों की संख्या में चल रही भीड़ के लिए एक पंक्ति की खबर नही छापी जा रही थी । गांधी ने यह यात्रा 24 दिन में पूरी की और 241 मील चलकर 05 अप्रैल 1930 को दाड़ी में समुद्र के किनारे पहुँचे ।06 अप्रैल 1930 को गांधी ने समुद्र के पानी से नमक बनाकर सरकारी कानून तोड़ा । लेकिन उन्हें ऐसा करने पर कोई परेशानी नही हुई इसके बिलग बाबा साहेब अम्बेडकर के खिलाफ अंग्रेजी प्रशासन था तो दूसरी ओर हिन्दू धर्म ग्रंथ थे जिसको सुनाकर बड़ी आसानी से ब्राह्मण अन्य सवर्णों को भड़काकर हमला करवाने की फिराक में था इसके बाद भी एक माह तक कालाराम मंदिर के बाहर धरने पर बैठने के बाद भी कपाट बंद थे ब्राह्मण पिछले दरवाजे से मंदिर में पूजा कर जाते थे जब यह बात अन्य सत्याग्रहियों को मालूम हुई तो उन्होंने भी पिछले दरवाजे से घुसने का प्रयास किया जिसके बाद हल्की झड़प होने पर अंग्रेज प्रशासन से उसे पूरी तरह से बंद करवा दिया । अप्रैल 1930 रामनवमी के दिन मंदिर की मूर्ति को गर्भ गृह से निकालकर पूरे नगर में रथ द्वारा घूमने की योजना थी जिसमें बाबा साहेब से इस बात पर रजामंदी हो गई कि रथ को एक ओर ब्राह्मण, बनिया खींचेगे तो दूसरा छोर अछूत खीचेंगे जिस पर बाबा साहेब मान गए । हकीकत यह थी कि बाबा साहेब अंबेडकर को मंदिर में प्रवेश करने में कोई दिलचस्पी नही थी लेकिन 04 अक्टूबर 1930 को लंदन में होने वाले गोलमेज सम्मेलन के लिए हिंदुओं द्वारा अछूतों के साथ होने वाले भेदभाव की डाक्यूमेंट्री तैयार की जा रही थी जिसे वे गोलमेज सम्मेलन में सबके सामने रख सके । जब मूर्ति को खींचने के लिए अछूतों की बारी आई तो ब्राह्मणों ने उन पर हमला कर दिया जिस पर अधिकतर अछूत घायल हो गए इसके और बाबा साहेब को भी जान से मारने का प्रयास किया गया लेकिन जागरूक बहुजन युवा ब्राह्मणों की मंशा को समझ गए और उन्होंने बाबा को पूरी तरह से ढक लिया और वहाँ से उन्हें दूर ले गए काला राम मंदिर सत्याग्रह में अनेकों लोग घायल हुए और कई को तो जान से हाथ धोना पड़ा इसके विपरीत ग़ांधी ने नमक का सरकारी कानून तोड़ा फिर भी उनके साथ चलने वाले किसी व्यक्ति पर एक कंकड़ भी नही मारा गया ।
ऊपर ही कहा जा चुका है कि इतिहास हमेशा प्रेरणा देता है बाबा साहेब द्वारा मंदिर प्रवेश के आंदोलन से सीधा अभिप्राय तत्कालीन परिस्थितयां थी और वे गोलमेज सम्मेलन में अछूतों को कैसे अधिकार दिलाएँ उसके लिए पूरा खाका तैयार कर रहे थे न कि उनका यह संदेश था कि मेरे जाने के बाद तुम मंदिरों में घंटियां बजाना बल्कि उनका मूल मकसद यही था कि आप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दो समाज को अन्धविशवास आडम्बर से दूर करो और सामाजिक न्याय के लिए आजीवन संघर्ष करो । आज के इस दिन से मूल प्रेरणा यही प्राप्त होती है कि हमें देवालयों कि जगह विद्यालयों, विश्वविद्यालयों की ओर प्रस्थान करना होगा तथा मानवता वादी समाज की स्थापना के आजीवन प्रयास करना होगा ।
जोहार अम्बेडकर  जोहार मण्डल
प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी

Friday, 2 March 2018

गुंडाराज (लघुकथा )

लघुकथा
गुंडाराज 
(प्रदीप कुमार गौतम)
रवीश कुमार सुमन एक होनहार छात्र होने कारण इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लॉ का छात्र था । हँसमुख स्वभाव, सरल व्यक्तित्व, अम्बेडकरवादी विचारधारा से लैस था । शाम को कुछ साथियों के साथ चाय पीने हेतु रेस्टोरेंट में जैसे ही प्रवेश करता है, उसका पैर एक राजपूत लड़के से टकरा गया । जातीय दम्भ से भरे हुए शैलेन्द्र शंकर सिंह ने कहा-
क्यों रे ! दिखता नही है क्या ?
सॉरी भाई ! देख नही पाया । उसने जवाब दिया ।
हरामखोर ! तुम भंगी जानबूझकर टकराते हो ।
भाई सॉरी बोला न, फिर जाति को गाली क्यों देते हो ।
भोस..... के मादर........ भंगी होकर ज़बान लड़ाता है ।
वह बोला- ऐसा है गाली मत दो ।
बहिन......द । पकड़ साले को ( तीन-चार लड़के पकड़कर पीटने लगते है )
भोस........तुम्हारे बाप दादे हमारी गुलामी करते रहे है । तुम ठाकुर गोगी के राज में हम राजपूतों से ज़ुबान लड़ाओगे ।
रवीश जोर देकर चंगुल से निकलकर कुर्सी उठा लेता है और तीन चार लड़कों पर प्रहार करता है । तब तक फ़ोन करके राजपूत और लड़कों को जमा कर लेता है ।
स्कार्पियो से चार-पांच लड़के उतरते है सभी के हाथों में लोहे की रॉड होती है । अकेले घिरे रवीश को पकड़कर घसीटते हुए रेस्टोरेंट से बाहर ले जाते है ।
वह जान की गुहार लगाता है , पुलिस चौकी से सौ क़दम दूरी पर यह मंजर जारी है कोई मदद के लिए नही आता है ।
वे उसे बेरहमी से पीटते हुए कहते हैं । हम राजपूतों ने सहारनपुर में चमारों को काट डाला, नोयडा में खुलेआम अहीरों को सीने में गोली मारा, तो तुम भंगियों की औकात कैसे हो गई ।
वह बेहोश होकर मरणासन्न अवस्था मे पड़ा था, उस पर लगातार ईंटों, रॉड, हाकियों से वार जारी था, उसकी आँखें बाहर निकल आई थी, जिसे देखकर लग रहा था जैसे वे भारतीय संविधान के लोकतंत्र की जगह फिर से मनु के विधान को लागू होते हुए देख रही हो ।

धम्म-पथ

बुद्ध ने कहा— जीवन दुःख है, पर यह अंतिम सत्य नहीं, क्योंकि दुःख-निरोध भी है। तृष्णा से बँधा मन बार-बार जन्म लेता है, और सम्यक दृष्टि उसे मुक...