03 मार्च इतिहास के पन्नों में -प्रदीप कुमार गौतम
इतिहास हमेशा प्रेरणा देने का काम करता है इतिहास के अभाव में पीढ़ियाँ गुलाम और दास बन जाती है, इसलिए इतिहास को जरूर खंगालते रहो 03 मार्च 1930 को राष्ट्रनिर्माता, विश्वविभूति डॉ भीमराव अंबेडकर ने नासिक(महाराष्ट्र) के कालामन्दिर में सत्याग्रह किया था जिसमें पूरे देश से एक हजार से अधिक प्रतिनिधि नासिक में उपस्थिति हुए थे और वहाँ से काला मंदिर में प्रवेश करने हेतु आंदोलन शुरू किया गया था ।शांतिमय वातावरण के साथ हजारों की संख्या में लोग कालामन्दिर की ओर बढ़ रहे थे ढ़ोल नगाड़ो के साथ लोग नाच रहे थे क्योंकि अपढ़, अशिक्षित बहुजनों को यह लग रहा था कि अब तो छुआछूत खत्म हो जाएगी हम अछूत से सछूत हो जाएंगे लेकिन नेतृत्व कर्ता बाबा साहेब को अच्छी तरह से मालूम था कि क्या होने वाला है । सत्याग्रह करने वाले क्रांतिकारी चार पंक्तियों में विभाजित थे जिसमें ढोल नगाड़ों के बाद बहुजन वीरांगनाएँ आगे थी इसके बाद सभी पुरुष लगे हुए थे चूंकि श्रमण संस्कृति में स्त्री प्रधान होती है तो बाबा साहेब इसका बहुत अच्छी तरह से ख्याल रखते थे । सत्याग्रही जैसे ही मंदिर के पास पहुंचते है ब्राह्मण मंदिरों में ताला जड़कर वहाँ से भाग जाते है बाबा साहेब सभी को आदेश देते है कि जब तक ताले नही खुलेंगे तब तक हम लोग सत्याग्रह करेंगे । एक माह तक सभी लोग मंदिरों के कपाट खुलने का इंतजार करते है ब्राह्मणों का भगवान भी कितना डरपोक है कि उसे सभी का भाग्य विधाता कहा जाता है किंतु अछूत कही जाने वाली जनता से साक्षात करने की उसमें हिम्मत नही रहती है चूंकि बाबा साहेब का सत्याग्रह आंदोलन अपने पूरे चरम स्थिति पर पहुंचकर अंग्रेजों को आइना दिखाने का काम कर रहा था तभी सुंनियोजित ढंग से महात्मा गांधी नमक का आंदोलन(दांडी यात्रा) 12 मार्च 1930 में शुरू करते है जिनके साथ कुल 78 लोग शामिल थे, लेकिन उस समय की प्रिंट मीडिया दांडी यात्रा को ऐतिहासिक करार देने में बजी हुई थी और बाबा साहेब के साथ हजारों की संख्या में चल रही भीड़ के लिए एक पंक्ति की खबर नही छापी जा रही थी । गांधी ने यह यात्रा 24 दिन में पूरी की और 241 मील चलकर 05 अप्रैल 1930 को दाड़ी में समुद्र के किनारे पहुँचे ।06 अप्रैल 1930 को गांधी ने समुद्र के पानी से नमक बनाकर सरकारी कानून तोड़ा । लेकिन उन्हें ऐसा करने पर कोई परेशानी नही हुई इसके बिलग बाबा साहेब अम्बेडकर के खिलाफ अंग्रेजी प्रशासन था तो दूसरी ओर हिन्दू धर्म ग्रंथ थे जिसको सुनाकर बड़ी आसानी से ब्राह्मण अन्य सवर्णों को भड़काकर हमला करवाने की फिराक में था इसके बाद भी एक माह तक कालाराम मंदिर के बाहर धरने पर बैठने के बाद भी कपाट बंद थे ब्राह्मण पिछले दरवाजे से मंदिर में पूजा कर जाते थे जब यह बात अन्य सत्याग्रहियों को मालूम हुई तो उन्होंने भी पिछले दरवाजे से घुसने का प्रयास किया जिसके बाद हल्की झड़प होने पर अंग्रेज प्रशासन से उसे पूरी तरह से बंद करवा दिया । अप्रैल 1930 रामनवमी के दिन मंदिर की मूर्ति को गर्भ गृह से निकालकर पूरे नगर में रथ द्वारा घूमने की योजना थी जिसमें बाबा साहेब से इस बात पर रजामंदी हो गई कि रथ को एक ओर ब्राह्मण, बनिया खींचेगे तो दूसरा छोर अछूत खीचेंगे जिस पर बाबा साहेब मान गए । हकीकत यह थी कि बाबा साहेब अंबेडकर को मंदिर में प्रवेश करने में कोई दिलचस्पी नही थी लेकिन 04 अक्टूबर 1930 को लंदन में होने वाले गोलमेज सम्मेलन के लिए हिंदुओं द्वारा अछूतों के साथ होने वाले भेदभाव की डाक्यूमेंट्री तैयार की जा रही थी जिसे वे गोलमेज सम्मेलन में सबके सामने रख सके । जब मूर्ति को खींचने के लिए अछूतों की बारी आई तो ब्राह्मणों ने उन पर हमला कर दिया जिस पर अधिकतर अछूत घायल हो गए इसके और बाबा साहेब को भी जान से मारने का प्रयास किया गया लेकिन जागरूक बहुजन युवा ब्राह्मणों की मंशा को समझ गए और उन्होंने बाबा को पूरी तरह से ढक लिया और वहाँ से उन्हें दूर ले गए काला राम मंदिर सत्याग्रह में अनेकों लोग घायल हुए और कई को तो जान से हाथ धोना पड़ा इसके विपरीत ग़ांधी ने नमक का सरकारी कानून तोड़ा फिर भी उनके साथ चलने वाले किसी व्यक्ति पर एक कंकड़ भी नही मारा गया ।
ऊपर ही कहा जा चुका है कि इतिहास हमेशा प्रेरणा देता है बाबा साहेब द्वारा मंदिर प्रवेश के आंदोलन से सीधा अभिप्राय तत्कालीन परिस्थितयां थी और वे गोलमेज सम्मेलन में अछूतों को कैसे अधिकार दिलाएँ उसके लिए पूरा खाका तैयार कर रहे थे न कि उनका यह संदेश था कि मेरे जाने के बाद तुम मंदिरों में घंटियां बजाना बल्कि उनका मूल मकसद यही था कि आप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दो समाज को अन्धविशवास आडम्बर से दूर करो और सामाजिक न्याय के लिए आजीवन संघर्ष करो । आज के इस दिन से मूल प्रेरणा यही प्राप्त होती है कि हमें देवालयों कि जगह विद्यालयों, विश्वविद्यालयों की ओर प्रस्थान करना होगा तथा मानवता वादी समाज की स्थापना के आजीवन प्रयास करना होगा ।
जोहार अम्बेडकर जोहार मण्डल
प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
ऊपर ही कहा जा चुका है कि इतिहास हमेशा प्रेरणा देता है बाबा साहेब द्वारा मंदिर प्रवेश के आंदोलन से सीधा अभिप्राय तत्कालीन परिस्थितयां थी और वे गोलमेज सम्मेलन में अछूतों को कैसे अधिकार दिलाएँ उसके लिए पूरा खाका तैयार कर रहे थे न कि उनका यह संदेश था कि मेरे जाने के बाद तुम मंदिरों में घंटियां बजाना बल्कि उनका मूल मकसद यही था कि आप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दो समाज को अन्धविशवास आडम्बर से दूर करो और सामाजिक न्याय के लिए आजीवन संघर्ष करो । आज के इस दिन से मूल प्रेरणा यही प्राप्त होती है कि हमें देवालयों कि जगह विद्यालयों, विश्वविद्यालयों की ओर प्रस्थान करना होगा तथा मानवता वादी समाज की स्थापना के आजीवन प्रयास करना होगा ।
जोहार अम्बेडकर जोहार मण्डल
प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
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