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Friday, 2 March 2018

गुंडाराज (लघुकथा )

लघुकथा
गुंडाराज 
(प्रदीप कुमार गौतम)
रवीश कुमार सुमन एक होनहार छात्र होने कारण इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लॉ का छात्र था । हँसमुख स्वभाव, सरल व्यक्तित्व, अम्बेडकरवादी विचारधारा से लैस था । शाम को कुछ साथियों के साथ चाय पीने हेतु रेस्टोरेंट में जैसे ही प्रवेश करता है, उसका पैर एक राजपूत लड़के से टकरा गया । जातीय दम्भ से भरे हुए शैलेन्द्र शंकर सिंह ने कहा-
क्यों रे ! दिखता नही है क्या ?
सॉरी भाई ! देख नही पाया । उसने जवाब दिया ।
हरामखोर ! तुम भंगी जानबूझकर टकराते हो ।
भाई सॉरी बोला न, फिर जाति को गाली क्यों देते हो ।
भोस..... के मादर........ भंगी होकर ज़बान लड़ाता है ।
वह बोला- ऐसा है गाली मत दो ।
बहिन......द । पकड़ साले को ( तीन-चार लड़के पकड़कर पीटने लगते है )
भोस........तुम्हारे बाप दादे हमारी गुलामी करते रहे है । तुम ठाकुर गोगी के राज में हम राजपूतों से ज़ुबान लड़ाओगे ।
रवीश जोर देकर चंगुल से निकलकर कुर्सी उठा लेता है और तीन चार लड़कों पर प्रहार करता है । तब तक फ़ोन करके राजपूत और लड़कों को जमा कर लेता है ।
स्कार्पियो से चार-पांच लड़के उतरते है सभी के हाथों में लोहे की रॉड होती है । अकेले घिरे रवीश को पकड़कर घसीटते हुए रेस्टोरेंट से बाहर ले जाते है ।
वह जान की गुहार लगाता है , पुलिस चौकी से सौ क़दम दूरी पर यह मंजर जारी है कोई मदद के लिए नही आता है ।
वे उसे बेरहमी से पीटते हुए कहते हैं । हम राजपूतों ने सहारनपुर में चमारों को काट डाला, नोयडा में खुलेआम अहीरों को सीने में गोली मारा, तो तुम भंगियों की औकात कैसे हो गई ।
वह बेहोश होकर मरणासन्न अवस्था मे पड़ा था, उस पर लगातार ईंटों, रॉड, हाकियों से वार जारी था, उसकी आँखें बाहर निकल आई थी, जिसे देखकर लग रहा था जैसे वे भारतीय संविधान के लोकतंत्र की जगह फिर से मनु के विधान को लागू होते हुए देख रही हो ।

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