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Sunday, 4 March 2018

चमचा युग का पुनरावलोकन

                                          चमचा युग का पुनरावलोकन

जब हम मान्यवर कांशीराम साहेब द्वारा लिखित 'The chamcha age' (an era of the stooges) चमचा युग की बात करते है तो उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानने से पूर्व यह जानना अत्यावश्यक हो जाता है कि आखिर चमचा युग क्या है ? जब हम बाबा साहेब के वैचारिकी पर अपना ध्यान आकृष्ट करते हैं तो जो दलित, पिछड़े वर्ग का व्यक्ति  हिंदुओं की गुलामी में प्रवृत्त रहता है, उसे हम गुलाम कहते है . इसी तरह महात्मा गाँधी एवं बाबा साहेब के बीच यदावरा जेल, पूना में जो समझौता हुआ, जिसमें दलितों को पृथक निर्वाचन मंडल को खोने के बाद आरक्षित सीटें प्राप्त हुई । आरक्षित सीटों से चुनाव जीतकर दलितों के हक, हकूक की लड़ाई लड़े बिना हिंदुओं की चापलूसी करते हुए अपने ही वर्ग के अधिकारों का हनन करने का काम करता है ऐसे प्रतिनिधियों को चमचा, दलाल, पिट्ठू, औजार आदि कहा गया है । इस संदर्भ में बाबा साहेब अंबेडकर कहते हैं -"एक जाने पहचाने मुहावरे का प्रयोग करें तो हिंदुओं के नजरिए से संयुक्त निर्वाचन मंडल एक रॉटन बरो(जीर्ण शीर्ण उपनगर) है जिसमें हिंदुओं को एक अछूत के नामांकन का अधिकार मिलता है, जो नाम मात्र को अछूतों का प्रतिनिधि होता है किंतु वास्तव में वह हिंदुओं का औजार होता है ।"1
      चमचा युग मान्यवर साहेब द्वारा लिखित एक ऐसा दस्तावेज है, जिसमें बाबा साहेब की विचारधारा का संकलन है . 1930 से शुरू हुए गोलमेज सम्मेलन में  डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा जो भी तथ्य अंग्रेजी शासन के समक्ष प्रस्तुत किए गए, उन सभी का दस्तावेजीकरण है तथा इसमें मुख्य रूप से महात्मा गाँधी द्वारा अपनाए गए रवैयों से समाज को चेताया गया है क्योंकि गाँधी स्वयं को दलितों का बहुत बड़ा हितैषी बताता है और इसके उलट पूरे अधिकार छीनने में तुला हुआ है । गोलमेज सम्मेलन में वह स्वयं को दलितों का प्रतिनिधि बताता है, किंतु बाबा साहेब के नाम देश के सभी कोनों से पत्र आते है और उन्हें ही दलितों का प्रतिनिधि घोषित किया जाता है . इसके बाद गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहेब द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों को आधार मानकर 17 अगस्त 1932 को प्रधानमंत्री के साम्प्रदायिक पंचाट(कम्युनल अवार्ड)  की घोषणा करते  हुए प्रथक निर्वाचन मंडल की सिफारिश को स्वीकृत प्रदान कर दी जाती है जिसकी वजह से पहली बार कांग्रेस एवं गांधी को चमचों की आवश्यकता महसूस होती है . इस विषय मे मान्यवर  कांशीराम कहते है -"गाँधी और कांग्रेस के तमाम विरोध के बावजूद 17 अगस्त 1932 को घोषित प्रधानमंत्री के पंचाट में दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन मंडल की स्वीकृति दे दी गई । 1930 से 1932 तक कि इस अवधि में गाँधी जी एवं कांग्रेस को पहली बार चमचों की जरूरत महसूस हुई ।"2
  कम्युनल अवार्ड के घोषित होने के बाद महात्मा गाँधी खफा होकर बड़ी चालाकी से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री  को लगातार तार लिखते है, लेकिन वे गांधी के दोगले रवैये को समझ जाते है तथा प्रथक निर्वाचन मंडल दलितों को अधिकार के रूप में प्रदान करते है तथा इस सन्दर्भ में बाबा साहेब से बात करने के लिए बोल देते है । इसके बाद महात्मा गांधी अनशन में बैठ जाता है तथा बाबा साहेब पर दबाव बनाया जाता है उनके पीछे ण हटने पर देश के कोनों से दलितों की हत्याओं की खबरे आने लगती है . जिसकी वजह से बाबा साहेब मज़बूरी में पूना समझौता करते है, जो आगे चलकर पूना पैक्ट के रूप में प्रचलित होता है  और उसी दिन से देश मे चमचा युग की शुरुवात होती है . इस संदर्भ में मान्यवर कांशीराम साहेब कहते है - "24 सितम्बर 1932 के दिन चमचा युग की शुरुवात हुई ।"3
       इसी चमचा युग को मान्यवर कांशीराम साहेब दस वर्षों में खत्म करने का बीड़ा उठाते है और  इस उद्देश्य को लेकर वे नियम बद्ध कार्यक्रमों की योजना तैयार करते है  तथा जब कांशीराम जी जमीन में काम करना शुरू करते है, तो 1978 के दौर से चमचों में खलभली मच जाती है तथा चमचे किश्म के इंसान अपनी जमीन खोजने लगते है, वे बहुत समय तक परेशान भी रहते है । बीच-बीच में वे कांशीराम जी के समर्थकों को गीदड़ भभकी भी देते है जब कार्यकर्ता साहेब से इस तरह की धमकियों की सुचना देते है तो वे   इस संदर्भ में कहते है  -" चमचा अपने बूते कुछ नही कर सकता है इसीलिए करने वाला आप पर चमचा से वार कर सकता है । इसीलिए हमें चमचा प्रहार के लिए तैयार रहना चाहिए ।"4
       सच तो यह है कि चमचा कठपुतली होते है उनमें बहुत दम नही होती है, पहले वे आपको धमकाने का काम करेंगे यदि आप वैचारिक रूप से परिपक्व है और उनका डटकर सामना करते हैं तो दुम दबाकर भाग खड़े होंगे क्योंकि चमचा स्वयं कुछ नही करता है बल्कि वह रिमोड से चलने वाले खिलौनों की तरह होते है इस संदर्भ में मान्यवर कांशीराम साहेब कहते है -"बहरहाल, चमचा प्रहार से हमें नहीं डरना चाहिए, क्योंकि चमचा कोई शक्तिशाली अथवा घातक हथियार नही है । इसके अतिरिक्त हमें उस हाथ पर निशाना साधना होगा जो चमचे का इस्तेमाल करता है । अगर हम जोर से मारेंगे, तो चमचा गिर जाएगा । गिरा हुआ चमचा निरापद होता है  इसीतरह, हम लगभग 10 वर्ष की छोटी-सी अवधि में चमचा युग समाप्त करने को आशा करते हैं ।"5
         मान्यवर कांशीराम साहेब दस वर्षों में चमचा युग समाप्त करने के लिए एक योजना तैयार करते है तथा तीन योजनाओं में काम करने का निर्णय लेते है 1.सामाजिक परिवर्तन( अल्पावधि समाधान) 2. राजनैतिक परिवर्तन(दीर्घकालीन समाधान) सांस्कृतिक परिवर्तन(स्थाई समाधान) । सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने  ०6 दिसम्बर 1978 को बामसेफ तथा 06 दिसम्बर 1981 को  DS4 की स्थापना की, जिससे सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई शुरू की । DS4 की कई विंग्स तैयार की गई, गाँव-गाँव सामाजिक जागरूकता के कार्यो में लोग लग गए, बामसेफ आर्थिक एवं बौद्धिक सहायता करने लगा, जिससे लोगों में सामाजिक चेतना के साथ जागरूकता आई तथा  लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने लगे । तब मान्यवर कांशीराम साहेब को महसूस हुआ कि  अब मनुवादी पार्टियों से मुकाबला करने के लिए राजनैतिक दल का गठन किया जाए तब उन्होंने बाबा साहेब के जन्मदिन के अवसर पर 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी का गठन किया तथा दीर्घकालीन परिवर्तन हेतु 'वोट हमारा राज तुम्हारा, नही चलेगा नही चलेगा' 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के नारे को बुलन्द करके अल्पजन बनाम बहुजन का बिगुल फूँक दिया । जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया और धीरे धीरे बसपा भारत देश की तृतीय सबसे मजबूत राजनैतिक दल के रूप में उभरा । दीर्घकालीन परिवर्तन के नारों के साथ वे लगातार अपने भाषणों से स्थाई समाधान हेतु 2006 से सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में कार्यक्रम करने की योजना के बारे में बात करते थे क्योंकि बौद्ध धम्म के स्थापना के बिना राजनीति में लगातार सफलता हासिल करना बस की बात नही है यह उन्हें भलीभांति मालूम था, जिसके लिए वे 2003-2004 के दौर से निरन्तर धम्म के लिए अधिक प्रेरित कर रहे थे, लेकिन अचानक उनके स्वास्थ्य में गिरावट आती है और वे 09 अक्टूबर 2006 को रात 12:30 बजे हम सभी के बीच से चले जाते हैं अर्थात परिनिर्वाण को प्राप्त करते है और स्थाई परिवर्तन का उद्देश्य उनका अधूरा रह जाता है ।
           मान्यवर कांशीराम ने सामाजिक परिवर्तन करने के लिए DS4 का गठन जितनी जल्दी किया था सामाजिक क्रांति के पश्चात उन्होंने इसे उतनी जल्दी समाप्त करके पूरा ध्यान राजनैतिक दल बसपा को मजबूत करने लगा दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि बसपा उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने में सफल रही । लोकतंत्र के रक्षक व प्रेमी होने की वजह से पूरे देश से लोग साथ आये और मान्यवर साहेब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जमीन पर काम किया, किन्तु मान्यवर साहेब के परिनिर्वाण के पश्चात बसपा के संगठन में लोकतंत्र खत्म कर दिया  तथा बहुजन हिताय के नारे की जगह सर्वजन का नारा दिया गया । सर्वजन हिताय में ब्राह्मण तथा बहुजन हिताय में केवल चमार जाति को वरीयता प्रदान करने की वजह से अन्य पिछड़ा, दलित, सवर्ण वोट नाराज होकर खिसक गया और पार्टी हाशिए में चली गई बसपा के अंदर जिसने प्रतिनिधियों की चमचागिरी की उनको वरीयता दी जाने लगी । मायावती जी ने कैडरयुक्त सेकेंड लेवल के नेताओं को एक तरफा कार्यवाही करके निष्कासित कर दिया तथा चमचा प्रवृत्ति के लोगों को महत्व दिया जाने लगा । जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2012 , लोकसभा चुनाव 2014, पुनः उत्तर प्रदेश विधानसभा 2017 के चुनाव परिणामों में बुरी तरह परास्त हुए । मान्यवर साहेब द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी में भी चमचा युग का दौर शुरू हो गया तथा  मान्यवर साहेब की सैद्धांतिकी को ताक में रखकर धन बल का प्रयोग किया जाने लगा । समाज से अपरिचित व्यक्ति को धन के बल पर टिकट दिया जाने लगा जबकि मान्यवर साहेब न बिकने वाले समाज के निर्माण की बात बार बार कहते है । बसपा में चमचा युग आने के साथ ही अन्य दलों में चमचों की भरमार हो गई । जिसकी वजह से दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के अधिकार खत्म किए जा रहे है और सभी दलों के चमचे मुखिया की जी-हुजूरी में लिप्त है इतना ही नही बल्कि अपने वर्गों के हितों के खिलाफ जाकर मुखिया को खुश करने में लगे हुए हैं ।
 
   अनुसूचित जाति, जनजाति के प्रमोशन में आरक्षण के विधेयक को राज्यसभा में पास हो जाने के पश्चात जब 19 दिसम्बर 2012 को लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी0 नारायण सामी ने बिल पेश किया तो समाजवादी पार्टी से दलित सांसद यशवीर सिंह ने  सपा प्रमुख मुलायम सिंह के इशारे पर नारायण सामी के हाथ से बिल छीनकर फाड़ दिया और दलितों, आदिवासियों को एक चमचे सांसद की वजह से अधिकार मिलते-मिलते रह गया । प्रमोशन में आरक्षण का बिल राज्यसभा से पास होने के बाद आज भी सुरक्षित है लेकिन दलितों के हितों को कौन दल सुरक्षित करना चाहता है ? क्योंकि वर्तमान समय मे संसद में केवल चमचों की फौज है । सांसद बनने से पहले उदितराज, रामदास अठावले समाज के बीच मे जाकर दलितों के अधिकारों के लिए लंबे लंबे भाषण देते थे किंतु आज बीजेपी की शरण मे जाकर नतमस्तक हो गए है अर्थात चमचागीरी में लिप्त हो गए है इसीलिए दलितों पिछड़ों के अधिकारों के लिए दो दाँत भी संसद में नही बोलते है ।
  
प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

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