साहित्य समाज का दर्पण होता है केवल इतना कह देना कारगर साबित नही होगा जब तक साहित्य का समाज के प्रति और समाज का साहित्य के प्रति सही आकलन न कर लें । बहुजन वैचारिकी का समय तो बहुत पुराना है लेकिन प्रत्येक देशकाल परिस्थिति में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है । आधुनिक भारत मे यदि हम बहुजन वैचारिकी की बात करते हैं तो उसमें मुख्य रूप से फुले दंपत्ति से ही इसकी शुरुवात होती है या यों कहें कि महाराष्ट्र की धरती ही बहुजन क्रांति की जन्मदात्री है देश में कई लेखक, कवि हुए कुछ तो आकाश की ऊंचाई तक उठ गए लेकिन कुछ को उनकी जाति, वर्ण, समाज, इत्यादि में जमीजोद कर दिया तब युवा साहित्यकारों एवं शोधार्थियों की यह जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है कि जमीन पर दफ़न कर दिए गए साहित्यकारों को उजागर करें तथा उनकी साहित्यिक विरासत को सभी के समक्ष लाने का प्रयास करें । इसी क्रम में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से शोध कर रहे प्रदीप कुमार गौतम ने वयोवृद्ध साहित्यकार श्री बी0 डी0 पराग से खास मुलाकात करके साक्षात्कार लिया ।
प्रदीप कुमार- सर ! आपकी नौकरी कब और किस विभाग में लगी ?
पराग जी- गौतम जी ! सबसे पहले मुझे सन 1958 ई0 में आशावादी शिक्षक के रूप में तैनाती प्राप्त हुई, इसके बाद सन 1965 ई0 में फतेहपुर में स्थाई नियुक्ति हेतु ट्रेंनिग दी गई और वहीं से हम स्थाई शिक्षक के रूप में तैनात हुए ।
पराग जी- गौतम जी ! सबसे पहले मुझे सन 1958 ई0 में आशावादी शिक्षक के रूप में तैनाती प्राप्त हुई, इसके बाद सन 1965 ई0 में फतेहपुर में स्थाई नियुक्ति हेतु ट्रेंनिग दी गई और वहीं से हम स्थाई शिक्षक के रूप में तैनात हुए ।
प्रदीप कुमार - आपको अम्बेडकरवादी साहित्य को लिखने की प्रेरणा कब मिली ?
पराग जी - शिक्षा विभाग में नौकरी लगने के बाद 1965 ई0 में ही हमने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली तथा वरिष्ठ समाजसेवी बाबू ज्वाला प्रसाद जी से अम्बेडकरवादी साहित्य अध्ययन के लिए प्राप्त हुआ । भोपाल में प्राइवेट रेलवे विभाग में नौकरी के दौरान बाबा साहेब का वहाँ पर जो तेजस्वी भाषण सुना उसने अंतस चेतना के समाज के प्रति काम करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ कर दिया और वहीं से महात्मा बुद्ध, संत रविदास, बाबा साहेब इत्यादि सामाजिक मुद्दों पर कलम के माध्यम से आवाज़ बुलंद की हालांकि उस दौरान गाँव-गाँव मे बाबा साहेब की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का सरल माध्यम गायन परम्परा एवं नौटंकी थी इसलिए मेरी अत्यधिक रचनाएँ काव्य एवं सांगीत विधा में है ।
पराग जी - शिक्षा विभाग में नौकरी लगने के बाद 1965 ई0 में ही हमने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली तथा वरिष्ठ समाजसेवी बाबू ज्वाला प्रसाद जी से अम्बेडकरवादी साहित्य अध्ययन के लिए प्राप्त हुआ । भोपाल में प्राइवेट रेलवे विभाग में नौकरी के दौरान बाबा साहेब का वहाँ पर जो तेजस्वी भाषण सुना उसने अंतस चेतना के समाज के प्रति काम करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ कर दिया और वहीं से महात्मा बुद्ध, संत रविदास, बाबा साहेब इत्यादि सामाजिक मुद्दों पर कलम के माध्यम से आवाज़ बुलंद की हालांकि उस दौरान गाँव-गाँव मे बाबा साहेब की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का सरल माध्यम गायन परम्परा एवं नौटंकी थी इसलिए मेरी अत्यधिक रचनाएँ काव्य एवं सांगीत विधा में है ।
प्रदीप कुमार-ऊपर आपने धम्म दीक्षा लेने की बात स्वीकार की है, तो यह बताइये कि धम्म दीक्षा देने वाले गुरु कौन थे ?
पराग- गौतम जी ! धम्म दीक्षा देने वाले पहले गुरु कुकरगांव के भिक्खु आनन्द देव है और उन्होंने नागपुर में पुनः धम्म दीक्षा लेने की सलाह दी थी तब सन 1965 के बाद मैं नागपुर गया और वहाँ का दृश्य देखकर ह्रदय गदगद हो उठा था । नागपुर से अम्बेडकरवादी साहित्य प्रचुर मात्रा में खरीदा और वहीं पर पुनः धम्म दीक्षा ली ।
पराग- गौतम जी ! धम्म दीक्षा देने वाले पहले गुरु कुकरगांव के भिक्खु आनन्द देव है और उन्होंने नागपुर में पुनः धम्म दीक्षा लेने की सलाह दी थी तब सन 1965 के बाद मैं नागपुर गया और वहाँ का दृश्य देखकर ह्रदय गदगद हो उठा था । नागपुर से अम्बेडकरवादी साहित्य प्रचुर मात्रा में खरीदा और वहीं पर पुनः धम्म दीक्षा ली ।
प्रदीप कुमार- मैं आपकी रचनाओं पर चर्चा करने से पूर्व जानना चाहता हूँ कि आपने काव्य लेखन को ही क्यों चुना ? क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण है ?
पराग-मेरा परिवार शुरुवात से काव्य कला प्रेमी रहा है, गांव में मेरे परिवार के लोग भजन गायन एवं नौटंकी खेलने के बहुत शौकीन थे और दोनों में ही काव्य का प्रयोग किया जाता था तथा हम लोग भी आल्हा गाने का काम बहुत करते थे, जिसका प्रभाव यह हुआ कि मेरा पूरा लेखन काव्य की ओर मुड़ गया ।
पराग-मेरा परिवार शुरुवात से काव्य कला प्रेमी रहा है, गांव में मेरे परिवार के लोग भजन गायन एवं नौटंकी खेलने के बहुत शौकीन थे और दोनों में ही काव्य का प्रयोग किया जाता था तथा हम लोग भी आल्हा गाने का काम बहुत करते थे, जिसका प्रभाव यह हुआ कि मेरा पूरा लेखन काव्य की ओर मुड़ गया ।
प्रदीप कुमार- आपकी रचनाओं में भीम ज्योति और भीम गर्जना एक से नाम प्राप्त होते है, इन दोनों में मूल भिन्नता क्या है ?
पराग जी - भीम ज्योति में काव्य के माध्यम से बाबा साहेब अंबेडकर की वैचारिकी की बात की है और भीम गर्जना में बाबा साहेब द्वारा दिए गए भाषणों में जो वे आह्वाहन करते है तथा ब्राह्मणवादी ताकतों से समाज को सावधान करते है और मनुवादियों को ललकारते है उनको काव्य रूप में परिणित किया है ।
पराग जी - भीम ज्योति में काव्य के माध्यम से बाबा साहेब अंबेडकर की वैचारिकी की बात की है और भीम गर्जना में बाबा साहेब द्वारा दिए गए भाषणों में जो वे आह्वाहन करते है तथा ब्राह्मणवादी ताकतों से समाज को सावधान करते है और मनुवादियों को ललकारते है उनको काव्य रूप में परिणित किया है ।
प्रदीप कुमार- सांगीत विधा में लिखी गई कृति 'रविदास दर्शन' में आपने किस तथ्य पर जोर दिया है ?
पराग जी - सांगीत विधा मूल रूप से नौटंकी है, जिसे लोक परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, बदलते परिवेश में इस विधा का महत्व भी कम हुआ है । बनारस की यात्रा दौरान जब मैं रविदास मंदिर के आसपास रहने वाले वयोवृद्ध लोगों से मिला और सन्त रविदास जी के काम के बारे में जानने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि संत रविदास एक विद्वान थे उनके बारे में जूते बनाने की बात पूरी तरह से शास्त्रार्थ में पराजित ब्राह्मणों द्वारा झूठा प्रचार है और भी विभिन्न तथ्यों को जानकर सन्त रविदास दर्शन नामक पुस्तक को लिखी ।
पराग जी - सांगीत विधा मूल रूप से नौटंकी है, जिसे लोक परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, बदलते परिवेश में इस विधा का महत्व भी कम हुआ है । बनारस की यात्रा दौरान जब मैं रविदास मंदिर के आसपास रहने वाले वयोवृद्ध लोगों से मिला और सन्त रविदास जी के काम के बारे में जानने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि संत रविदास एक विद्वान थे उनके बारे में जूते बनाने की बात पूरी तरह से शास्त्रार्थ में पराजित ब्राह्मणों द्वारा झूठा प्रचार है और भी विभिन्न तथ्यों को जानकर सन्त रविदास दर्शन नामक पुस्तक को लिखी ।
प्रदीप कुमार- आपकी अन्य रचनाओं में पराग पुंज एवं पराग पद्यांजलि में किन चीजों का वर्णन है ?
पराग-इन दोनों रचनाओं में नैतिक कर्तव्यों का वर्णन किया गया है, जिसमें माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहिन, इत्यादि के एक दूसरे के प्रति जो कर्तव्य हैं उन्हें काव्य के रूप में ढाला है ।
पराग-इन दोनों रचनाओं में नैतिक कर्तव्यों का वर्णन किया गया है, जिसमें माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहिन, इत्यादि के एक दूसरे के प्रति जो कर्तव्य हैं उन्हें काव्य के रूप में ढाला है ।
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