राष्ट्रीय राजनीति में धाक जमाने वाली बहुजन समाज पार्टी आज घुटनों के बल चल रही है क्या आपने कभी विचार किया ? इसका कारण क्या है ? मुझे जो समझ आया वह यह कि चमचों को चलाने वाले रिमोड हाथों ने बहिन अंदर की बड़ी खामी को पकड़ लिया था कि धन के माध्यम से बहुत कुछ परिवर्तन किया जा सकता है और उन्होंने वही किया लालची हाथों को नोटो के अटैचिया दी जाने लगी और वैचारिक लोगों की जगह चमचों की सेंधमारी करवा दी जिसका परिणाम यह हुआ कि एक-एक करके चमचों से रक्षा करने वाले बाहर हो गए और चमचा युग आपके अंदर ही शुरू हो गया यदि किसी ने हुकुम के विरोध में चमचों से सावधान करने की बात की उसे बाहर कर दिया गया और धीरे-धीरे एक चमचों का अधिपत्य स्थापित हो गया । बाहर के चमचों की तो पहचान हो रही थी जिसके लिए मान्यवर साहेब ने थ्योरी दे दी थी जिससे हम लोग चार बार राजसत्ता को भी हासिल कर लिए थे, चमचों को चलाने वाले हाथों मुख्य मंशा यही थी कि किसी तरह इसको फंसाया जाए और उनके द्वारा डाले गए जाल में हम फंस गए जिसकी वजह से सीबीआई पीछे पड़ गई। जेल भेजने की सीधी धमकी दी गई इसलिए खामोश बैठ गए क्योंकि हम भी तो चमचों के सरदार थे तो स्वभाविक है कि हमें बैठना पड़ेगा । रिमोड को बहुजन समाज पर अत्याचार की हद पार करनी थी इसलिए उसनेे टेस्टिंग शुरू की गुजरात में मरी गाय के उठाने पर गाड़ियों में बांधकर लोहे की रॉडों से पीटा गया समाज आपका और उसी का वोट बैंक के बल पर राज्यसभा में थे तो नही बोलते तो समाज प्रश्न करेगा तब मुद्दा उठाया गया खूब जोरशोर से पूरे देश मे हाहाकार मच गया रिमोड परेशान हो गया उसने सहारनपुर अपनाया वहाँ पर उल्टा बयान आया चंद्रशेखर रिमोड का आदमी घोषित किया गया तब समाज मे दोहरी मानसिकता उत्पन्न हो गई राज्यसभा में बार-बार मुद्दा उठाने पर सीबीआई की धमकी दी गई इसीलिए न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी की तर्ज पर सीधे-सीधे राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और हमेशा के लिए समाज के प्रश्नों से बचने का मौका मिल गया और अंदरूनी चमचों द्वारा इसे ऐतिहासिक कदम बताकर बाबा साहेब द्वारा हिन्दू कोड बिल के संदर्भ में दिए गए इस्तीफे से तुलना कर डाली । आखिर ठहरे जो चमचे इससे अधिक कर भी क्या सकते है ? मान्यवर साहेब ने जिस चमचा युग को 10 वर्ष में खत्म करने की बात की थी उसे सबसे ज्यादा खाद बीच उनके ही उत्तराधिकारी ने ही दी है और सर्वाधिक चमचों की संख्या आज उनके के साथ है ।
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
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Saturday, 10 March 2018
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