महिला सशक्तिकरण के वर्तमान हालात
प्रदीप कुमार, शोधार्थी, हिंदी विभाग
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी(उ0प्र0)
मोबाइल-8115393117
ईमेल-pradeepkumargautam72@gmail.com
प्रदीप कुमार, शोधार्थी, हिंदी विभाग
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स्त्री सशक्तिकरण के दावे केवल कागज़ी शिगूफा साबित हो रहे हैं, सरकारी तंत्र अपने स्तर पर महिला सशक्तिकरण की बात करता है . उसे कागज़ो में ढालता है, लेकिन उसे जमीन में नहीं उतारता है, क्योंकि उसे यह खतरा दिखाई देता है कि ऐसा न हो कि सामाजिक धुरी पर टिका वोटर उससे खिसक जाये । इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इसका साहस नही कर पाता है, सबसे पहले तो देश में व्याप्त पितृसत्ता बेटों की चाहे में ऐसा डूब हुआ है कि जब तक पुत्र प्राप्ति नही होती है, अनचाही बेटियों को जन्म देते रहते है । पुत्र ही परिवार और समाज को बढ़ा सकता है, ऐसी धारणाएं पूरी तरह से धार्मिक ग्रंथों में रची बसी सोच का परिणाम है कि घर का मालिक केवल पुरुष हो सकता है, यदि कोई स्त्री घर की जिम्मेदारियों को निर्वाहन करना चाहती है तो उसे कुलटा, परिवारनाशनी इत्यादि उपाधियों से विभूषित कर दिया जाता है . जब कोई महिला प्रतिरोध करके सामाजिक दायरों को तोड़कर आगे आती है, तो घृणित मानसिकता के लोग उसकी हत्या भी कर देते हैं . इस तरह की दूषित मानसिकता को जिम्मेदार पद प्रतिष्ठित लोग हवा देते है . अभी तत्काल की घटना का जिक्र करें, तो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्त्री पुरुष के बीच हुई शादी को समझौता करार दिया है वे कहते है कि पुरुष स्त्री के खाने पीने रहने की व्यवस्था करता है, इसके बदले स्त्री उसके घर का काम करती है और अन्य जरूरतें पूरी करती है इसका प्यार स्नेह से कोई मतलब नही है जब भी ये एक दूसरे की जरूरतें बन्द कर देते है तभी वे अलग-अलग हो जाते है ऐसी बयानबाजियों को देखें, तो इस देश मे ढेरों लोग है जो स्त्रियों को संभोग की वस्तु मात्र समझकर मतलब रखते है बाँकी चीजों से उनका कोई सरोकार नही है । पहले तो धार्मिक रूप से स्त्रियों को इतना निकृष्ट और घृणित जीव करार दिया है कि वह बच्चे पैदा करने की मशीन मात्र रह गयी है । मनीषा सिंह अनचाही स्त्रियों के पैदा होने के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहती है कि - " वर्ष 2017-18 के आर्थिक सर्वे ने इस अंतर को बाकायदा दर्ज करते हुए बताया है कि देश मे 2.1 करोड़ बेटियाँ ऐसी हैं, जिनके पैदा होने की उम्मीद उनके परिवारों ने नही की थी ।"1 इस आंकड़े को देखकर आप हैरान हो जाएंगे कि बेटे की ऐसी चाहे कि पांच-पांच पुत्रियाँ हो गई, जो दकियानूसी मानसिकता को परिलक्षित करता है । 20वीं सदी तक तो हालात ऐसे थे कि अनचाहे ही लेकिन बेटियाँ हो जाती थी जिसकी वजह से स्त्री-पुरुष का अनुपात ठीक था किंतु 21वीं सदी में प्रवेश करते ही ऐसी टेक्नोलॉजी का जन्म हुआ कि गर्भ में ही भ्रूण को जाँच-परख लिया जाता है और भ्रूण हत्या कर दी जाती है इसके आंकड़े और भी भयानक है मनीषा सिंह कहती है -"गर्भ में बेटी की सूचना मिलने पर देश में अब तक 6.3 करोड़ भ्रूण हत्याएँ कराई गई है ।"2
मनीषा सिंह द्वारा दिए गए आंकड़ो में हो सकता है किसी संस्था ने ये आंकड़ें सरकारी तंत्र से निकाले हो या सामाजिक संगठन द्वारा जुटाए गए हो । यह भ्रूण हत्या तो शादी होने के बाद कि परिगणना है, लेकिन इस देश में शादी से पहले ही नौजवानों में सम्बन्ध स्थापित हो रहे है जिनमें भ्रूण पैदा होना स्वाभाविक है जिनकी कभी गणना ही नही की जाती है यदि ऐसे भी आंकड़ों को जोड़े तो मनीषा सिंह द्वारा दिए आंकड़ों से कई गुना अधिक हो जाएंगे । डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित भारतीय संविधान में दिए गए अधिकार के बल पर वर्तमान समय मे स्त्रियाँ बड़े-बड़े पदों पर पहुंच गई है इसके बाद भारतीय संविधान में महिला को मातृत्व हेतु 26 माह का अवकाश अनिवार्य किया गया है लेकिन समाज अपना रुख अभी भी नही बदल पा रहा है वह चाहे राजनीति के क्षेत्र में हो या आर्थिक क्षेत्र में पुरुष का वर्चस्व सभी जगह कायम है ।
महिला आरक्षण के बाद स्त्रियाँ विभिन्न जगहों पर पहुंच रही है, लेकिन वे पुरुष रूपी बैसाखी जरूर थामें हुए है । जबसे शिक्षा का प्रभाव तेजी से फैला है, तो पढ़ी लिखी लड़कियों की डिमांड बढ़ गयी है, ऐसे में लड़कियों की शादी न होने का खतरा मंडराने लगा है । यह स्थिति देखकर माता पिता लड़कियों को पढ़ा लिखा रहे हैं किंतु उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए नही बल्कि अच्छे वर की तलाश हेतु पढ़ा रहे हैं । सामाजिक जागरूकता से लोगों को कोई सरोकार नही रह गया है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । महिलाओं के लिए 33℅ आरक्षण की वकालत निरंतर चलती रही है । कांग्रेस के शासन काल मे महिला आरक्षण विधेयक संसद के उच्च सदन से पास हो गया था, लेकिन लोकसभा में पास नही हो पाया था, जबकि बीजेपी साथ थी . मूलतः उस समय कांग्रेस की मंशा इस विधेयक को लेकर स्पष्ट नही थी इसलिए थोड़े से विरोध में महिला आरक्षण विधेयक लोक सभा से पास नही हो पाया जबकि ऐसे कई विधेयक है, जिनमें कांग्रेस ने सख्त रुख अपनाकर विपक्षियों को वॉक आउट करवकार विधेयक पास करवाये हैं लेकिन फिलहाल यह गेंद अब बीजेपी के पाले में है और उसके पास यह सुनहरा मौका है कि देश की आधी आबादी को इस विधेयक के पास करवाते ही खुश कर सकती है । इस संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार श्री दिलीप मंडल जी कहते हैं -"अब राजग और भाजपा को साबित करना है कि महिला आरक्षण के सवाल पर वे गंभीर और ईमानदार है । अगर भाजपा और राजग वर्तमान लोकसभा में महिला आरक्षण बिल लाते हैं तो पूरी संभावना है कि कांग्रेस का समर्थन उसे मिल जाएगा । यदि कांग्रेस ऐसा नही करती है तो महिला समर्थक होने का उसका दावा खत्म हो जाएगा ।"3
वर्तमान समय में देश के हालातों में नजर दौड़ाए तो दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमान प्रताड़ित हो रहे हैं तो दूसरी ओर बौद्धिक वर्ग के लोगों की हत्याएँ जारी है जिससे बौद्धिक वर्ग भी डरा हुआ है महिलाओं के साथ दिन प्रतिदिन बलात्कार फाबियाँ कसी जा रही है । यदि आंकड़ों पर नज़र डालें तो तो बलात्कार की घटना स्व पीड़ित होने वाली महिलाओं में दलित स्त्रियों की संख्या बहुत अधिक है । दलित स्त्री एक ओर जाति के कारण पीड़ित होती है तो दूसरी ओर घर-परिवार एवं पितृसत्ता से पीड़ित रहती है तब महिला आरक्षण विधेयक में शहरी और देहाती स्त्रियों तथा दलित स्त्रियों को विशेष प्रावधान किए जाएं, तभी समानता एवं सामाजिक न्याय की बात हो सकती है अन्यथा कि स्थिति में बाबा साहेब द्वारा भारतीय संविधान में आरक्षण के माध्यम से किए गए प्रावधानों को वर्तमान सरकार खोखला करने की फिराक में है ।
संदर्भ-1.अमर उजाला,संपादकीय(अवांछित होने का दर्द) शुक्रवार,09 मार्च 2018, कानपुर संस्करण
2.वही
3. वही (महिला आरक्षण और कब)
2.वही
3. वही (महिला आरक्षण और कब)
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