क्या आपने बाबा साहेब के सम्बोधन को सुना है ?
आज सुबह मेरी मुलाकात ऐसे शख्स से हुई, जिन्होंने बाबा साहेब के संबोधन को केवल एक बार नही बल्कि 13 मई 1954 से अक्टूबर 1954 तक नागपुर से मद्रास तक छेड़े गए सामाजिक परिवर्तन के अभियान में जब बाबा साहेब मध्यप्रदेश आये तो इन्होंने भोपाल, इंदौर, कटनी, भुसावल में सुना । 80 वर्षीय कविरत्न की उपाधि से विभूषित श्री बी0 डी0 पराग (बालादीन पराग) का जन्म 01 जुलाई 1937 ई0 को जनपद जालौन के मालवी नगर(हरदौल मुहल्ला) , कोंच में हुआ था । आपके पिता का नाम श्री मंटोलाल है । बातचीत के दौरान आपने बताया कि बचपन में मेरा नाम बलराम(वर्तमान घरेलु नाम) था लेकिन मुहल्ले के ही एक ब्राह्मण शिक्षक के भाई का नाम बलराम था इसलिए उन्होंने बलराम की जगह बालादिन रख दिया तबसे बालादीन ही चल रहा है । आपने बताया कि जब बाबा साहेब भोपाल आये हुए थे तब मैं रेलवे विभाग के मालगोदाम में अस्थाई रूप से कार्यरत था उस कार्यक्रम का संचालन श्री पी0 एल0 पिप्पल (प्यारेलाल पिप्पल) कर रहे थे ।हम सभी युवाओं को लाठियों और बंदूकें देकर बाबा साहेब की सुरक्षा में लगाया गया था, शाम 04 बजे लेकर रात्रि में 09 बजे तक कार्यक्रम चला था जिसमें बाबा साहेब ने अकेले लगातार 03 घंटे सम्बोधित किया था । बाबा साहेब के प्रभाव में आकर आप साहित्य लेखन में उतर आए और जमीन पर अपनी कविताओं, लोकगीतों के माध्यम से समाज को जागरूक करने लगे बाद में आपकी ज्वानिंग बबीना केंट झाँसी में प्रवक्ता पद पर हो गई । शुरुवात में आपका पूरा परिवार कबीरपंथी था जो आपकी रचनाओं को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है लेकिन सन 1965 में आपने बौद्ध धम्म दीक्षा ग्रहण कर ली जिसके बाद आपकी रचनाओं में धम्म का प्रभाव आ गया । आपने कुल सोलह पुस्तकें लिखी, लेकिन एक क्षेत्रीय लेखक होने के नाते भारी उपेक्षा के शिकार हुए, जबकि आपकी रचनाओं में समाज का वेदना , समाज के उत्थान के मार्ग आदि स्पष्ट दिखाई देता है । वेतन इतनी प्राप्त होती थी कि स्वयं का परिवार पालना मुश्किल था ऐसी परिस्थिति में सामाजिक कार्य हेतु कई यात्राएँ लगातार करते रहते थे जिससे साहित्य छपवाने हेतु धन का अभाव था । बाबा साहेब के परिनिर्वाण के पश्चात मान्यवर साहेब के मिशन मूवमेंट में लगातार काम किया किन्तु शासन सत्ता हासिल होने के पश्चात आपने कई नेताओं से साहित्य को प्रकाशित करवाने हेतु आर्थिक सहयोग की माँग की लेकिन किसी ने सहयोग नही किया उलटे साहित्य से क्या होता है ? ऐसे प्रश्नों को खड़ा करके उल्टे पैर वापिस लौटा दिया । आज आपकी उम्र 80 वर्ष हो गई है और आँखों से दिखना भी बंद हो गया है उसका मुख्य कारण आंखों में मोतियाबिंद होना है आपके पास जो चश्मा था वह भी टूटा हुआ है । एक क्षेत्र विशेष से सम्बन्ध रखने के कारण उम्दा रचनाओं के रचनाकार की इतनी भारी उपेक्षा देखकर हृदय हिल गया । सुबह भ्रमण से वापिस आने के दौरान आपसे मुलाकात हुई तो चाय हेतु घर ले आया जिसमें रचनाओं को प्रकाशित करवाने का मैंने आश्वासन दिया, तो आप अपने घर से अप्रकाशित रचनाओं की पांडुलिपि मेरे यहाँ ले आये । जिसमें मुख्य रूप से निम्न है -
प्रकाशित रचनाएँ
1.साक्षरता की ओर (सांगीत/नौटंकी विधा)
2.पोलियो दमन (सांगीत/नौटंकी विधा)
अप्रकाशित रचनाएँ-
1.भीम ज्योति(काव्य)
2.पराग-पुष्पांजलि(काव्य)
3.गुरु भक्त अंगुलिमाल (सांगीत/नौटंकी विधा)
4.भीम गर्जना(काव्य)
5.बुद्ध दर्पण(काव्य)
6.लोकगीत(बुंदेलीगीत) दो खंडों में
7.आल्हखंड(तर्ज आल्हा)
8.रविदास दर्शन(सांगीत/नौटंकी विधा) दो खंडों में
9.वन संपदा
10.वर्ण व्यवस्था: अमनासिक(आलोचना
11.हिन्दू धर्म में अछूतों की स्थिति (आलोचना)
इन रचनाओं में तीन रचनाएँ भीम ज्योति(काव्य), पराग-पुष्पांजलि(काव्य), गुरु भक्त अंगुलिमाल (सांगीत/नौटंकी विधा) गौतम प्रिंटर्स, नई दिल्ली द्वारा सन 2000 द्वारा टाइपिंग की गई है और भारतीय बौद्ध महासभा( रजि0) नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित करवाई जा रही थी किन्तु उसी समय आपका एक्सीडेंट हो गया और आप पहुंच नही पाए और धन का अभाव हो गया और पुस्तकें प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित नही की गई , जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । इन रचनाओं की पांडुलिपि देखने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि बाजार में आई कई रचनाओं से ये बहुत उम्दा है लेकिन धनाभाव में एक लोक भाषा से पूरित साहित्यकार को हाशिए में डाल दिया गया है ।
लेकिन आप और हम मिलकर ऐसे साहित्यकारों की रचनाओं को केवल प्रकाशित ही नही करवा सकते है बल्कि रचनाओं में व्याप्त सारगर्भित ,समाज द्रष्टा वस्तुओं को प्रचारित करके उनके साथ हुई साहित्यिक क्षति की भी पूर्ति कर सकते है ।
प्रकाशित रचनाएँ
1.साक्षरता की ओर (सांगीत/नौटंकी विधा)
2.पोलियो दमन (सांगीत/नौटंकी विधा)
अप्रकाशित रचनाएँ-
1.भीम ज्योति(काव्य)
2.पराग-पुष्पांजलि(काव्य)
3.गुरु भक्त अंगुलिमाल (सांगीत/नौटंकी विधा)
4.भीम गर्जना(काव्य)
5.बुद्ध दर्पण(काव्य)
6.लोकगीत(बुंदेलीगीत) दो खंडों में
7.आल्हखंड(तर्ज आल्हा)
8.रविदास दर्शन(सांगीत/नौटंकी विधा) दो खंडों में
9.वन संपदा
10.वर्ण व्यवस्था: अमनासिक(आलोचना
11.हिन्दू धर्म में अछूतों की स्थिति (आलोचना)
इन रचनाओं में तीन रचनाएँ भीम ज्योति(काव्य), पराग-पुष्पांजलि(काव्य), गुरु भक्त अंगुलिमाल (सांगीत/नौटंकी विधा) गौतम प्रिंटर्स, नई दिल्ली द्वारा सन 2000 द्वारा टाइपिंग की गई है और भारतीय बौद्ध महासभा( रजि0) नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित करवाई जा रही थी किन्तु उसी समय आपका एक्सीडेंट हो गया और आप पहुंच नही पाए और धन का अभाव हो गया और पुस्तकें प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित नही की गई , जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । इन रचनाओं की पांडुलिपि देखने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि बाजार में आई कई रचनाओं से ये बहुत उम्दा है लेकिन धनाभाव में एक लोक भाषा से पूरित साहित्यकार को हाशिए में डाल दिया गया है ।
लेकिन आप और हम मिलकर ऐसे साहित्यकारों की रचनाओं को केवल प्रकाशित ही नही करवा सकते है बल्कि रचनाओं में व्याप्त सारगर्भित ,समाज द्रष्टा वस्तुओं को प्रचारित करके उनके साथ हुई साहित्यिक क्षति की भी पूर्ति कर सकते है ।
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