लघुकथा
बड़े बाबू
(प्रदीप कुमार गौतम)
वह सुबह से ही तैयार होकर प्रसन्नचित्त मन से झाँसी के निकला रवाना हुआ, क्योंकि उसकी फाइल में अब कोई कमी नही थी । इसलिए उसे आज काम पूरा होने की उम्मीद थी, एक माह की भागदौड़ से राहत मिलने वाली थी । वह सोच रहा था कि आज काम पूरा हो जाएगा, तो पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करके होने वाली परीक्षाओं को पास किया जाए । वह झगड़े के मूड से हटकर सामंजस्य की स्थिति में नजर आ रहा है उससे घुस माँगी गई थी किंतु उसने कमियों को पूरा किया घुस बिल्कुल नही दी । उसकी बस जैसे ही विश्वविद्यालय के सामने रुकी वह उतरकर तुरन्त यूजीसी सेल पहुंचा तथा अपनी फाइल के संबंधित कागज तुरन्त बाबू को सौंप दिए । बाबू ने काम को टालना चाहा तो वह उसी की चेम्बर में डट कर बैठ गया । बाबू भी संबंधित कागजों की ड्राफ्टिंग करने लगा, पूरी फाइल तैयार होते-होते चार बज गए । इसके पश्चात बड़े बाबू के चेम्बर में फाइल पहुँची, किंतु बड़े बाबू गायब मिले । विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों में उसे खोजा गया, किंतु वह कहीं दिखाई नही दिया, छोटा बाबू भी खोजने लगा, लेकिन उसके दूर-दूर तक कहीं दर्शन नही हुए । फाइल को ज़बरन बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित कुलसचिव के ऑफिस भिजवाया गया, किंतु उन्होंने भी बड़े बाबू के हस्ताक्षर रहित फाइल में अपने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया । एक माह से भटकने के बाद भी आज फिर से उसकी फाइल डंप हो गयी । वह सोचने लगा कि योगी द्वारा सुबह 10 बजे से शाम 05 बजे के कार्यालयी आदेश के लतीफे केवल कागजी ही है, क्योंकि आज बड़े बाबू के समय से एक घंटे पहले चले जाने की वजह से फाइल फिर लटक गई । उसका धैर्य बेकाबू होकर कि अंगारा बनता जा रहा था पता नही किस दिन विस्फ़ोट हो जाए ?
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Wednesday, 20 September 2017
बड़े बाबू(लघुकथा)
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