Friday, 22 September 2017

अन्ना प्रथा (लघुकथा)

लघुकथा
  अन्ना प्रथा
(प्रदीप कुमार गौतम)
इस साल गाड़ी मेहनत करके उसने  खेतों में रबी की फसल बो दी । वह प्रत्येक साल की तरह विचार करता फसल अच्छी होगी तो पिछले साल की उधारी पट जाएगी, बीज भात के लिए कुछ दाना पानी रख लिया जाएगा ,घर में बैठी सयानी बिटिया कि शादी कर दी जाएगी । खेतों में चना के बुटो में गुलाबी रंग के फूल ऐसे लहलहा रहे थे जैसे कोई नवयुवती खिलखिला के हँस रही हो । इस बार की खेती में फसल अपने यौवन को धारण किए किसानों के हृदय में आकांक्षाओं को बड़ा रही थी । जानवरों के अन्ना होने की वजह से वह हर दिन घने अंधेरे में खेत की रखवारी करता वहीं लेटता और चाँदनी रात के चाँद को देखकर ख्यालों में डूब जाता कि बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई, पत्नी की धोती खरीदने के अनचाहे ख्वाब दौड़ने लगते थे, उसने न कभी गर्मी देखी न सर्दी बस खेतों की रात-दिन रखवाली की । एक दिन उसे साहड़ू की बिटिया की शादी में खेतों को छोड़कर जाना पड़ा । खेत को खाली पाकर दो सौ गायों के झुंड ने खेत को रात भर में खलिहान बना दिया, जब वह सुबह शादी से लौटकर खेतों पर गया तो सिर पकड़कर बैठ गया उसकी उम्मीदे धरी की धरी रह गई वह सोचने लगा कि मैं किसके नाम पर FIR करूँ आखिर कौन इन अन्ना जानवरों के लिए दोषी है ?

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