Friday, 22 September 2017

स्थाई जॉब (लघुकथा)

लघुकथा
स्थाई जॉब
(प्रदीप कुमार गौतम)
  नौकरी  की चाहे में वह सब कुछ भूल  सा गया था , रिश्तेदार, मित्र, घर के लोग टोकते अम्मा  पूछती कब तक हिल्ला हो जैहै लला, तुम्हाई नौकरी कब लगहै , बऊ कहती  अब तो हमाई अँखियाँ तरस गई नातिन बहू खों देखन के लाने कित्ते नौनी लड़कियन के रिश्ता आत तुम हो तो हाँ नही करत । वह चुपचाप सुनता रहता बिना जवाब दिए घर से बाहर निकल जाता ।  वह पाँच साल से नौकरी के लिए प्रयासरत था किन्तु उच्च शिक्षा में कभी कभार वैकेंसी निकलती थी विश्वविद्यालयों में तो कई जगह फॉर्म भरे थे लेकिन कहीं से साक्षात्कार के लिए ही नही बुलाया गया प्राइवेट महाविद्यालय में पढ़ाते हुए उसे आठ हजार रुपये मिलते वे सभी फॉर्म खर्चे पर ही खर्च हो जाते थे उसे कहीं ठौर नही दिख रहा था हर फॉर्म के साथ उम्मीद बांधता कि इसमें कोई स्थायी जॉब मिल जाएगी ।
अब तो उसके दोस्त भी उसे निठल्ला समझने लगे थे, उसने कितने संघर्ष से पीएचडी में एडमिशन पाया था कितने लोग नाराज थे उसके पीएचडी करने के फैसले थे सब कहते का करोगे पीएचडी करके जब नौकरी ही नही है उसके साथ के सभी लड़के प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल में जॉब पा लिए थे  लेकिन उसने उच्च शिक्षा में जाने का जो रास्ता चुन लिया था । इसीलिए उसके पिता भी अब रूठे से रहने लगे थे वह प्राइवेट जॉब भी करता किंतु स्थाई जॉब की तलाश में दर-दर भटकता था उसके जैसे पीएचडी धारी हजारो युवा पाँच-आठ हजार रुपये की नौकरी करने के लिए मजबूर थे ।

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