साहित्य के अध्ययन से सामाजिक समझ पैदा होती है और समाज मे काम करने से साहित्य को समझने की शक्ति प्रबल होती है । मेरे दिमाग मे कई बार अनेकों योजना तैयार होती है लेकिन उनको मैं कभी मुकाम तक नही पहुंचा पाया हूँ कई बार विचार किया कि क्या कारण है जिसकी वजह से मैं अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त नही कर पा रहा हूँ । साहित्य एवं समाज के अध्ययन में बहुत से द्वंद्व प्राप्त होते है क्योंकि समाज मे काम करते हुए साहित्यिक अध्ययन की कमी आती है । समाज मे काम करने वाले व्यक्ति को नौकरी की परवाह नही रहती है और नौकरी के अभाव में वह परिवार के भरण पोषण में सक्षम नही हो पाता है और पारिवारिक भरण पोषण में कमजोर होने पर उस पर अनेकों लांछन लगना स्वाभाविक है एक समाज का कुशल नेतृत्व करता में जरूरी नही रहता है कि वह उतना ही अधिक परिवार चलाने वाला हो । समाज मे काम करते हुए अनचाहे आपके अनेकों दुश्मन बनना तय है क्योंकि जो समाज मे जागरूकता के काम नही करते है और वे समाज मे खुद को सदैव प्रतिष्ठित रखना चाहते है ऐसे लोगो की नजरों में आप स्वाभाविक रूप से खटकने लगेंगे इसलिए समाज मे काम करते हुए ऐसे व्यक्तियों को अनदेखा करते हुए समाज मे काम करे यदि आपका उद्देश्य समाज को बेहतर दिशा देने का है तब आप अपने भविष्य को भी एक नया आयाम जरूर दें क्योंकि कई बार सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तो आप बहुत मजबूत हो जाते है और उम्र के उस पड़ाव में पहुंच जाते है जहाँ जॉब कि विभिन्न संभावनाएं लगभग खत्म हो जाती है आप अविवाहित रूप में समाज सेवा बेहतरीन तरीके से कर सकते है किंतु विवाहित होने के बाद आपके पार्टनर का समाज से कितना सरोकार है इस पर निर्भर हो जाता है । समाज और साहित्य कि चर्चा करते हुए मैं अपने उद्देश्य पर बात करना ही भूल गया । 2015 से मैं अपनी पुस्तक प्रकाशन की योजना तैयार कर रहा हूँ, किन्तु 2018 आने के बाद भी पूर्ण नही हो पाई । इसकी गहराई में जाकर में मैंने अध्ययन किया तो पाया कि मैं लगातार एक विषय पर केंद्रित नही रहा जिसकी वजह से पूर्व नियोजित योजनाएं निरंतर फैल होती गई । दलित आत्मकथाओं पर कई शोध आलेख प्रकाशित होने पर आत्मकथा पर पुस्तक लाने की योजना तैयार की और कविता लेखन की ओर धयान चला गया और कई कविताएं लिखी, फिर काव्य पर पुस्तक लाने का विचार पैदा हुआ कविता लिखते लिखते लघुकथाओं की ओर ध्यान गया और एक माह तक निरन्तर लघुकथाएँ लिखी तब लघुकथाओं पर पुस्तक आनी चाहिए ऐसा विचार पैदा हुआ । मैं अपने ही द्वंदों में जीता रहा और कोई स्थायी पुस्तक नही ला पाया । लेखन के साथ फील्ड में काम करने से कई अनुभव प्राप्त हुए जब आप फील्ड में वर्क करते हो तो निश्चित रूप से धन बहुत खर्च होता है यदि आप रुपये माँगकर फील्ड में काम करते हो तो निश्चित ही आप पर दलाल जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाने लगेगा और यदि घर से रुपये खर्च करोगे तो निश्चित मानिए आप फॉर्म भरने तक के रुपये नही जुटा पाओगे आप कई तरीके के कौतूहल से भर जाएंगे एक समय तक आपको संगठन में काम करना बेहतर लगेंगा लेकिन एक उम्र के बाद स्थाई कैरियर की याद जरूर सताएगी । कई लोग ऐसे होते है कि सभी चीजें मैनेज करते हुए आगे बढ़ते है लेकिन उनके पास सुविधाएं हो सकती है या वे बहुत प्रतिभावान हो सकते है आपके पास इनमे से क्या है इसका जरूर आंकलन कर ले क्योंकि माता पिता बहुत ही उम्मीदों के साथ आपको शहर पढ़ने के लिए भेजते है किंतु यहाँ विभिन्न सामाजिक संगठन आपकी ऊर्जा को संगठनों में खर्च करने के लिए झोंक देते है ऐसा मैं बिल्कुल नही कहता हूं कि सामाजिक संगठनों में काम नही करो खूब करो किन्तु इससे आपकी शिक्षा पर प्रभाव तो नही पड़ रहा है यह जरूर देख लें क्योंकि कई बार जोश में आकर हम सही गलत का निर्णय नही कर पाते है और जब समझ पैदा होती है तब कोई एक मुकाम पर नही होते है क्योंकि सामाजिक रुचि निश्चित रूप से आपके अध्ययन में बाधा अवश्य पहुंचाती है क्योंकि मैं स्वयं 08 से 10 घंटे प्रतिदिन पढ़ता था और अच्छी खासी जानकारी रखता था कोई भी टेस्ट मेरे लिए आसान रहता था और थोड़ी से मेहनत में टेस्ट पास कर लेता था किंतु सामाजिक संगठनों के प्रभाव में आने के बाद एक तो स्थाई रूप से पढ़ाई में दिमाग नही लगता है और जो जानकारी पहले थी वह भी पूर्णतः भूल गया क्योंकि चाहे कर भी वह पढ़ाई नही हो पाती है । सामाजिक काम करने की ललक होनी चाहिए किन्तु माता पिता के अरमानों को भी थोड़ा खयाल कर लो क्योंकि किसी भी परीक्षा को पास करने हेतु छः माह की पढ़ाई पर्याप्त होती है इसलिए पहले जॉब हासिल करो इसके बाद समाज के लिए जो संघर्ष करना हो दिल खोलकर करो क्योंकि जब आपके पास किराए के लिए रुपये नही होते है और आप खुद को समाज सेवक कहते हो तब आपके मध्य के रोजगारपरक लोग आप पर हँसते है । आपके सामने लंबी लंबी बातें करने वाले यदि उनसे 10 हजार रुपये की मदद मांग लो तो नाक भौंह सिकोड़ने लगते है इसलिए समाज सेवा के माध्यम से राजनीति में जाना है या नौकरी में यह जरूर निर्धारित करो समाज और साहित्य में मैंने स्वयं लाइफ के 04 वर्ष पीछे चला गया हूँ क्योंकि मेरे साथ का प्रत्येक युवा जॉब कर रहा है मेरा भी चयन हुआ किंतु कुछ कारणों की वजह से स्थाई नही हो पाया हूँ । वे साथी समाज की लंबी लम्बी बातें तो करते है खुद को सबसे बड़ा हितैषी भी बताते हैं किंतु जब जरूरत दो चार हजार की आ पड़ी तो कहते है तुम्हारे पास चार हजार रुपये नही है मांगने पर तंज कसेंगे पिता को 25 हजार दे दिए है इसलिए नही दे पा रहा हूँ । हकीकत यह है कि उन्हें आपमें कोई दिलचस्पी नही होती है बल्कि आपकी समाजसेवा को वे महा मूर्ख समझते है पीठ पीछे बड़ी बड़ी ढींगे हांकते है । सत्य यह है कि आप यदि सफल है तो ही आपका वास्तविक बजूद है यदि समाज सेवा के क्षेत्र में जाना है तो भी नए मुकाम को हासिल करो यदि जॉब करते है तो बेहतर है और यदि खुद का बिजनेस डालते है तो और भी बेहतर है । क्योंकि ये सभी चीजें उम्र में हो तो उसका आनंद ही कुछ अलग होता है उम्र निकल जाने पर सभी का रंग फीका पड़ने लगता है । इसलिए भाई मैंने तो निर्धारित कर लिया है संगठन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपनी पुस्तक लाने की योजना पर काम करूँगा जिससे खुद के साथ समाज का भी कुछ भला हो सकेगा ।
जय भीम नमो बुद्धाय
जय मान्यवर कांशीराम
लेखक-प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
साहित्य वह है, जो आपको धर्म, जाति, लिंग व क्षेत्रवाद के भाव से ऊपर उठाकर समाज में समता बंधुत्व एकता का भाव प्रकट करे . मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण करके प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना सिखाये और दलित संस्कृति इसी भाव को लेकर सदियों से लोक कला एवं साहित्य को संजोकर वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाओं की सतत निर्मल धारा को बहा रहा है .
Friday, 2 February 2018
अध्ययन की लत से दूर होने के परिणाम
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