लघुकथा
पाँच मिनट बाद
(प्रदीप कुमार गौतम)
बसों की ठेला -ठेली से आम आदमी को हमेशा गुजरना पड़ता है आप चाहकर भी बस वाहक के अधीन हो जाते हैं यदि निजी बस से आपका पाला पड़ गया तो बैठे -बैठे पिछवाड़े हल्ल हो जाएंगे लेकिन बस कंडेक्टर की सवारी पूर्ण करने के बाद ही रवानगी का इशारा करेंगे ।
ऐसी ही बस से मेरी भी मुलाकात हो गई, अपने साथी को दो घंटे में पहुंचने का आश्वासन देकर साठ किलोमीटर यात्रा पूरी करने हेतु उरई से भिंड वाली बस में बैठ गया , साथी से मिहोना में मुलाकात होनी थी
बस चल दी रास्ते मे ऐसे झूल रही थी जैसे मेरे जैसा भोंदू किसी मोटे रस्से के झूले में बैठ गया हो और च्यों-म्यो की आवाज आ रही हो । रास्ते मे सड़क की जगह बड़े बड़े गड्डों एवं गिट्टों के दर्शन हो रहे थे । बस किसी तरह पैंतालीस मिनट में जालौन पहुँची तो अच्छी सड़क मिलने की उम्मीद जाग गई सड़क किनारे सभी लोग अपने-अपने पसंदीदा भोज्य पदार्थ खरीदने लगे पाँच-दस-पंद्रह-बीस -पचीस पूरा आधा घंटा हो गए बस में कोई हरकत नही ज्यों की त्यों खड़ी रही । सभी टोक रहे थे बस कब चलेगी ?
पांच मिनट में ! कंडक्टर जवाब देता
इंतजार करने लगे पांच-दस-पंद्रह-बीस मिनट फिर निकल गए लेकिन बस में कोई हरकत नही । मैंने पूछा भाई कब चलेगी ?
बस पाँच मिनट में ! कंडक्टर ने फिरसे वही जवाब दिया
इंतजार अब बोझिल होता जा रहा था अब धीरे -धीरे गुस्सा आ रहा था लेकिन शांत बैठा था उसका पांच मिनट हमे शांत कर देता था । आखिर दस मिनट बाद बस चली । कुछ आस बंध गई थोड़ा चली फिर खड़ी हो गई साथी से मिलने की जल्दी बस का यह उपक्रम परेशान किए हुए था रुकते ठहरते जालौन से बंगरा एक घंटे में पहुँच पाई सीटें तो शायद ही किसी को मिल पा रही थी पूरी तरह से बस भरी होने के बाद भी लोग चड़े जा रहे थे इसी बीच झंडुबाम, प्राकृतिक दंतमंजन बस दस रुपये में ऐसी लम्बी बात की लंबे-लंबे भाषण देने वाले भी शरमा जाए । बस फिर से खड़ी हो आधा घंटे खड़े होने के बाद भी जब नही चली तो मैंने पूछ ही लिया कब चलेगी ?
पाँच मिनट में ! वही जवाब कंडक्टर ने दिया
आज साठ किलोमीटर की यात्रा छः घंटे की होने वाली थी एक छोर में हम दूसरे छोर में साथी गगन ।
बस इंतजार जारी था
बस के कंडक्टर का हर बार पाँच मिनट जारी था ।
पाँच मिनट बाद
(प्रदीप कुमार गौतम)
बसों की ठेला -ठेली से आम आदमी को हमेशा गुजरना पड़ता है आप चाहकर भी बस वाहक के अधीन हो जाते हैं यदि निजी बस से आपका पाला पड़ गया तो बैठे -बैठे पिछवाड़े हल्ल हो जाएंगे लेकिन बस कंडेक्टर की सवारी पूर्ण करने के बाद ही रवानगी का इशारा करेंगे ।
ऐसी ही बस से मेरी भी मुलाकात हो गई, अपने साथी को दो घंटे में पहुंचने का आश्वासन देकर साठ किलोमीटर यात्रा पूरी करने हेतु उरई से भिंड वाली बस में बैठ गया , साथी से मिहोना में मुलाकात होनी थी
बस चल दी रास्ते मे ऐसे झूल रही थी जैसे मेरे जैसा भोंदू किसी मोटे रस्से के झूले में बैठ गया हो और च्यों-म्यो की आवाज आ रही हो । रास्ते मे सड़क की जगह बड़े बड़े गड्डों एवं गिट्टों के दर्शन हो रहे थे । बस किसी तरह पैंतालीस मिनट में जालौन पहुँची तो अच्छी सड़क मिलने की उम्मीद जाग गई सड़क किनारे सभी लोग अपने-अपने पसंदीदा भोज्य पदार्थ खरीदने लगे पाँच-दस-पंद्रह-बीस -पचीस पूरा आधा घंटा हो गए बस में कोई हरकत नही ज्यों की त्यों खड़ी रही । सभी टोक रहे थे बस कब चलेगी ?
पांच मिनट में ! कंडक्टर जवाब देता
इंतजार करने लगे पांच-दस-पंद्रह-बीस मिनट फिर निकल गए लेकिन बस में कोई हरकत नही । मैंने पूछा भाई कब चलेगी ?
बस पाँच मिनट में ! कंडक्टर ने फिरसे वही जवाब दिया
इंतजार अब बोझिल होता जा रहा था अब धीरे -धीरे गुस्सा आ रहा था लेकिन शांत बैठा था उसका पांच मिनट हमे शांत कर देता था । आखिर दस मिनट बाद बस चली । कुछ आस बंध गई थोड़ा चली फिर खड़ी हो गई साथी से मिलने की जल्दी बस का यह उपक्रम परेशान किए हुए था रुकते ठहरते जालौन से बंगरा एक घंटे में पहुँच पाई सीटें तो शायद ही किसी को मिल पा रही थी पूरी तरह से बस भरी होने के बाद भी लोग चड़े जा रहे थे इसी बीच झंडुबाम, प्राकृतिक दंतमंजन बस दस रुपये में ऐसी लम्बी बात की लंबे-लंबे भाषण देने वाले भी शरमा जाए । बस फिर से खड़ी हो आधा घंटे खड़े होने के बाद भी जब नही चली तो मैंने पूछ ही लिया कब चलेगी ?
पाँच मिनट में ! वही जवाब कंडक्टर ने दिया
आज साठ किलोमीटर की यात्रा छः घंटे की होने वाली थी एक छोर में हम दूसरे छोर में साथी गगन ।
बस इंतजार जारी था
बस के कंडक्टर का हर बार पाँच मिनट जारी था ।
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