लघुकथा
जहरीली गालियाँ
( प्रदीप कुमार गौतम)
जालौन जिले के उत्तर दिशा की ओर कदौरा से बेतवा घाट की ओर जाने वाली सड़क पर कानाखेड़ा नाम का छोटा-सा गाँव है । साल में दो चार बार ही गाँव जाना होता है, लेकिन इस वर्ष लगातार गाँव जाने का सिलसिला जारी है, तो वहाँ पर पानी के लिए संघर्ष करती महिलाओं को देखकर हृदय पीड़ित हो जाता है कई घरों के बीच एक हैडपम्प होने की वजह से सुबह से शाम तक भडेरी रखी रहती है कई बार तो भद्दी गालियों से लड़ाई होकर मुड़ फुटौवल तक की नौबत आ जाती है । इस संघर्ष से होकर महिलाओं को पानी मिल पाता है और सब अपने अपने घरों की ओर चली हैं
मैंने एक काकी से पूछा
काहे काकी ! इस झगड़े को देखकर आपको बुरा नही लगता है
नही बेटा ! काकी ने जवाब दिया
काकी के जवाब को सुनकर मैं हत्प्रत रह गया
मैंने पूछा -क्यों
वो बोली- बेटा ये नल तो कल से लग गए हैं हम लोग साठिया कुआँ से पानी भरकर लाती थी, जिसमें पूरा-पूरा दिन बैठना पड़ता था कटी-भुजी गालियाँ सुननी पड़ती थी । यदि कभी ज्यादा बर्तन हो जाते थे तो पंडतैनियाँ और ठाकुरैनियाँ कहती थी ।
ओ चमरिया ! यहाँ उतर आ घाट से तै चार दिना न नहाइये तो कौन कुछ बिगड़ जइ
और हम लोगों को घाट छोड़ना पड़ता था
कभी-कभी तो पूरा दिन पानी का इंतजार करना पड़ता था । आज अपने दरवाजे में आपस मे ही तो लड़ती है कमसे कम उन पंडतैनियाँ और ठाकुरैनियाँ की कटी-भुनी जहरीली गालियाँ तो नही सुननी पड़ती है ।
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