Saturday, 9 November 2013

माँ


माँ दिव्यता की स्रोत
ममता का भण्डार
अखंड ज्योति -सा
जिसका पावन प्यार
नित्य जिसमें उमड़ता
बच्चों के प्रति दुलार
नतमस्तक हो जाता
जिसके सामने संसार
गंगा -सा पवित्र
जिसका आशीर्वाद
अलौकिक स्नेह निर्झर
जिसमे संसार
फिर आज क्यों हो रहा
उसी का तिरस्कार
पुरुष का स्वरूप
आज होता अत्याचार
बर्बरता कि सीमा
लांघा पुरुष अपार
जिसकी वजह से
है वह पोषित
नित्य करता
उसी को शोषित
मातृ भाव
दिखलाता झूटा
ममता का वह
खून चूसता
लद गये दिन
आज पुरुष के
स्त्री हो गयी
कटी पतंग -सी
नही खिचेगी
तुमसे डोर
भूल जाओ
अत्याचारियों  अब रोड
ममता कि
कसम निभायेंगे
माँ को माँ
हम  बनायेंगे …………।

                                                              प्रदीप कुमार गौतम

                                                                   ०९/११/२०१३

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